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पूजा में दूब घास क्यों चढ़ाई जाती है? जानिए इतिहास व फायदे

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पूजा के कलश के जल में दूब घास (हिमाचली में ध्रुव घास) रखी जाती है। हवन कुण्ड की वेदी पर और कथा आदि में देवताओं की प्रतिमाओं के स्नान के लिए दूर्वा का प्रयोग जल छिड़कने के लिए किया जाता है। विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी शुभ कार्यों के संकल्प और पूजन में दूर्वा का उपयोग होता है।

पूजा में दूब घास क्यों चढ़ाई जाती है? जानिए इतिहास व फायदे

लेकिन क्या हम जानते हैं कि दूब घास का उपयोग पूजा और अनुष्ठानों के लिए कब और क्यों शुरू हुआ। आइये शुरू से शुरू करते हैं।

ऋग्वेद और अथर्ववेद में दूब घास का पहली बार उल्लेख

ऋग्वेद जिसकी रचना ईसा से लगभग 1500 साल पहले हुए थी यानि आज से लगभग 3500 साल पहले, उसमे दूब घास का पहली बार उल्लेख मिलता है।

नोट :- “भारतीय सभ्यता के शुरुआत समय में वेद लिखे नहीं गए थे क्यूंकि भारतीय उपमहाद्वीप पर गुरु-शिष्य परंपरा थी और इस परम्परा में गुरु द्वारा बोलकर और शिष्य द्वारा सुनकर याद रखा जाता था इसलिए इन्हें श्रुति कहा गया। वेदों को पांडुलिपियों के रूप में लिखकर बहुत बाद में, गुप्त काल में तयैर किया गया।”

  • 10वा मंडल, सूक्त 134, मन्त्र 5
  • 10वा मंडल, सूक्त 142, मन्त्र 7
  • 10वा मंडल, सूक्त 142, मन्त्र 8
  • 10वा मंडल, सूक्त 161, मन्त्र 4

इन मंत्रों में दुर्बा के माध्यम से प्रार्थनाएं तथा दुर्बा के माध्यम से गंभीर बिमारियों के इलाज का बर्णन मिलता है। दूब को अमरता से जोड़ा गया है क्यूंकि दूब घास सूखने के बाद, बारिश होने के बाद फिर से हरी भरी हो जाती है और इस प्रकार इसका जीवन चक्र कभी खत्म नहीं होता। इस प्रकार इसको परिवार की वंश वृद्धि से जोड़ा जाता था।

पूजा में दूब घास क्यों चढ़ाई जाती है? जानिए इतिहास व फायदे

ऋग्वेद में इसके लिए कहा गया है—“काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती” (हर गांठ से बार-बार अंकुरित होने वाली)। इसी कारण 3,000 साल पहले हमारे पूर्वजों ने इसके कभी न नष्ट होने वाले गुण को पहचानकर इसे अपने धर्म, संस्कारों और जीवन-दर्शन का हिस्सा बना लिया था।

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में बताए हैं दूब घास के फायदे

प्राचीन आयुर्वेद में दूब घास का उपयोग एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में होता था । चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके वैज्ञानिक और चिकित्सीय गुणों का विस्तार से वर्णन है।

दूब में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और टिश्यू को दोबारा जोड़ने की क्षमता होती है। जब कटने या छिलने पर इसका पेस्ट लगाया जाता है तो यह संक्रमण को रोकता है और घाव को तेज़ी से भरता है।

दूब की तासीर अत्यंत ठंडी होती है। यदि किसी व्यक्ति के शरीर में अत्यधिक जलन, पेट मे एसिडिटी या पेशाब में जलन की समस्या होती थी तो चरक संहिता के अनुसार दूब का रस पिलाने से शरीर की आंतरिक गर्मी तुरंत शांत हो जाती है। इसके इसी गुणों के कारण आयुर्वेद में दूब का इस्तेमाल होने लगा।

नोट:-चरक संहिता को “अग्निवेश तंत्र” के रूप में महर्षि अग्निवेश द्वारा ईसा से 600 ईस्वी पूर्व लिखा गया था बाद में ईसा से 200 ईस्वी पूर्व इसको महर्षि चरक द्वारा पुनर्गठित किया गया था इसलिए ये चरक संहिता के रूप में प्रसिद्ध हुई।

सुश्रुत संहिता को महर्षि सुश्रुत द्वारा ईसा से 600 ईस्वी पूर्व लिखा गया था इसमें प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद की सर्जरी, पथरी निकालने की विधि। शल्य उपकरण जैसे कैंची, चिमटी, सुई जैसे औजारों का विवरण । सर्जरी से पहले रोगी को बेहोश करने के लिए मदिरा और जड़ी-बूटियों का प्रयोग। मानव शरीर की अंदरूनी बनावट को समझने के तरीके बताये गए हैं। आज से लगभग 2500- 3000 साल पहले लिखी गई इस किताब में इस तरह का विवरण आधुनिक डेंटिस्ट्री को हैरान कर देता है इसलिए ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में ‘रॉयल ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स’ की इमारत में महर्षि सुश्रुत का एक स्टैच्यू लगा हुआ है, जहाँ उन्हें “शल्य चिकित्सा का जनक” के रूप में सम्मानित किया गया है।

दूब घास कैसे फैलती है

दूब घास मुख्य रूप से दो तरीकों से फैलती है। तनो के माध्यम से और बीजो के माध्यम से

दूब घास में बहुत सी गांठे होती है ये जैसे जैसे आगे बढ़ती है और आगे बढ़कर जमीन को छूती हैं ये गांठे वहाँ पर अपनी जड़ें बना देती हैं और ऊपर की तरफ नई पत्तियां निकल आती हैं।

पूजा में दूब घास क्यों चढ़ाई जाती है? जानिए इतिहास व फायदे

दूब घास के ऊपरी हिस्सों में छोटे-छोटे फूलों के गुच्छे आते हैं जिनमें बीज बनते हैं। हवा, पानी या पशु-पक्षियों के माध्यम से ये बीज एक जगह से दूसरी जगह पहुँचकर नई घास उगाते हैं। बीजों से उगने वाली घास नई होती है इसलिए इसमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज्यादा होती है।

पूजा में दूब घास क्यों चढ़ाई जाती है? जानिए इतिहास व फायदे

अगर गर्मियों में ये पूरी घास सूख भी जाये तो इसके बीज ख़राब नहीं होते और पहली बारिश होते ही फिर से अंकुरित हो जाते हैं।

दूब घास का पोलिनाशन कैसे होता है doob Grass Seed

दूब घास में नर फूल और मादा फूल अलग अलग नहीं होते बल्कि एक ही फूल के अंदर नर और मादा भाग उपस्थित होते हैं। दूब घास के ऊपर जो स्पाइक की तरह छोटी छोटी तीलियाँ होती हैं इन पर बहुत सारे छोटे छोटे फूल लगे होते हैं। इन्ही के अंदर नर और मादा भाग होते हैं जिनका हवा के माध्यम से पोलिनेशन होता है और बीज तैयार होते हैं।

आजकल दूब घास से कौन कौन सी दवाइयाँ बनाई जाती हैं

दूर्वा स्वरस

ये मुख्य तौर पर पतंजलि बनाती है और इसमें 100% दूब घास ही होती है। ये जूस और पाउडर दोनों रूप में मिलता है।

दूर्वादि घृत

इसे बनाने के लिए 1 भाग गाय का घी, 4 भाग दूब घास का ताजा रस और 1/4 भाग अन्य जड़ी-बूटियों (मुलेठी, चंदन आदि) का पेस्ट मिलाया जाता है।

दूर्वादि तेल

इसमें 1 भाग तिल का तेल या नारियल का तेल और 4 भाग दूब घास का शुद्ध रस मिलाकर पकाया जाता है।

दूब घास के फायदे

नाक से खून बहने वाले रक्त जिसे नकसीर कहते हैं या किसी अन्य चोट से खून निकलने पर दूब का रस लगाने रक्तस्राव रुकता है।

इसका रस पेट की एसिडिटी, जलन और अल्सर की समस्या को शांत करता है।

दूब घास का अर्क शरीर में इंसुलिन के स्राव को बेहतर बनाने में मदद करता है जिससे ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रहता है।

इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालकर खून को साफ करते हैं।

इसमें प्रचुर मात्रा में क्लोरोफिल, विटामिन-C और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं।

क्लोरोफिल की उच्च मात्रा के कारण सुबह खाली पेट इसका ताजा रस पीने से शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है।

दूब और हल्दी का लेप बनाकर लगाने से खुजली, एक्जिमा, दाद और मुहांसों में आराम मिलता है।

सुबह-सुबह ओस से भीगी दूब घास पर नंगे पैर चलने से आंखों की तंत्रिकाओं को ठंडक मिलती है और दृष्टि में सुधार होता है।

पेशाब में जलन होने पर दूब का जूस पीने से मूत्र मार्ग साफ होता है और जलन दूर होती है।

सिरदर्द या मानसिक तनाव होने पर दूब का पेस्ट माथे पर लगाने या इसके अर्क से बना तेल सिर पर लगाने से ठंडक और सुकून मिलता है।

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प्र: दूब घास को दूर्वा क्यों कहा जाता है?

उ: दूर से लाए गए कष्टों को दूर करने और शरीर के विकारों को शांत करने के कारण इसे आयुर्वेद में ‘दूर्वा’ कहा जाता है।

प्र: सुबह खाली पेट दूब घास का रस पीने से क्या होता है?

उ: खाली पेट दूर्वा स्वरस पीने से शरीर का हीमोग्लोबिन बढ़ता है, एसिडिटी दूर होती है और ब्लड शुगर नियंत्रित रहता है।

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