भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। हर राज्य में दूध की सहकारी समितियां (कोआपरेटिव सोसाइटी) बनी हुई हैं, वेरका पंजाब की मिल्क कोआपरेटिव सोसाइटी (दुग्ध सहकारी समिति) है जो पंजाब के अमृतसर जिले के वेरका कस्बे में शुरू की गई थी। इसी प्रकार अमूल गुजरात की कोआपरेटिव सोसाइटी है, वीटाहरियाणा की कोआपरेटिव सोसाइटी है। मिल्कफेड हिमाचल की दुग्ध कोआपरेटिव सोसाइटी है। नादौन के पास जलाड़ी में हिमाचल प्रदेश मिल्कफेड का चिलिंग सेंटर है जहाँ पर मिल्कफेड की अपनी गाड़ियां दुग्ध सहकारी समितियों का दूध इक्कठा करके ले के आती हैं।

राज्य (State)Federation Nameब्रांड नेम (Brand)
गुजरात (Gujarat)Gujarat Cooperative Milk Marketing Federation (GCMMF / Amul)Amul
कर्नाटक (Karnataka)Karnataka Milk Federation (KMF)Nandini
पंजाब (Punjab)Punjab State Cooperative Milk Producers’ Federation (MILKFED)Verka
राजस्थान (Rajasthan)Rajasthan Cooperative Dairy Federation (RCDF)Saras
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)Pradeshik Cooperative Dairy Federation (PCDF)Parag
तमिलनाडु (Tamil Nadu)Tamil Nadu Co-operative Milk Producers’ Federation (TNCMPF)Aavin
केरल (Kerala)Kerala Co-operative Milk Marketing Federation (KCMMF)Milma
बिहार (Bihar)Bihar State Milk Co-operative Federation (COMFED)Sudha
महाराष्ट्र (Maharashtra)Maharashtra State Cooperative Milk Federation (Mahanand)Mahanand
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)M.P. State Cooperative Dairy Federation (MPCDF)Sanchi
हरियाणा (Haryana)Haryana Dairy Development Cooperative Federation (HDDCF)Vita
आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh)Andhra Pradesh Dairy Development Co-op Federation (APDDCF)Vijaya
तेलंगाना (Telangana)Telangana State Dairy Development Co-op Federation (TSDDCF)Vijaya Telangana
ओडिशा (Odisha)Odisha State Cooperative Milk Producers’ Federation (OMFED)Omfed
पश्चिम बंगाल (West Bengal)West Bengal Cooperative Milk Producers’ Federation (WBCMPF)Benmilk
हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh)H.P. State Cooperative Milk Producers’ Federation (HPMILKFED)HIM
उत्तराखंड (Uttarakhand)Uttarakhand Cooperative Dairy Federation (UCDF)Anchal
झारखंड (Jharkhand)Jharkhand State Cooperative Milk Producers’ Federation (JMF)Medha
छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)Chhattisgarh Rajya Sahakari Dugdh MahasanghDevbhog
गोवा (Goa)Goa Dairy (Goa State Cooperative Milk Producers’ Union)Goa Dairy
असम (Assam)West Assam Milk Producers’ Co-operative Union (WAMUL)Purabi
जम्मू और कश्मीर (J&K)J&K Milk Producers’ Co-operative Federation (JKMPCL)Snowcap
सिक्किम (Sikkim)Sikkim Co-operative Milk Producers’ UnionSikkim Milk
त्रिपुरा (Tripura)Gomati Cooperative Milk Producers’ UnionGomati
मणिपुर (Manipur)Manipur State Milk Producers’ Cooperative UnionManipur Milk
नागालैंड (Nagaland)Nagaland State Dairy Co-operative FederationDimapur Dairy
मिजोरम (Mizoram)Mizoram Cooperative Milk Producers’ Union (MULCO)MULCO
मेघालय (Meghalaya)Meghalaya Milk Marketing FederationMeghalaya Milk
अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh)Arunachal Pradesh District Milk Producers Co-op UnionArunachal Dairy

Table of Contents

कोआपरेटिव सोसाइटी (सहकारी समिति ) क्या होती है

जब किसी इलाके के 10 या 10 से अधिक लोग एक उदेश्य के लिए एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं। अपनी समिति को रजिस्टर करवा के साथ काम करना शुरू करते हैं तो इस तरह की संस्थाओं को कोआपरेटिव सोसाइटी कहा जाता है। ये 10 लोग अलग अलग परिवारों से होने चाहिए।

जहाँ तक दुग्ध कोआपरेटिव सोसाइटियों की बात है ये किसानो से उचित मूल्य पर दूध लेती हैं। किसानो के अकाउंट में हर 10-10 दिन की अवधि में पैसा आता है और वित्त वर्ष खत्म होने के बाद किसानो को मुनाफे में हिस्सा भी दिया जाता है। जिस किसान ने जिस जिस मात्रा में दूध दिया होता है उसको उस मात्रा के हिसाब से मुनाफे का हिस्सा मिलता है।

ये दुग्ध सहकारी समितियां (मिल्क को-ऑपरेटिव सोसाइटी) कैसे खोली जाती हैं पढ़ने के लिए क्लिक करें

भारत में दुग्ध सहकारी समितियों (मिल्क कोआपरेटिव सोसाइटी) की शुरुआत कैसे हुई।

डॉ. वर्गीज कुरियन को “भारत का मिल्कमेन” और “श्वेत क्रांति” का जनक कहा जाता है। उन्होंने किस तरह भारत में डेयरी सहकारिता (Milkfed/Cooperative Network) की शुरुआत की आइये उनकी कहानी को शुरू से शुरू करते हैं।

डॉ. कुरियन पेशे से एक मैकेनिकल और धातु विज्ञान इंजीनियर थे, जिन्होंने अमेरिका से पढ़ाई की थी। उनकी पढ़ाई स्कॉलरशिप से हुई थी, उस स्कॉलरशिप की शर्त थी कि भारत लौटने पर उन्हें सरकारी डेयरी में 3 सालों के लिए काम करना था। इसलिए उन्हें 1949 में गुजरात के आनंद जिले में एक सरकारी डेयरी शोध केंद्र में काम करने भेजा गया।

उस समय आनंद जिले के किसान स्थानीय ‘पोल्सन डेयरी’ और बिचौलियों द्वारा किए जा रहे शोषण से परेशान थे। त्रिभुवनदास पटेल किसानों को संगठित करके एक छोटी सहकारी समिति बना रहे थे।

जब डॉ. कुरियन की सरकारी नौकरी के 3 साल पुरे हो गए तो वो गुजरात छोड़कर वापस मुंबई जाने लगे, तब त्रिभुवनदास पटेल ने उनसे किसानों की मदद करने का अनुरोध किया। डॉ. कुरियन रुक गए और यहीं से अमूल (AMUL – Anand Milk Union Limited) की नींव मजबूत हुई।

भैंस के दूध से मिल्क पाउडर बनाने का अनोखा काम

उस समय अंग्रेजों और पोलसन के बीच 1946 में समझौता हुआ था और अंग्रेजी सरकार ने ‘बॉम्बे मिल्क स्कीम’ शुरू की थी। उन्होंने आणंद (गुजरात) से मुंबई दूध सप्लाई करने का एकाधिकार पोलसन नाम की एक प्राइवेट डेयरी कंपनी को दे दिया था। पोलसन किसानों को बहुत कम पैसे देती थी और मुंबई में महंगा दूध बेचती थी।

जब किसानों का शोषण हुआ, तो उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के मार्गदर्शन में आंदोलन किया और 1946 में अपनी खुद की सहकारी समिति (Kaira Union – जो बाद में अमूल Anand Milk Union Limited बनी) बनाई।

भैंस के दूध से सूखा दूध बनाना

उस दौर में दुनिया भर के विशेषज्ञों का मानना था कि केवल गाय के दूध से ही मिल्क पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क बनाया जा सकता है, भैंस के दूध से नहीं। यूरोप और नूज़ीलैण्ड के लोग गाय के दूध से ही सूखा दूध बनाते थे।

चूंकि भारत में ज्यादातर दूध भैंस का होता था, इसलिए गर्मियों में ये दूध सड़ जाता था। डॉ. कुरियन और उनके साथी एच. एम. दलाया ने इतिहास रचते हुए पहली बार भैंस के दूध से मिल्क पाउडर और वाइट बटर बनाने की तकनीक खोजी। इस तकनीक ने अमूल और भारत के डेयरी उद्योग में क्रांति ला दी।

क्यूंकि गाय-भैंसें जब’सर्दियों में ज्यादा दूध देती हैं तब बचे हुए अतिरिक्त दूध का पाउडर बना लिया जाता है। गर्मियों में दूध की कमी होती थी तब इसी पाउडर से वापस दूध बना लिया जाता है।

सुखा दूध (Milk Powder) कैसे बनाया जाता है

सुखे दूध को बनाने के लिए सबसे पहले ताजे दूध को साफ करके उसका वसा (Fat) का स्तर सही किया जाता है।

फिर इस दूध को कम दबाव में गर्म किया जाता है, जिससे उसका लगभग 85% से 90% पानी भाप बनकर उड़ जाता है और दूध गाढ़ा हो जाता है।

इस गाढ़े दूध को एक बड़े गरम चैंबर में बारीक फुहार (Spray) के रूप में छिड़का जाता है। गर्म हवा के संपर्क में आते ही बचा हुआ पानी तुरंत सूख जाता है और दूध पाउडर के छोटे-छोटे कण बनकर नीचे गिर जाते हैं। इस पाउडर को ठंडा करके नमी से बचाने वाले डिब्बों या पैकेट में पैक कर दिया जाता है।

आनंद मॉडल का निर्माण

डॉ. कुरियन ने महसूस किया कि किसानों को बिचौलियों से बचाने के लिए एक त्रि-स्तरीय (3-Tier) ढांचा बनाना होगा, जिसे आज ‘आनंद पैटर्न’ कहा जाता है

गांव के स्तर पर: प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति

जिला दुग्ध उत्पादक संघ (District Milk Union), जो दूध प्रोसेस करेगा।

राज्य दुग्ध महासंघ (State Milk Federation), जो ब्रांडिंग और मार्केटिंग करेगा।

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ऑपरेशन फ्लड और NDDB की स्थापना। लाल बहादुर शास्त्री का दौरा

1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अमूल प्लांट (आनंद) का दौरा करने आए। उनको एक रात वहां के किसानो के पास रहने का मौका मिला वे वहां किसानों की खुशहाली देखकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने डॉ. कुरियन से पूरे देश में ‘अमूल मॉडल’ को लागू करने को कहा।

फिर 1965 में हुआ NDDB (National Dairy Development Board) का गठन । पूरे देश में इस मॉडल को फैलाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड बनाया गया और डॉ. कुरियन को इसका अध्यक्ष बनाया गया।

डॉ. कुरियन ने 1970 में ‘ऑपरेशन फ्लड’ लॉन्च किया। यह दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम था। इसके तहत यूरोपीय देशों से मिले दान (मिल्क पाउडर/बटर ऑयल) को बेचकर जो पैसा मिला, उससे भारत के कोने-कोने में डेयरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया गया।

राज्यों में Milkfed की शुरुआत

डॉ. कुरियन के इसी मॉडल और NDDB के सहयोग से भारत के अलग-अलग राज्यों में राज्य दुग्ध महासंघ बनाए गए

गुजरात: GCMMF (अमूल – AMUL)

पंजाब: Milkfed (वेरका – Verka)

राजस्थान: RCDDF (सरस – Saras)

कर्नाटक: KMF (नंदिनी – Nandini)

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डॉ. कुरियन के काम का भारत पर प्रभाव

भारत, जो 1950-60 के दशक में दूध और दूध पाउडर आयात करता था, 1998 तक अमेरिका को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन गया।

गॉव की दुग्ध सहकारी समितियां कैसे काम करती हैं

गॉव के 10 से 15 किसान जो कि अलग अलग घर से होते हैं मिलकर दुग्ध सहकारी समिति की शुरुआत करते हैं। ये किसान मिलकर शेयर कैपिटल जमा करते हैं और राज्य के सहकारिता विभाग में समिति का पंजीकरण (Registration) कराते हैं।

गाँव के सदस्य किसान आपस में मिलकर एक प्रबंध समिति चुनते हैं। यह समिति एक सचिव और एक परीक्षक (Tester) नियुक्त करती है जो गाँव के कलेक्शन सेंटर (डेयरी) का दैनिक काम संभालते हैं

गाँव के केंद्र पर दूध का संकलन (Milk Collection)

गॉव के कई किसान हर सुबह और शाम अपने मवेशियों का दूध गाँव के कलेक्शन सेंटर केंद्र पर लेकर आते हैं।

दूध लाते ही ऑटोमैटिक मिल्क एनालाइजर मशीन में दूध का सैंपल डाला जाता है।

यह मशीन 30 सेकंड में दूध में FAT और SNF (Solids-Not-Fat) की मात्रा तुरंत बता देती है।

किसान के नाम, दूध के वजन और क्वालिटी की रसीद कंप्यूटर से प्रिंट होकर किसान को तुरंत मिल जाती है।

दूध की कीमत लीटर के हिसाब से तय नहीं होती, बल्कि FAT और SNF की मात्रा के आधार पर तय होती है। जितना गाढ़ा और शुद्ध दूध होगा, प्रति लीटर रेट उतना ही ज्यादा मिलेगा।

दूध का परिवहन और प्रोसेसिंग

गाँव का दूध एक बड़े इंसुलेटेड टैंकर में इकट्ठा करके पास के चिलिंग सेंटर भेजा जाता है जहाँ दूध को खराब होने से बचाने के लिए तुरंत 4°C तक ठंडा किया जाता है।

ठंडा दूध बड़े टैंकरों के जरिए जिला मिल्क यूनियन के मुख्य डेयरी प्लांट पहुँचता है।

दूध का पाश्चुरीकरण (Pasteurization) किया जाता है मतलब दूध को एक निश्चित तापमान पर गर्म करके ठंडा किया जाता है ताकि हानिकारक बैक्टीरिया खत्म हो जाएं।

दूध को थैलियों में पैक किया जाता है या उससे दही, पनीर, मक्खन, घी, लस्सी, और मिठाइयां बनाई जाती हैं, जिन्हें बाज़ार में बेचा जाता है।

पाश्चुरीकरण (Pasteurization) क्या होता है ये नाम कैसे पड़ा पढ़ने के लिए क्लिक करें

किसानों के खाते में पैसे का भुगतान (10-Day Payment Cycle)

Milkfed और अन्य कोऑपरेटिव समितियां किसानों को हर 10 दिन में दूध का भुगतान करती हैं

जो दूध 1 से 10 तारीख तक दिया जाता है उसका भुगतान 13 से 15 तारीख के बीच किया जाता है ।

जो दूध 11 से 20 तारीख तक दिया जाता है उसका भुगतान 23 से 25 तारीख के बीच किया जाता है ।

और जो दूध 21 से 31 तारीख तक दिया जाता है उसका भुगतान 3 से 5 तारीख के बीच किया जाता है ।

डेयरी प्लांट से किसानों का कुल पैसा गाँव की समिति के जरिए या सीधे किसान के बैंक खाते (NEFT/RTGS) में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

वार्षिक लाभ और लाभांश

चूंकि यह एक सहकारी संस्था होती है इसलिए इसका मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं बल्कि किसानों को संपन्न बनाना होता है।

अत: वित्तीय वर्ष के अंत में जिला मिल्क यूनियन और गाँव की समिति के खातों का ऑडिट होता है।

और सालभर में दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स (घी, पनीर आदि) बेचकर जो शुद्ध मुनाफा होता है उसे सदस्यों में बाँटा जाता है।

किसान ने समिति में जो शेयर खरीदे होते हैं उस पर 3% से 12% तक का मुनाफा दिया जाता है।

जिस किसान ने पूरे साल में जितना अधिक लीटर दूध समिति को बेचा होता है उसे प्रति लीटर के हिसाब से उतना ही ज्यादा बोनस दिया जाता है। ये भी सीधे किसानो के अकाउंट में ट्रांसफर होता है।

किसानों को मिलने वाले अतिरिक्त फायदे

दूध के पैसे और मुनाफे के अलावा Milkfed सहकारी समितियां किसानों को और सुविधाएं भी देती हैं जैसे सस्ता पशु आहार, पशु चिकित्सा, कृत्रिम गर्भाधान, टीकाकरण और डॉक्टरों की सुविधा आदि

चारा काटने वाली मशीन, मिल्किंग मशीन और शेड बनाने के लिए सरकारी योजनाओं के तहत सब्सिडी।

क्यूंकि ये दुग्ध सहकारी समितियां लोगो के द्वारा चलाई जाती है और इसमें मुनाफे पर सारे लोगो का बराबर अधिकार होता है इसलिए एक समय अंग्रेजो की गुलामी के तुरंत बाद दूध की एक एक बून्द को तरसने वाला भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा मिल्क प्रोडूसर बन गया।