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ओम जय जगदीश हरे आरती की शुरुआत कब हुई। इस आरती के भारत के घर घर पहुँचने की कहानी।

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ओम जय जगदीश हरे” आरती सनातन धर्म (हिंदू धर्म) में सबसे लोकप्रिय आरतियों में से एक है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। ओम जय जगदीश हरे आरती की शुरुआत सन 1870-1871 में पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी ने की थी।

पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी पंजाब के जालंधर जिले में फिल्लौर कस्बे के रहने वाले थे और यहीं पर उन्होंने पहली बार इस आरती को लिखा और क्यूंकि वो एक कथा पढ़ने वाले पंडित थे और आस पास के इलाके में जाकर धार्मिक कथाएं पढ़ते थे तो उन्होंने घर घर जाकर कथा के बाद इस आरती को गाना शुरू किया।

पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी कौन थे

पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी का जन्म पंजाब के जालंधर जिले में फिल्लौर कस्बे में 30 सितंबर 1837 को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित जयदयालु जोशी था। उन्होंने ईसाइयों द्वारा चलाए जाने वाले स्थानीय स्कूल और लुधियाना मिशन से अपनी शुरुआती पढाई की। उन्होंने केवल मिडिल (सातवीं कक्षा) तक ही पढाई की उसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था।

इस आरती को क्यों लिखा गया

उस दौर में पंजाब और उत्तर भारत में ईसाई मिशनरियों का प्रभाव बढ़ रहा था । पंडित श्रद्धाराम आम जनता को सनातन धर्म से जोड़े रखने के लिए एक सरल प्रार्थना गीत देना चाहते थे जिसे हर कोई आसानी से गा सके।

हिंदी का पहला उपन्यास भाग्यवती (1877) भी पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी ने ही लिखा था उन्होंने औपचारिक रूप से बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने दम पर उन्होंने संस्कृत, हिंदी, पंजाबी, फारसी और उर्दू भाषाओं पर महारत हासिल की।

यह आरती भारतीय समाज में कैसे फैली

इस आरती को पहले पंडित श्रद्धाराम शर्मा जी आस पास के इलाको में गाते थे फिर धीरे धीरे ये मंदिरों में गाई जाने लगी परन्तु जब मशहूर गायकों ने इसे गाया तो ये पुरे भारत में प्रशिद्ध हो गई।

हिंदी फिल्म पूर्व और पश्चिम ने इस आरती को पुरे भारत में मशहूर कर दिया

साल 1970 में मनोज कुमार की फिल्म पूरब और पश्चिम में इस आरती का इस्तेमाल किया गया था जिसे महेंद्र कपूर और श्यामा चित्तर ने गाया था। और चूँकि उस समय सिनेमा का प्रचलन बढ़ रहा था इसलिए इस फिल्म ने इस आरती को सम्पूर्ण भारत में मशहूर कर दिया

इसके बाद साल 2001 में आई फिल्म कभी खुशी कभी गम में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन के परिवार पर फिल्माई गई इस आरती ने इसे नई पीढ़ी के बीच भी बेहद लोकप्रिय बना दिया।

महान गायिका एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी

जब इन्होने इस आरती को अपनी मधुर आवाज़ में गाया तो ये पुरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध हो गई।

टी-सीरीज़ के भक्ति भजनों के दौर में अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में यह आरती भारत के लगभग हर घर, मंदिर और दुकान में सुबह-शाम गूंजने लगी।

इस प्रकार आधुनिक युग में इस आरती को पूरे देश तक पहुंचाने में भारतीय बॉलीवुड का बहुत बड़ा हाथ रहा।

इस आरती को लेकर बुद्धिजीवियों में विरोधाभास

कुछ बुद्धिजीवी इस आरती को कर्मवाद बनाम ‘भाग्यवाद के विरोधाभास के रूप में देखते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।

आलोचकों का कहना है कि यह पंक्ति भगवान की भक्ति को ‘लालच’ या ‘सौदाबाज़ी’ बना देती है कि अगर आप पूजा करोगे तो ही आपको फल मिलेगा।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी

तुम बिन और न दूजा

आलोचकों का तर्क है कि यह पंक्तियाँ इंसान को अपने संकटों से खुद लड़ने के बजाय, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ देने की मानसिकता देती हैं।

ओम जय जगदीश हरे (संपूर्ण आरती)

ओम जय जगदीश हरे आरती की शुरुआत कब हुई। इस आरती के भारत के घर घर पहुँचने की कहानी।
ओम जय जगदीश हरे आरती की शुरुआत कब हुई। इस आरती के भारत के घर घर पहुँचने की कहानी।

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