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शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

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शंख का भारतीय इतिहास में विशेष महत्व है। पुराने समय में नया घर बनाते समय नीव में शंख गाड़ने की परंपरा थी, बंगाल में नयीं दुल्हन को शंख का चूड़ा पहनाने का रिवाज़ था, कथा और पूजा समय उत्तर भारत में शंख बजाया जाता है और उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत के कई राज्यों में मृत्यु के समय मृत आत्मा की शांति के लिए शंख बजाया जाता है।

परन्तु क्या हम जानते हैं कि ये शंख बनता कैसे है आइए जानते हैं समुद्री घोंघे के जन्म से लेकर उसके शंख में बदलने, इतिहास, व्यापार, धार्मिक महत्व और इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे की पूरी कहानी।

शंख कैसे बनता है

एक जीव होता है घोंघा, हिमाचली में इसको फिल कहते हैं इसकी पीठ पर प्रकृति ने इसकी सुरक्षा के लिए एक खोल लगाया होता है। अपने जीवन के लिए खतरा अनुभव होने पर ये इसी में छुप जाता है।

शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

इसकी मृत्यु के बाद बैक्टीरिया और छोटे जीव इसके आंतरिक शरीर को तो ख़त्म कर देते हैं परन्तु इसकी खोल डीकंपोज होने में बहुत समय लगाती है अगर ये खोल ऐसी जगह दब जाये जहाँ पर नमी और गीली मिटटी हो तो ये कई सालो तक इसी तरह रह सकती है।

ये तो बात हुई धरती पर रहने वाले घोंघे यानि फिल की परन्तु घोंघे की जो प्रजाति समुद्र में रहती है जिसे समुद्री घोंघा (Marine Snail) कहते हैं ये समुद्र के पानी से कैल्शियम सोखता है

और इसका खोल बहुत बड़ा और भारी हो जाता है परन्तु पानी में होने के कारण इसको खोल को उठाने में कोई परेशानी नहीं होती । मृत्यु के बाद घोंघे का अंदर का नरम शरीर सड़कर खत्म हो जाता है या समुद्री जीवों द्वारा खा लिया जाता है और पीछे छूट जाता है पवित्र शंख।

समुद्र की गहराइयों से शंख निकालने की प्रक्रिया

हलके और छोटे शंख तो अपने आप समुद्र के तट पर आ जाते हैं परन्तु भारी शंख समुद्र की गहराइयों में पड़े रहते हैं इनको गोताखोर समुद्र की गहराइयों में जाकर पानी के नीचे से निकालकर लाते हैं।

तमिलनाडु (तूतीकोरिन, मन्नार की खाड़ी), केरल, गुजरात (बेट द्वारका) और श्रीलंका के तटों पर पेशेवर गोताखोर समुद्र में 40-60 फीट नीचे जाकर शंख जमा करते हैं।

नोट :- जो गोताखोर या मछुआरे व्यावसायिक स्तर पर शंख या मोती निकालते हैं उन्हें राज्य के मत्स्य पालन विभाग या तटीय प्रशासन से विशेष लाइसेंस और परमिट लेना अनिवार्य होता है। सरकार विशिष्ट समुद्री क्षेत्रों के ठेके के लिए टेंडर जारी करती है। जो ठेकेदार सबसे ऊंची बोली लगाता है उसे एक निश्चित समय के लिए शंख, सीप और कस्तूरी एकत्र करने का ठेका मिलता है।

शंख कितने प्रकार के होते हैं

समुद्र से निकाले गए शंखों को साफ़ करके उनकी गुणवत्ता के आधार पर अलग अलग श्रेणियों में छाँटा जाता है।

दक्षिणावर्ती शंख

सामान्य शंख का घुमाव बाईं तरफ होता है लेकिन दक्षिणावर्ती शंख का घुमाव दाईं तरफ होता है। हज़ारों शंखों में से कोई एक ही ऐसा मिलता है। इसे देवी लक्ष्मी का साक्षात रूप माना जाता है और इसकी कीमत लाखो से लेकर करोड़ो में होती है।

पट्टी शंख

ये शंख समुद्र की गहराई से प्राप्त होता है ये बेदाग, पूरी तरह सफेद और चिकने शंख होते हैं। ये शंख दक्षिणावर्ती शंख के बाद सबसे महंगे बिकते हैं।

पट्टई

एकदम सही, मजबूत और बिना छेद वाले शंख। इन शंखो को पहले उबाला जाता है जिससे इनकी चमड़ी निकल जाती है फिर मशीन के द्वारा इनके ऊपरी हिस्से पर छेद किया जाता है और फिर इसकी फिनिशिंग और पॉलिशिंग की जाती है।

शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

अल्लाकु

थोड़े घिसे हुए या छोटे आकार के शंख।

मट्टम या पूझियान

वे शंख जिनमें समुद्री कीड़ों ने छोटे-छोटे छेद कर दिए हों। इनकी कीमत बहुत कम होती थी क्योंकि इनसे अच्छी चूड़ियाँ नहीं बनती थीं। इनको भी थोड़ा मुरम्मत के बाद बेचने योग्य बना दिया जाता है।

सोट्टू

बहुत छोटे शंख। हॉर्नेल ने अपनी रिपोर्ट में छोटे शंखों को पकड़ने पर प्रतिबंध लगाने और संरक्षण की सिफारिश की थी। क्यूंकि ये उन घोंघो से निकाले जाते हैं जो बहुत छोटे होते हैं और जिन्होंने अभी प्रजनन भी नहीं किया होता है।

शंखो के व्यापार के कारण हिन्दू समाज में एक नयी जाति बनी है शंखारी

कच्चे शंखों का सबसे बड़ा बाज़ार बंगाल (विशेषकर ढाका और कोलकाता) रहा है, जहाँ ‘शंखारी’ कारीगर आरी और छैनी से काटकर चूड़ियाँ, बर्तन और नक्काशीदार शंख बनाते हैं।

बंगाल में शंख की चूड़ियाँ बनाने वाले कारीगरों की एक विशेष हिंदू जाति बन गई है , जिसे ‘शंखारी’ कहा जाता है। ढाका शहर की ‘शंखारी बाज़ार’ गली इस उद्योग का मुख्य गढ़ थी।

जेम्स हॉर्नेल (1914) ने अपनी किताब द सेक्रेड शंख ऑफ इंडिया में लिखा है कि इस पतली सी गली में सैकड़ों शंखारी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला में लगे हुए थे।

परिवार के पुरुष शंख काटने और तराशने का भारी काम करते थे, जबकि महिलाएँ और बच्चे पॉलिश करने, रंग भरने और पैकिंग का काम संभालते थे। भारत में जातियों की व्यवस्था कैसे शुरू हुई इस हिन्दू समाज को देखकर समझा जा सकता है।

कोड़ियाँ और सीपियाँ भी घोंघे की ही अन्य प्रजातियों से बनती हैं

समुद्री घोंघो से हमें शंख के साथ साथ कोड़ियाँ और सीपियाँ भी मिलती हैं। कौड़ियों को तो रुपया और पैसा आने से पहले, पैसों के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था।

जेम्स हॉर्नेल (1914) ने अपनी किताब द सेक्रेड शंख ऑफ इंडिया‘ में बंगाल और उड़ीसा के रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए लिखा है कि कैसे 20,000 से 25,000 कौड़ियों का मूल्य 1 ब्रिटिश-इंडियन सिल्वर रुपये के बराबर होता था।

शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

उस समय इसे लेकर कुछ कहावतें मशहूर हुई जैसे 2 कोड़ी की औकात नहीं या एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा। इन कौड़ियों को विवाह में दुल्हन को कलीरों के रूप में पहनाने की परम्परा भी उत्तर भारत में बहुत प्रचलित थी।

समुद्री सीपियाँ, सीप (Oyster / Mussel) नामक जीव से बनती हैं। इसका कवच दो अलग-अलग पल्लों से मिलकर बना होता है, जो एक तरफ से जुड़े रहते हैं।

सीपियों के अंदर जब रेत का कोई कण चला जाता है तो जीव रक्षा के लिए उस पर नेकर की परतें चढ़ाता है जिससे वो सीप एक बहुमूल्य मोती में परिवर्तित हो जाती है।

शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

पुराने समय में शंख को लेकर अन्धविश्वास

हॉर्नेल ने आम जनमानस में शंख से जुड़े अंधविश्वासों को भी दर्ज किया है

बुरी नज़र से बचाने के लिए बच्चों के गले या कलाई पर शंख के छोटे टुकड़े या कौड़ियाँ बांधी जाती थीं।

तमिलनाडु और बंगाल के किसान अपने पालतू पशुओं के गले में छोटे शंख की माला बांधते थे ताकि वे बीमारियों और बुरी नज़र से बचे रहें।

आयुर्वेदिक भस्म और उनके फायदे

शंख को जलाकर बनाई जाने वाली ‘शंख भस्म’ का उपयोग पेट के रोगों के इलाज के लिए किया जाता था।

इसके पाउडर का उपयोग त्वचा रोगों और रंगत सुधारने के लिए भी होता था।

शंख को विशेष रूप से काटकर एक नलीदार पात्र बनाया जाता था जिसे तमिलनाडु में ‘पालकिन्नम’ कहते थे। इसका उपयोग नवजात शिशुओं को दूध या औषधि पिलाने के लिए किया जाता था क्योंकि शंख में दूध रखने को बहुत शुद्ध माना जाता था।

पौराणिक कथाएँ और धार्मिक मान्यताएँ

हॉर्नेल ने भारतीय साहित्य के संदर्भों का अध्ययन करके शंख के धार्मिक महत्व को प्रस्तुत किया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले 14 रत्नों में से एक शंख भी था। इसी कारण इसे देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है।

शंख को भगवान विष्णु का मुख्य प्रतीक माना गया है, जिसे ‘पांचजन्य‘ कहा जाता है। अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त, भीम के शंख का नाम पौण्ड्र, युधिष्ठिर के शंख का नाम अनन्तविजय, नकुल के शंख का नाम सुघोष, सहदेव के शंख का नाम मणिपुष्पक था इससे पता चलता है कि भारत में शंख का इतिहास कितना पुराना है

समुद्री घोंघे मेटिंग कैसे करते हैं और बच्चों को जन्म कैसे देते हैं

सामान्य ज़मीनी घोंघे अधिकतर उभयलिंगी होते हैं यानि उनमे नर और मादा दोनों ही जीवों की विशेषताएं होती हैं लेकिन शंख वाले मुख्य समुद्री घोंघे एकलिंगी होते हैं यानी नर और मादा घोंघे अलग-अलग होते हैं।

ये मुख्य रूप से फरवरी से मई के दौरान समुद्र तल पर एकत्र होते हैं। नर घोंघा अपनी मेंटल ग्रंथि के पास मौजूद विशेष जननांग की मदद से शुक्राणुओं को मादा घोंघे के शरीर के अंदर स्थानांतरित करता है।

मादा घोंघा अपने शरीर से एक चिपचिपी और जिलेटिनयुक्त प्रोटीन की बड़ी लड़ी बनाती है यह लगभग 6 से 10 इंच लंबी, सर्पिलाकार और किसी भेड़ के सींग जैसी दिखाई देती है। इसे तमिल में ‘पाम्पू पाराई’ भी कहा जाता है।

इस बने हुए ढाँचे में सैकड़ों छोटे-छोटे कमरे होते हैं। हर कमरे में कई-कई अंडे सुरक्षित रखे जाते हैं। मादा घोंघा इस पूरे एग कैप्सूल के निचले हिस्से को समुद्र की तली में बालू या पत्थरों के नीचे गाड़ देती है ताकि यह बह न जाए।

शंख कैसे बनता है? कीड़े से लेकर पूजा की थाली तक शंख का रहस्य

अंडों के अंदर पल रहे भ्रूण कैप्सूल के अंदर मौजूद प्रोटीन और तरल पदार्थ को खाकर बड़े होते हैं। कुछ हफ्तों के बाद अंडे फूटते हैं और उनसे ‘वेलिगर’ लार्वा निकलते हैं। अंडों से बाहर निकलते समय ही इन नन्हें बच्चों की पीठ पर एक बेहद नाजुक खोल बनी होती है।

अंडे से बाहर आते ही छोटे घोंघे समुद्र की तली में मौजूद सूक्ष्मजीवों, काई और छोटे कीड़ों को खाकर खुद अपनी खोल बढ़ाना शुरू कर देते हैं।

समुद्री घोंघो की बहुत सी प्रजातियाँ बिलुप्ति तक पहुँच चुकी हैं

समुद्री घोंघे कई मानवीय गतिविधियों और पर्यावरणीय संकटों के कारण आज विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों और जेम्स हॉर्नेल जैसे समुद्री विशेषज्ञों के अनुसार इसके मुख्य कारण हैं

व्यापारिक मुनाफे के कारण गोताखोर और मछुआरे छोटे घोंघों को भी पकड़ लेते हैं। इससे उन्हें अंडे देने और अपनी आबादी बढ़ाने का मौका ही नहीं मिलता।

समुद्र में मछली पकड़ने के लिए बिछाए जाने वाले भारी जाल, खींचे जाने पर, समुद्र की तली को बुरी तरह खुरच देते हैं जिससे घोंघों के अंडे और उनके प्राकृतिक घर नष्ट हो जाते हैं।

बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र का पानी धीरे-धीरे एसिडिक होता जा रहा है।

अम्लीय पानी घोंघों के शरीर द्वारा कैल्शियम सोखने की क्षमता को कम कर देता है। इसके कारण नए बच्चे अपनी खोल ठीक से नहीं बना पाते और मौजूदा घोंघों की खोल पतली और कमज़ोर होकर घुलने लगती है।

घोंघे समुद्र की तली में रहते हैं और वहीं से अपना भोजन लेते हैं। जहरीले रसायनों और प्लास्टिक के बारीक कणों के पेट में जाने से इनकी असमय मौत हो रही है।

घोंघे बहुत धीमी गति से बढ़ते हैं और उनका जीवनचक्र काफी लंबा होता है।

लगातार शिकार होने के कारण वयस्क घोंघों की संख्या इतनी कम हो चुकी है कि उनका आपस में मिलना और प्रजनन करना मुश्किल होता जा रहा है।

मन्नार की खाड़ी, पंबन और तूतीकोरिन जैसे तटीय इलाकों में जहाजों की आवाजाही, बंदरगाहों के निर्माण और समुद्री रेत के खनन से इनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो गया है।

नोट :- मछलियों की तरह ही मॉनसून के दौरान उस समय गोताखोरी और शिकार पर प्रतिबंध रहता है।

निष्कर्ष

इंसान ने अपने लालच, सही जानकारी न होने के कारण और पाखंड के कारण, सारी प्रजातियों का जीना मुश्किल किया हुआ है। कई जीवो की सारी की सारी प्रजातियाँ, इंसानी हस्तक्षेप के कारण पृथ्वी पर बिलुप्त हो चुकी हैं और कई बिलुप्ति की कागार पर हैं

केवल इंसान ही बढ़कर साढ़े आठ अरब हो चुके हैं। लेकिन इंसान ये भूल जाता है कि वो भी इसी प्रकृति का हिस्सा है और उसको जिन्दा रहने के लिए और अपने भोजन के लिए पेड़ पौधों के साथ साथ , तितलियों, मधुमखियों, तैतेया, चींटियों और यहाँ तक की घोंघो तथा सूक्षम जीवों की भी अवस्य्क्ता होती है क्यूंकि इनके बिना परागण संभव नहीं और परागण के बिना बीज संभव नहीं।

शंख कैसे बजाते हैं

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शंख एक बांसुरी की तरह नहीं होता इसको बजाने के लिए फूंक नहीं, होंठो को गोल करके, मुँह से आवाज निकालनी होती है वही मुँह से निकली आवाज, शंख के अंदर से परवर्तित होकर शंख की आवाज़ बन जाती है।

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