किसी भी जगह का पारंपरिक भोजन वहाँ के मौसम और ज़रूरतों से तय होता है। समय के साथ जब विकास होता है तो बाहर से लोग उस जगह आते हैं और उस जगह के लोग बाहर जाते हैं।

इससे खाने-पीने में कई नए बदलाव होते हैं लेकिन कठिन परिस्थितियों में पैदा हुआ वही पुराना खाना उस जगह का पारंपरिक भोजन (Traditional Food) बन जाता है। आइये एक एक करके काँगड़ा के ऐसे व्यंजनों के बारे में जानते हैं।

रेडू/खोरु /दही-कढ़ी

इसे ताज़ी छाछ (लस्सी) से बनाया जाता है साथ ही इसमें छौंक के लिए सरसों का तेल, साबुत धनिया, प्याज ,मेथी और हींग का भरपूर उपयोग होता है। लस्सी ताज़ी होनी चाहिए क्यूंकि ताज़ी लस्सी मीठी होती है

और उस मीठी लस्सी से रेडू में जो फ्लेवर आता है उसकी बात ही अलग होती है। साथ में अगर गर्मा गर्म मक्की की रोटी मिल जाये तो बंदा 3-4 रोटियां तो खा ही लेता है। लस्सी की जगह जब दहीं का इस्तेमाल होता है तो उसे पलदा कहा जाता है।

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अंबुआ

यह अधपके या पूरी तरह से पके आम से बनने वाला एक खास खट्टा-मीठा व्यंजन है। इसे सरसों के तेल, मेथी दाना, गुड़ और चुटकी भर मसालों के साथ पकाया जाता है। गर्मियों के मौसम में इसे बेहद चाव से मक्की की रोटी के साथ खाया जाता है और साथ में अगर चने माह की दाल मिल जाये तो इसको खाने का मजा ही कुछ और है।

पतरोड़े / पतोड़े

अरबी के पत्तों पर बेसन और मसालों का लेप लगाकर, उन्हें रोल करके भाप में पकाया जाता है। इसके बाद इन्हें पतला पतला काटकर तवे पर धीमी आँच में फ्राई किया जाता है। इसके साथ अगर खाने में खीर न मिले तो काँगड़ा के लोगो का बरसात का मौसम पूरा नहीं होता यह बरसात और मानसून के मौसम का विशेष व्यंजन है।

पहाड़ी में कहते हैं कि “खीर पतरोड़ा खाना कन्ने पींगां दा झटारा लेना”… यानी सावन के मौसम में खीर पतरोड़ा खा के पेड़ के साथ झूला झूलने में सावन का आनंद आता है।

भटुरु

यह उत्तर भारत के तले हुए भटूरों से अलग होता है। कांगड़ा में भटुरु, खमीर (Yeast) उठाकर बनाई गई एक खास पारंपरिक रोटी होती है, जिसे तवे पर या सीधे अंगारों पर सेका जाता है। यह दाल या कढ़ी के साथ खाई जाती है।

बबरू

गेहूं के आटे में शक़्कर और अजवाइन घोलकर इसका बैटर तयैर किया जाता है और कप या कटोरी के साथ इसे तवे पर डाला जाता है फिर आम के पत्ते के साथ इसे पुरे तवे पर फैला दिया जाता है। इसे धीमी आँच पर थोड़ा थोड़ा तेल डालकर पकाया जाता है और खीर के साथ खाया जाता है।

कई जगहों पर गेहूं की लोई में पीसी हुई उड़द की दाल (माह की दाल) के मसालेदार पेस्ट को भरकर गहरे तेल में तला जाता है। और अक्सर शाम को गर्म चाय और इमली या पुदीने की तीखी चटनी के साथ खाया जाता है।

सिड्डू

विशेष आकृतियों में ढाले गए मीठे पकवान, जो आटे और गुड़ के मेल से बनते हैं। गेहूं के आटे में ईस्ट मिलाकर खमीर उठने के लिए छोड़ देते हैं उसके बाद उबली उड़द दाल या मैश आलू में पिसा अखरोट/खसखस, हरी मिर्च, अदरक-लहसुन और मसाले मिलाकर तैयार करते हैं।

उसके बाद फूले हुए आटे की मोटी लोई बेलकर बीच में स्टफिंग करते हैं और अर्धचंद्राकार (गुझिया की तरह) मोड़कर किनारे बंद कर देते हैं। तैयार सिड्डू को मोमो स्टीमर या बड़े पतीले में डालकर उसको ऊपर से ढक्कन से 15-20 मिनट तक बंद कर देते हैं ये भाप से पकता है और देसी घी व चटनी के साथ खाया जाता है।

जो सिड्डू सिंपल बिना स्टफ्फिंग के बनता है उसे भैंस के देसी घी और शहद के साथ खाया जाता है।

भुजू

ये कुछ कुछ सरसो के साग की तरह बनाया जाता है ये अधिकतर मूली के पत्तों से बनता है और मक्की की रोटी के साथ खाया जाता है।

गलगल और कच्चे आम का अचार

स्थानीय बड़े नींबू (गलगल) जिसे खट्टा कहते हैं उसका खट्टा-मीठा अचार और आम का अचार भी आम के मौसम में डाला जाता है जो लंबे समय तक खराब नहीं होता।

खट्टा

गलगल जिसे स्थानीय भाषा में खट्टा कहते हैं इसके छिलके उतारे जाते हैं। हरी मिर्ची , नमक और गुड़ को एक कुण्डी में डंडे के साथ पीसा जाता है और गलगल के छिलको में ही गलगल को इस पीसे हुए नमक, मिर्ची और गुड़ या शक़्कर के साथ खाया जाता है ये सर्दियों में धुप में बैठकर खाया जाता है।

होलां

गेहूं की फसल के मौसम में जब गेहूं में बीजे हुए काले चने, जब हरे होते हैं उस समय उनको जड़ सहित उखाड़ा जाता है। बहुत सारी लकड़ियां इक्कठी करके उनमे आग लगाई जाती है और इन चनो को उस आग में डाल दिया जाता है। कच्चे चनो को छिलकों सहित जलाकर, जो चने आग बुझने के बाद राख से इक्कठे किये जाते हैं उनको होलां कहा जाता है और इनको छिलके उतारकर खाया जाता है।

नोट :- कांगड़ा के खाने में अत्यधिक तीखे मसालों के बजाय सुगंधित और पाचक मसालों (जैसे हींग, सौंफ, जीरा) का उपयोग होता है। मिट्टी का चूल्हा और लकड़ी की आग से भोजन में एक अलग तरह की सोंधी खुशबू आती है। दैनिक दाल और साग बनाने के लिए लोहे के बर्तनों का प्रयोग किया जाता है जो खाने का स्वाद और पौष्टिकता दोनों बढ़ाते हैं।

काँगड़ा के विवाह, त्योहारों और उत्सवों का खान पान

कांगड़ी ‘धाम’

हमें यकीन है कि इसको जानने के लिए अधिकतर लोग ब्लॉग पर आये होंगे।

धाम क्या है

यह एक पारंपरिक उत्सव भोज है जो शादी-ब्याह, त्योहारों और विशेष अवसरों पर परोसा जाता है।

धाम को केवल विशेष रसोइये ही बनाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बोटी’ कहा जाता है। यह कला पीढ़ियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती है। धाम को जमीन पर बैठकर ‘पत्तल’ (पत्तियों से बनी थाली) में खाया जाता है। इसको खाने में किसी भी तरह के चम्मच का उपयोग नहीं होता बल्कि ये केवल हाथों से ही नीचे पंद (एक तरह की चटाई) पर बैठकर खाया जाता है।

धाम के मुख्य व्यंजन

मदरा

यह कांगड़ी धाम का सबसे मुख्य व्यंजन है। इसे मुख्य रूप से सफेद चनों को गाढ़े दही, घी और खड़े मसालों (जैसे बड़ी इलायची, दालचीनी, लौंग) के साथ धीमी आंच पर पकाकर बनाया जाता है। इसी तरह से मदरा किसी भी दाल से बनाया जा सकता है जैसे धर्मशाला के समीप लगते इलाकों में तो 7 -8 टाइप के मदरे बनाये जाते हैं। लेकिन सबसे प्रशिद्ध मदरा सफ़ेद काबुली चनों से ही बनता है।

माह की दाल

बिना छिलके वाली उड़द की दाल, जिसे कोयले और घी का छौंक (धुएं का तड़का) देकर एक अनोखा स्मोकी स्वाद दिया जाता है।

खट्टा

यह काले चने से बनता है, जिसमें अमचूर (सूखा आम) या गलगल (बड़ा नींबू) के रस का उपयोग करके खट्टापन लाया जाता है।

मीठा

भोजन का अंत आमतौर पर मीठे चावल (मीठे भात) या गुड़/मेवों से बने व्यंजन के साथ होता है।

चरोटी और तीण

पारंपरिक रूप से इन व्यंजनों को ‘चरौटी’ (पीतल का एक बड़ा गोल बर्तन) में धीमी आंच पर बनाया जाता है, जिससे मसालों का स्वाद गहराई से भोजन में उतर जाता है।

इन बड़ी बड़ी चरोटियों को रखने के लिए जमीन में मिटटी खोदकर एक जगह बनाई जाती है जिसे तीण कहते हैं। पारंपरिक कांगड़ी धाम की एक खास बात यह है कि इसमें प्याज और लहसुन का उपयोग नहीं किया जाता, फिर भी दही और खड़े मसालों के तालमेल से स्वाद बेहद समृद्ध होता है। वैसे अब धाम में प्याज और लहसून का इस्तेमाल होने लगा है।

kangri-dham
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निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश में ऐसी कई डिशिस (व्यंजन) हैं जो यहाँ के भूगोल और मौसम की ज़रूरतों के हिसाब से बने हैं। पुराने समय में हिमाचल प्रदेश की भूगोलिक स्थिति इस तरह की थी कि यहाँ पर अधिकतर बाज़ार, गाँवो से बहुत अधिक दूर थे।

इसलिए खाने पीने की सामान्य चीज़ें भी लोगों की पहुँच से दूर थी और उन सामान्य चीज़ों तक पहुँचने के लिए हिमाचल के लोगो को कई दुर्गम रास्तों को पार करना पड़ता था जो कि रोज़ रोज़ संभव नहीं था।

पेट भरने की इसी जरुरत ने हिमाचल के इन पारम्परिक व्यंजनों को जन्म दिया जो समय बीतने के साथ यहाँ के लोगो के मुख्य भोजन में सुमार हो गए।

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