हिन्दू धर्मग्रथों खासकर शिव पुराण, विष्णु पुराण, मारकंडा पुराण, मैत्रायणी उपनिषद, अथर्वशिखोपनिषद, रामायण और महाभारत में ब्रह्मा जी को सृष्टि के रचयिता, भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार और महेश (शिव) जी को सृष्टि के संहारक के रूप में माना जाता है।

  • ब्रह्मा जी – सृष्टि के रचयिता (Creator)
  • भगवान विष्णु – सृष्टि के पालनहार (Preserver)
  • महेश (शिव) जी – सृष्टि के संहारक (Destroyer)

बरसात के महीने जुलाई – अगस्त में, प्रकृति में इन त्रिदेवों के दर्शन किये जा सकते हैं और इस बात को अगर गहराई से समझा जाये तो वनस्पति विज्ञान, जंतु विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान, आनुवंशिकी को केवल इन 3 नामो के द्वारा परिभाषित किया जा सकता है।

ब्रह्मा

ब्रह्मा जी को पुराणों में सृष्टि के रचयिता यानि पैदा करने वाले के रूप में दर्शाया गया है और उनका साक्षात् रूप बरसात के दिनों में देखने को मिलता है

चींटीओं में दिखती है ब्रह्मा जी की रचना

जब रानी चींटी अपने शरीर की गंध (फेरोमोन्स) से बाकि चींटियों को, अंडो से निकले बच्चों (लार्वा) को अच्छा पोषण देकर रानी चींटियां बनाने का आदेश देती है।

लेबर चींटियां और रानी चींटी एक जैसे अंडे से ही निकलती हैं। बरसात से ठीक पहले चींटियां अंडो से निकले लार्वा को अधिक पोषण वाली खुराक देना शुरू कर देती हैं जिससे उन लार्वा से पखों वाले नर और मादा बन जाते हैं।

पहली बरसात के समय ये उड़ना शुरू कर देते हैं जिसे शादी की उड़ान कहते हैं। ये हवा में उड़ते हुए सबंध बनाते हैं उसके तुरंत बाद नर की मृत्यु हो जाती है और मादा चींटी अपने पंख तोड़ देती है क्यूंकि अब इसे इनकी जरुरत नहीं होती।

अब वो अपने लिए मिटटी में नया घर बनाती है और अंडे देना शुरू कर देती है। इसलिए पहली बरसात में हर जगह पंख ही पंख दिखते हैं जिसे हिमाचल में बत्तर पड़ना कहते हैं। इस प्रकार नींव पड़ती है उस कॉलोनी की जो तब तक चलती रहती है जब तक रानी चींटी जीवित रहती है। ये अमूमन 15 से 20 साल तक चलती है।

मेटिंग के प्रोसेस में बहुत से नर और मादाएं मर जाती हैं परन्तु जो बचती हैं वो अपनी अलग दुनिया की रचना करती हैं। अंडे देने की प्रक्रिया पूरा साल चलती है।

रानी चींटी, नर चींटी के शक्राणुओ को अपने एक खास वाल्व में स्टोर कर लेती है। जब रानी चींटी बिना नर शक्राणुओं के अंडे देती है तो उससे नर चींटी बनती है और जब रानी चींटी वाल्व खोलकर नर शक्राणुओं को मिला कर अंडे देती है तो उससे मादा चींटी बनती है।

रानी चींटी अधिकतर पूरा साल लेबर चींटियां ही पैदा करती है क्यूंकि कॉलोनी को उनकी सबसे ज्यादा जरुरत होती है बस बरसात से ठीक पहले वो फेरोमोन्स के जरिये अंडो से निकले लार्वा को अधिक पोषण वाला खाना खिलाने का सन्देश देती है जिससे नर और मादा रानियां पैदा होती हैं। ये ब्रह्मा जी की रचना का एक उदहारण है।

जुगनुओं का मिलन

ब्रह्मा जी की रचना हमें दिखती है जुगनुओं में। जुगनू प्रकृति की वो रचना हैं जो अपने शरीर से निकलने वाले प्रकाश के लिए जाने जाते हैं। मादा जुगनू के पंख नहीं होते और नर जुगनू पखों के साथ पैदा होता है।

जब इनकी मेटिंग का समय आता है तो मादा जुगनू अपने शरीर से प्रकाश छोड़ते हैं और नर जुगनू अपने शरीर से प्रकाश छोड़ते हैं ये इनका एक दूसरे से संपर्क करने का तरीका होता है और इसी तरीके से वो एक दूसरे तक पहुँचते हैं।

नोट :- शहरो में जुगनू पूरी तरह से ख़तम हो चुके हैं क्यूंकि वहां के लाइट सिस्टम के होने से वहाँ पर नर और मादा एक दूसरे से सम्पर्क नहीं कर पाया और मेटिंग के अभाव से जुगनू प्रजाति शहरों से ख़तम हो गई।

दीमक ब्रह्मा जी की रचना का एक रूप

जो हमें जंगलों में दीमकों के बड़े बड़े मिट्टी के टीले दिखते हैं वो दीमक की इंजीनियरिंग का एक नमूना होता है। बाहर मौसम जितना मर्जी गर्म हो जाये इन टीलों के अंदर का तापमान कम ही रहता है।

इनका मेटिंग का प्रोसेस भी चींटियों की तरह का होता है। बस अंतर ये होता है कि जैसे चींटियों में , मेटिंग के तुरंत बाद नर की मृत्यु हो जाती है। दीमक में ऐसे नहीं होता। रानी दीमक और राजा दीमक एक साथ मिलकर कॉलोनी को आगे बढ़ाते हैं और इनके लिए उस टीले में एक अलग अपार्टमेंट होता है जिसमे ये साथ साथ रहते हैं।

और इसके साथ साथ , दीमकों में सैनिक भी होते हैं जिन्हे रानी दीमक के सन्देश से खास तरह का पोषण दिया जाता है। जब कोई इनके घर पर हमला करता है तो ये सुरक्षा के लिए बाहर खड़े हो जाते हैं तब तक लेबर दीमकें अपने घर को बनाने लग जाती है और सैनिक दीमक बाहर ही खड़े रहते हैं।

घर बन जाने के बाद ये बाहर ही रह जाते हैं और शहीद हो जाते हैं। रानी दीमक की उम्र 50 साल तक होती है और ये कीड़ों की प्रजाति में सबसे ज्यादा जीने वाला जीव है।

गेंडैली या मिलिपीड में दिखती है ब्रह्मा जी की रचना

गेंडैली या मिलिपीड जिन्हे हिमाचली भाषा में घुमारु कहते हैं ये कनखजूरे की एक प्रजाति होते हैं, जिन्हें हिंदी में ‘गेंडैली’, ‘गेंडौर’ या ‘गंडोला’ कहते हैं। अंग्रेज़ी में इन्हें Millipede (मिलिपीड) कहा जाता है।

बारिश के मौसम में जब मिट्टी में पानी भर जाता है तो ये सैकड़ों की संख्या में एक साथ बाहर निकल आते हैं और रास्तों, दीवारों या ज़मीन पर झुंड बनाकर बैठे रहते हैं। इनके शरीर पर लंबे-लंबे गोल छल्ले बने होते हैं और ढेर सारे छोटे-छोटे पैर होते हैं।

जब कोई इनके पास जाता है या इन्हें छूने की कोशिश करता है, तो ये मुड़ जाते हैं और अपने शरीर से एक बहुत ही तीखी और गंदी बदबूदार गैस छोड़ते हैं ताकि कोई जानवर इन्हें न खाए।

पहली या दूसरी भारी बारिश के बाद जब मौसम में नमी बढ़ जाती है तब ये ज़मीन के नीचे से बाहर आते हैं। यह नमी वाला समय ही इनके प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल होता है। ये ज्यादातर रात के समय या सुबह-सुबह जब धूप नहीं होती, तब मेटिंग करते हैं।

मेटिंग के बाद मादा गेंडैली गीली मिट्टी, पत्तियों के ढेर या सड़ी हुई लकड़ी के नीचे छोटा सा गड्ढा बनाकर सैकड़ों अंडे एक साथ देती है। अंडों से कुछ ही हफ्तों में छोटे-छोटे सफेद बच्चे बाहर निकल आते हैं। इनमे भी ब्रह्मा जी की रचना को देखा जा सकता है।

नोट :- सभी प्रजातियाँ इस मौसम में अपने आप को बढ़ा रही होती हैं इसलिए बुद्धिजीवियों ने बरसात में सावन के महीने में माँस खाना बर्जित कर दिया था।

पेड़ पौधों में भी दिखती है ब्रह्मा जी की रचना

मक्की में

बरसात का मौसम मक्के की फसल का मौसम होता है। मक्की के पौधे के ऊपर जो कलगी होती है जिसे टेसल कहते हैं वो इसका नर हिस्सा होता है और भुट्टे पर जो बाल होते हैं वो इसका मादा वाला हिस्सा होता है। कलगी से जितने परागकण भुट्टे के बालों पर गिरेंगे भुट्टे में उतने ही दाने बनेंगे। यहाँ भी क्रिएटर की भूमिका साफ़ दिखती है।

लौकी में

लौकी में नर फूल और मादा फूल दोनों होते हैं। मादा फूल के पीछे छोटी सी लौकी भी लगी होती है और नर फूल केवल फूल होता है जो एक पतली डंडी पर टिका होता है। लौकी का पौधा अपने फूलों में रस डालता है ताकि मधुमखियां, तितलियाँ और तैतेया उन फूलों पर आएं।

मादा फूल

जब ये नर फूलों से रस पीती हैं तो परागकण इनके पैरों से चिपक जाते हैं और उसके बाद जब ये मादा फूलों पर जाती है तो वो परागकण वहां गिर जाते हैं और मादा फूल फर्टिलाइज हो जाता है और उसके बाद लौकी बढ़ने लगती है। करेले और भिंडी में भी यही प्रक्रिया होती है। इसमें ब्रह्मा जी की क्रिएटर की भूमिका स्पष्ट देखी जा सकती है।

नर फूल

इस तरह से और भी बहुत सारी प्रजातियां इस समय मेटिंग करती है जिनमे ब्रह्मा जी की क्रिएटर की भूमिका को साक्षात् देखा जा सकता है।

भगवान विष्णु – सृष्टि के पालनहार (Preserver)

पुराणों में सृष्टि के पालनहार की भूमिका में आते हैं भगवान् विष्णु। इनकी रचना हमें कहाँ कहाँ दिखती है आइये देखते हैं।

गोह में दिखती है भगवान् विष्णु के पालनहार की भूमिका

गोह (मॉनिटर लिज़ार्ड) सरीसृप यानी रेंगने वाले जीवों की प्रजाति का जीव है। ये गॉव में पाई जाती है इसकी पूंछ आरी की तरह होती है। नर गोह, मादा को ढूंढने के लिए उसके शरीर से निकली गंध का सहारा लेते हैं और उनका मिलन होता है।

मेटिंग के 6 या 7 हफ़्तों के बाद मादा गोह दीमक के टीलों या मिट्टी में खड्डा खोदकर या पेड़ के तनों के खोखले छिद्रों में अपने अंडे दे देती हैं और उनको मिटटी से ढक देती है।

गोह अपने अंडो को छोड़कर चली जाती है। 6 से 9 महीने के बाद उनमे से बच्चे निकलते हैं। अपने शुरूआती समय कम से कम, 1 से 3 साल ये पेड़ो पर बिताते हैं ताकि दूसरे शिकारी इन्हे अपना भोजन न बना लें। उसके बाद ये वयस्क होते हैं।

जब ये अंडो के रूप में होते हैं और अंडो से निकलने के बाद शुरूआती समय में इनको बचाने के लिए इनकी माँ इनके पास नहीं होती उस समय एक सरंक्षक की भूमिका को साफ़ देखा जा सकता है।

इसी प्रकार साँप, कछुआ, छिपकली, मेंढक, ज़्यादातर मछलियाँ, ऑक्टोपस, तितली, मच्छर और मक्खी ये सभी अपने अंडो को एक सुरक्षित जगह पर भगवान् भरोसे छोड़ देते हैं और प्रकृति के इस रूप में भगवान् विष्णु की भूमिका को स्पष्ट देखा जा सकता है।

महेश (शिव) जी – सृष्टि के संहारक (Destroyer)

प्रकृति हर सड़ी-गली या बेकार चीज़ को ख़त्म करना चाहती है फिर वो चाहे हमारी सब्जी हो , पेड़ से टूटा फल हो या फिर हमारा शरीर ही क्यों न हो। तो यहाँ संहारक की भूमिका में आते हैं शिवजी।

अनाज में दिखती है भगवान् शिव की संहारक की भूमिका

अगर फसल को प्रोसेस करने के बाद दानो को ऐसे ही रख दिया जाये तो सूक्ष्म जीव इसे नष्ट कर देंगे इसलिए उसको एक निश्चित तापमान पर धूप में सुखाया जाता है और उसमे दवाई डाली जाती है ताकि सूक्षम जीव इससे ख़तम न कर सकें।

इन सूक्षम जीवो के अध्ययन के बाद ही हमारे पूर्वजों ने अचार का अविष्कार किया था जिसमे पहले जिस भी चीज़ का अचार डालना हो उसे अच्छी तरह से सुखाया जाता था ताकि सूक्षम जीव उस पर हमला न कर पाएं और फिर उसे पूरी तरह से तेल में डुबो दिया जाता था क्यूंकि सूक्षम जीव तेल के अंदर नहीं जा पाते।

मिस्र के लोगो ने सूक्षम जीवो के अध्ययन के बाद ही मम्मी बनायीं जिससे मरणोपरांत भी शरीर को इतने लम्बे समय तक ठीक रखा गया।

पेड़ से टूटे फल में संहारक की भूमिका

जब कोई फल पेड़ से टूट जाता है तो तैतेया (मधुमखियाँ, Apis dorsata( हिमाचली में रंगड़), yellow wasp ( हिमाचली में तरमोड़)) कई तरह के कीड़े इस पर टूट पड़ते हैं और 1 या 2 दिन में इसे पूरी तरह से ख़तम कर देते हैं। यहीं पर एक संहारक की भूमिका दिखती है।

सूक्ष्म जीव जो हर चीज़ को सड़ा गला कर ख़त्म कर देते हैं उसमे एक संहारक की भूमिका साफ़ देखी जा सकती है।

दहीं, दूध, सब्जी हर चीज़ का ये सूक्षम जीव संहार कर देते हैं।

यहाँ तक कि जंगलों की सूखी घास अपने आप को घर्षण के माध्यम से आग लगा लेती है ताकि पुरानी घास का संहार हो सके और नए जीवन की शुरुआत हो सके। इसमें भी एक संहारक की भूमिका स्पष्ट देखी जा सकती है।

निष्कर्ष

हमारे पूर्वजो ने लम्बे समय के अनुभवों के बाद पुरे के पुरे प्रकृति के ज्ञान का इन 3 नामों में सरलीकरण कर दिया था। पूरी की पूरी प्रकृति में ये 3 चीज़ें ही हो रही हैं। सेक्स, प्रेज़रवेन्स और डिस्ट्रक्शन के बेस पर पूरी की पूरी पृथ्वी को परिभाषित किया जा सकता है।

लम्बे समय के अनुभवों के बाद हमें ये 3 नाम मिले हैं इन्हे केवल मंदिरों तक सीमित मत कीजिये। शिवलिंग के रूप में हम सदियों से लिंग और योनि की पूजा करते आये हैं हमने प्रकृति के रहस्यों को उस वक़्त समझ लिया था जब बाकि दुनिया, सभ्यता से कोसों दूर थी। आज बाकी दुनिया हमारे ग्रंथों को पढ़कर आगे बढ़ रही है और हम पीछे जा रहे हैं।

मच्छर इंसानो का खून क्यों चूसते हैं पढ़ने के लिए क्लिक करें

मादा कुत्ते और नर भेड़िये के मिलन से बनता है बुलफ़ड़ोग पढ़ने के लिए क्लिक करें