भारत प्राचीन काल से राजाओं की भूमि रहा है। डॉ. राम शरण शर्मा के अनुसार कबीले और उनके मुखिया विकसित होकर राजा बने। जब खेती का विकास हुआ तो अच्छे उत्पादन के बाद टैक्स लेने की प्रथा शुरू हुई जिसने कबीलाई संगठन को स्थायी राज्य और राजशाही में बदल दिया।
डॉ. के.पी. जायसवाल के अनुसार प्राचीन भारत में न केवल राजशाही बल्कि ‘गणराज्य‘ भी थे। राजा का पद पहले सभा और समिति द्वारा चुना जाता था जो बाद में राजा का बेटा राजा के रूप में वंशानुगत हो गया।
भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। उस समय भारत में लगभग 565 रियासतें थीं। इनके राजाओ के पास अपनी मुद्राएं थी अपनी सेनाएं थी। अगर इनको मिलाया नहीं जाता तो भारत की जगह पर 565 देश होते। सरदार वल्लभभाई पटेल उस समय गृह मंत्री थे उन्होंने अपने सहयोगी वी. पी. मेनन के साथ इन रियासतों को मिलाने का कार्य शुरू किया
परन्तु ये कार्य इतना आसान नहीं था क्यूंकि आजकल कोई विधायक का पद छोड़ने को तैयार नहीं होता तो वो तो राजा का पद था। रोज़ जिसे सैंकड़ो लोग सलाम करते हो वो अपना पद क्यों छोड़ेगा और पाकिस्तान भी इन रियासतों को अपनी तरफ मिलाने के लिए ऑफर कर रहा था। इसलिए राजाओं को अपनी ओर मिलाने के लिए कुछ ऐसा ऑफर करना था जो उनको राजा के पद से भी अधिक लुभावना लगे।

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Toggleसरदार पटेल की गाजर और छड़ी की नीति
इन रियासतों का विलय करने के लिए सरदार पटेल ने जो रणनीति अपनाई उसे गाजर और छड़ी की नीति कहते हैं।
गाजर :- राजाओं को शांतिपूर्ण विलय स्वीकार करने के बदले उनको कुल 34 अधिकार दिए जिनको प्रिवी पर्स कहा गए। ये अधिकार थे
राजा के उत्तराधिकारियों को पेंशन की सुविधा।
रियासत के आधार पर बार्षिक भत्ता जिस पर कोई टैक्स नहीं लगता था। ये रियासत के आकार, आय और सम्पन्ति के आधार पर तय की गई।
अपने महल, किले, आभूषण और जमीन रखने का कानूनी अधिकार।
निजी संपत्ति से होने वाली आय पर कोई इनकम टैक्स नहीं।
नगर पालिका, गृह कर और स्थानीय शुल्कों से मुक्ति।
विदेशों से अपने उपयोग के लिए सामान मंगाने पर कोई टैक्स नहीं।
उनके महलों में बिजली और पानी की व्यवस्था सरकार करेगी।
रियासत के खजाने में से निजी संपत्ति घोषित की गई राशि पर अधिकार।
राजा और उनके परिवार के लिए मुफ्त इलाज।
विशेष राजकीय आयोजनों के लिए अलग से खर्च।
महाराजा, नवाब, राजा, राव जैसी उपाधियां बनाए रखने का अधिकार।
राजकीय यात्राओं पर तोपों की सलामी का अधिकार। ये राजा के कद के अनुसार कम ज्यादा होती थी।
अपने महल और वाहनों पर तिरंगे के साथ साथ, अपनी रियासत का झंडा लगाने की अधिकार।
सरकारी कार्यक्रमों में कैबिनेट मंत्रियों के बराबर या उससे ऊपर का प्रोटोकॉल।
बिना सामान्य जांच के यात्रा के लिए विशेष दर्जा वाला पासपोर्ट।
बड़ी रियासतों के राजाओं को राज्यों का राजप्रमुख बनाना।
बिना लाइसेंस के व्यक्तिगत हथियार रखने का अधिकार।
अपनी गाड़ियों पर विशेष नंबर और लाल बत्ती का इस्तेमाल।
अपने निजी लिफाफों और संपत्तियों पर शाही राज्य-चिह्न का प्रयोग।
परिवार में मृत्यु पर पूर्ण राजकीय सम्मान दिए जाने का अधिकार। इसमें उस इलाके में छुट्टी भी शामिल होती थी।
बिना केंद्र सरकार की अनुमति के उन पर कोई सिविल केस नहीं।
बिना सरकार की पूर्व स्वीकृति के उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती थी और उन पर मुकदमा नहीं चलाया है सकता था।
गवाही या सुनवाई के लिए कोर्ट में हाजिर होने से छूट।
हथियारों के भंडारण पर सामान्य सीमा लागू न होना।
महलों की सुरक्षा के लिए गार्ड रखने की अनुमति।
तय किए गए निजी शिकारगाहों पर शिकार करने का अधिकार।
अपनी निजी जमीन को बेचने या लीज पर देने का अधिकार।
अपने इच्छानुसार संपत्ति का वारिस चुनने का अधिकार।
मुख्य महल के अंदर पुलिस के प्रवेश पर विशेष नियम।
रियासत द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्टों का नियंत्रण।
बाहर से आयत की गई लग्जरी गाड़ियों पर टैक्स न लगना।
सरकारी परिवहन रेलवे और हवाई जहाज जैसी सुविधाओं में वीआईपी दर्जा।
राजा के निकटतम परिजनों के लिए भी भत्तों का प्रावधान।
राज्य से जुड़े बड़े निर्णयों में उनसे सलाह लेना।
इन शर्तों के साथ राजाओं ने जिस विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये उसे इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन कहा गया।
छड़ी की नीति
गाजर की नीति से बहुत सी रियासतों ने भारत के साथ विलय स्वीकार किया परन्तु कुछ रियासतें बहुत बड़ी थीं और उनकी खुद की सेना थी उन रियासतों ने भारत में विलय स्वीकार नही किया वहां पर छड़ी की नीति अपने गई अर्थात वहाँ पर सेना भेजकर उनको अपने राज्य में मिला लिया गया। हैदराबाद, जूनागढ़, त्रावणकोर, भोपाल, जोधपुर और जैसलमेर वो रियासतें थीं जहाँ ओर इस नीति के तहत रियासतों को मिलाया गया।
प्रिवी पर्स के भत्ते में मैसूर को 26 लाख, हैदराबाद को 20 लाख, जयपुर और त्रावणकोर को 18-18 लाख और पाटियाला को 17 लाख जबकि 102 रियासतों को 1 से 2 लाख रूपये और 83 रियासतों को 25000 रूपये साल के देने मंजूर किये गए थे। कुछ छोटी रियासतें तो ऐसी थीं जिन्हे साल के केवल 1700 रूपये मिले लेकिन उस समय के 1700 रूपये भी आज के लाखो के बराबर थे।
इस प्रकार भारत सरकार को प्रिवी पर्स से हर साल लगभग 5 करोड़ 60 रूपये देने पड़ते थे जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी जिसके बदले सरकार को इनसे 80 करोड़ के लगभग कमाई होती थी इसलिए सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था।
1960 के दशक में चीज़ें बदली
1960 के दशक में इनमें से कई राजाओं ने स्वतंत्र चुनाव लड़ने शुरू कर दिए। इनको जनता का भी भरपूर समर्थन मिला जैसे 1962 में जयपुर की राजमाता गायत्री देवी ने भारी बहुमत से चुनाव जीत लिया। इस प्रकार सत्ता में ऐसे राजाओं की संख्या बढ़ने लगी। इनके से अधिकतर राजा स्वतंत्र या किसी छोटी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ते थे जिससे कांग्रेस सरकार कमजोर होने लगी।
24 जनवरी 1966 को इंदिरा गाँधी बनी भारत की प्रधानमत्री
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हो गई और 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गाँधी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
इस समय देश भुखमरी के दौर से गुजर रहा था। बिहार में भयंकर सूखा पड़ा था और लगभग 6 करोड़ लोग खाद्यान संकट की चपेट में आ गए थे। इंदिरा गाँधी का ध्यान इन सब चीज़ों पर गया कि एक तरफ तो जनता भूख से परेशान है दूसरी तरफ राजा प्रिवी पर्स लेकर ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं।
इंदिरा गाँधी इस बात से भी परेशान थीं कि सारे राजा महाराजा अन्य पार्टियों से चुनाव लड़कर उनकी पार्टी को कमजोर कर रहे थे। 7 सितम्बर 1970 को इंदिरा गाँधी की सरकार ने प्रिवी पर्स को ख़तम करने के लिए लोकसभा में संबिधान संशोधन बिल पेश किया।
लोकसभा में ये बिल आसानी से पास हो गया परन्तु राज्य सभा में ये बिल एक वोट से गिर गया लेकिन इंदिरा गाँधी उन लोगो में से थी वो जो ठान लेती थी उसे पूरा कर के छोड़ती थी।
इंदिरा गाँधी ने राष्ट्रपति बी बी गिरी से सिफारिस की कि इस बिल को पास करने में राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का उपयोग किया जाये। राष्ट्रपति ने ये बिल पारित कर दिया।
राजाओ ने बिल के विरोध में बनाया अपना संगठन कन्कॉर्ड ऑफ प्रिंसेज
सब राजाओ ने इक्कठे होकर कन्कॉर्ड ऑफ प्रिंसेज के नाम से संगठन बनाया और वो इक्कठे होकर सुप्रीम कोर्ट गए और सुप्रीम कोर्ट ने राजाओं के पक्ष में फैंसला सुनते हुए इस बिल को ख़ारिज कर दिया।
1971 के चुनावों में बनाया विशेष मुद्दा
इंदिरा गाँधी ने 1971 के चुनावो में गरीबी हटाओ के साथ साथ राजाओं के विशेषाधिकार ख़तम करने को भी मुद्दा बनाया और जिसका फायदा ये हुआ कि कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की।
और अब संसद में किसी भी बिल को रोकने की ताकत विपक्ष के पास नहीं बची। अब इंदिरा गाँधी ने संबिधान में 26बां संशोधन किया जिसके तहत अनुच्छेद 291 और 362 जो संबिधान से हटाया गया और संबिधान में 363A को जोड़ा गया। जिसके तहत 28 दिसंबर 1971 को राजाओं के सारे अधिकार समाप्त करके उनको आम नागरिक बना दिया गया।
प्रिवी पर्स ख़तम करने का राजाओं पर क्या प्रभाव पड़ा
प्रिवी पर्स समाप्त होने के बाद भारत के छोटे-छोटे रजवाड़ों और पूर्व राजा-महाराजाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पूरी तरह बदल गई।
बड़े रियासतदारों (जैसे जयपुर, पटियाला, हैदराबाद) के पास फिर भी बड़ी संपत्तियां और फंड थे लेकिन छोटे राजाओं का गुजारा पूरी तरह से सरकार से मिलने वाले सालाना प्रिवी पर्स पर ही टिका था। पेंशन बंद होते ही कई छोटे राजाओं के सामने दैनिक खर्च चलाने और अपने महलों या हवेलियों का रखरखाव करने का गंभीर संकट खड़ा हो गया। बेहतर देख रेख के बिना हवेलियां खंडहर बन गईं।
हवेलियों और गढ़ों की मरम्मत और देखरेख का खर्च बहुत ज्यादा होता था। आय बंद होने और टैक्स छूट खत्म होने के कारण कई छोटे राजाओं को अपनी पुश्तैनी जायदाद, जेवर, गाड़ियां और हवेलियां बेचनी पड़ीं।
रियासतों के दौर से चले आ रहे पुराने वफादार नौकरों, रसोइयों, दरबारियों और सुरक्षाकर्मियों को तनख्वाह देना असंभव हो गया। छोटे राजाओं को भारी मन से अपने कर्मचारियों को काम से हटाना पड़ा जिससे उनकी पुरानी राजशाही शान-शौकत पूरी तरह खत्म हो गई।
जिनके पास छोटी हवेलियां थीं, उन्होंने उन्हें हेरिटेज होटल या होम-स्टे में बदल दिया।
जनता के बीच अपनी पुरानी पकड़ का फायदा उठाकर कई पूर्व राजाओं ने चुनाव लड़ना शुरू किया और सांसद या विधायक बने।
कई छोटे राजा पूरी तरह से सामान्य नागरिकों की तरह खेती-बाड़ी या छोटे-मोटे कारोबार में लग गए।
राजाओ पर सामान्य नागरिकों की तरह इनकम टैक्स और प्रॉपर्टी टैक्स लागू हो गए जिसके लिए वे पहले से तैयार नहीं थे। इसके चलते कई परिवार कानूनी और टैक्स मुकदमों में उलझ गए।


