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शादी की उम्र:18 से 21 का सफ़र -वो कहानियाँ जिन्होंने कानून बदल दिया

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भारत में बेटियों की शादी की कानूनी उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 साल करने पर आज देश भर में चर्चा छिड़ी है। क्यूंकि सरकार ने ‘The Prohibition of Child Marriage (Amendment) Bill, 2021 पेश किया है। जिस पर अभी भी रिव्यु चल रहा है।

लेकिन क्या हम जानते हैं कि इस ‘उम्र’ की सीमा को तय करने की शुरुआत कहाँ से हुई? यह सिर्फ एक तारीख बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन बेटियों के संघर्ष और बलिदान की कहानी है जिन्होंने सदियों पुरानी बनी पितृसत्तात्मक समाज की परम्पराओं को झकझोर कर रख दिया।

1891 में पहली बार तय की गई थी सहमति की उम्र (‘एज ऑफ़ कन्सेंट’)

भारत में इस समय ‘एज ऑफ़ कन्सेंट’, यानी यौन संबंध बनाने के लिए सहमति की उम्र 18 है। लेकिन भारत में शादी की उम्र तय करने की पहली बड़ी कोशिश ब्रिटिश काल में हुई थी। जिसका श्रेय भारत की 2 महिलाओं रुख्‍माबाई और फुलमोनी दासी को जाता है।

रुख्‍माबाई बचपन की हुई शादी को मानने से इनकार कर देती है जबकि फुलमोनी दासी की मौत विवाह के तुरंत बाद हो जाती है। डॉ. रुख़माबाई और फुलमणि दासी जैसे मामलों के बाद लड़कियों की सहमति की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष की गई।

फुलमोनी दासी की मौत का मामला

बात 1889 की हैपश्चिमी बंगाल की एक 10 साल की लड़की “फुलमोनी दासी” की शादी 35 साल के हरि मोहन मैती से हो जाती है। शादी के तुरंत बाद फुलमोनी दासी की मौत पति के जबरन यौन सम्‍बंध बनाने यानि बलात्कार की वजह से हो जाती है।

फुलमोनी के पति को हत्‍या की सजा तो मिली लेकिन वह बलात्‍कार के आरोप से मुक्‍त हो गया। पारसी समाज सुधारक बेहरामजी मालाबारी के प्रयासों से ये मुद्दा एक अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। मालाबारी केवल भारत में लेख नहीं लिख रहे थे।

बल्कि 1890 में वो खुद लंदन गए। वहां उन्होंने ब्रिटिश सांसदों, पादरियों और रसूखदार महिलाओं के साथ बैठकें कीं। उन्होंने ‘The Times’ जैसे बड़े ब्रिटिश अखबारों में लेख छपवाए।

जब इंग्लैंड की जनता को पता चला कि ब्रिटिश शासन के अधीन भारत में 10 साल की बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो वहां की जनता ने अपनी ही सरकार को “अमानवीय” कहना शुरू कर दिया।

डॉ. रुख़माबाई जिन्होंने बचपन की शादी को मानने से इंकार कर दिया था उन्होंने खुद महारानी विक्टोरिया को एक भावुक पत्र लिखा था। जब महारानी तक यह बात पहुँची, तो उन्होंने व्यक्तिगत रुचि ली, जिससे ब्रिटिश नौकरशाही (Bureaucracy) हरकत में आ गई।

बाल गंगाधर तिलक का ‘धर्म खतरे में है’ का नारा

बाल गंगाधर तिलक जिनका नारा था – स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है उन्होंने ‘एज ऑफ़ कन्सेंट’ 1891‘ (सहमति की आयु विधेयक) का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने इसे सनातन धर्म पर हमला बताया।

उन्होंने लेखों की एक श्रृंखला लिखी जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि ब्रिटिश सरकार को हिंदुओं के सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने रूढ़िवादी हिंदुओं को एकजुट किया और ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि इस कानून से देश में असंतोष फैल सकता है। उन्होंने कहा कि विवाह एक धार्मिक संस्कार है और सरकार इसमें बदलाव करके ‘महारानी की उद्घोषणा (1858)’ का उल्लंघन कर रही है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता का वादा किया गया था।

“बेहरामजी मालाबारी ने लोगों को आईना दिखाते हुए पूछा था कि क्या हमारा धर्म इतना कमज़ोर है कि एक 10 साल की बच्ची को वैवाहिक अत्याचार से बचाने मात्र से वह खतरे में पड़ जाएगा?

बाल गंगाधर तिलक ने अपनी तीनो बेटियों की शादी 16 बर्ष के बाद की थी

एक ओर जहाँ बाल गंगाधर तिलक ‘एज ऑफ़ कन्सेंट’ को सनातन धर्म के लिए खतरा बताकर हिन्दू समाज को इक्कठा कर रहे थे वहीं उन्होंने अपनी तीनो बेटियों कृष्णाबाई, दुर्गाबाई और मथुराबाई की शादी 16 साल की उम्र के बाद की थी जो उस समय के हिसाब से एक बहुत बड़ी उम्र मानी जाती थी।

धार्मिक आंदोलनों के डर से 1891 का कानून पूरी तरह से लागु नहीं हो पाया

ब्रिटिश सरकार इन धार्मिक आन्दोलनो से इतना डर गई थी कि उन्होंने‘एज ऑफ़ कन्सेंट’अधिनियम बना तो दिया जिसमे सहमति की उम्र 10 साल से बढाकर 12 साल कर दी गई परन्तु वो इसे पूरी तरह से लागु नहीं कर पाई। सरकार ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि वो न तो विवाह में कोई व्यवधान डालेंगे और न ही घरों के अंदर जाकर इसकी जाँच करेंंगे।

इस प्रकार कानून बनने के बाद भी पूरी तरह से लागु नहीं हो पाया। परन्तु इस कानून ने 1929 के शारदा एक्ट के लिए माहौल तयैर कर दिया।

राजाओं ने भी अपनी अपनी रियासतों के कानून में बदलाब किये

ब्रिटिश शासन में पूरा भारत एक नहीं था बल्कि 565 रियासतें थी जिन्हे सरदार पटेल जी ने 1947 में एकीकृत किया था। इन रियासतों के कानूनों में भी बदलाब हुए। जैसे मैसूर राज्‍य ने 1894 में एक कानून बनाया जिसमे उन्होंने 8 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगा दी।

इंदौर रियासत ने 1918 में लड़कों के लिए शादी की न्‍यूनतम उम्र 14 और लड़कियों के लिए 12 साल तय की। 1927 में राय साहेब ह‍रबिलास सारदा ने बाल विवाह रोकने का विधेयक पेश किया और इसमें लड़कों के लिए न्‍यूनतमउम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 साल करने का प्रस्‍ताव था। 1929 में यह क़ानून बना। इसे ही सारदा एक्‍ट के नाम से जाना जाता है।

1978 का बड़ा बदलाव

इस कानून में 1978 में संशोधन हुआ। इसके बाद लड़कों के लिए शादी की न्‍यूनतम क़ानूनी उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल हो गयी। जो आज भी प्रचलित है। मगर कम उम्र की शादियां अभी भी नहीं रुक रहीं थी।

तब साल 2006 में इसकी जगह बाल विवाह रोकने का नया क़ानून आया। इस कानून में बाल विवाह को संज्ञेय जुर्म बनाया गया।

2012 में पारित हुआ POCSO Act (पॉक्सो एक्ट)।

2012 में उस समय की सरकार ने इस कानून को थोड़ा और सख्त करते हुए Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 पारित किया। इसमें 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति (लड़का या लड़की) को ‘बच्चा’ माना गया है।

POCSO कहता है कि 18 साल से कम उम्र में ‘सहमति’ (Consent) का कोई कानूनी महत्व नहीं है। यानी अगर बच्चा चाहे वो लड़का हो या लड़की वो अपनी मर्जी भी जताए, तब भी उसे अपराध ही माना जाएगा।

2019 में इस कानून में बड़ा बदलाब करते हुए अत्यंत गंभीर यौन हमले के केस में अपराधी को फांसी की सजा दी जा सकती है।

अभी भी हो रही हैं कम उम्र में शादियां

सभी धर्मों ने लड़कियों की शादी के लिए सही समय उसके शरीर में होने वाले जैविक बदलाव को माना है। यानी माहवारी से ठीक पहले या माहवारी के तुरंत बाद या माहवारी आते ही।

आज भी कम उम्र की शादी के पीछे यह बड़ी वजह है। साथ ही, लड़कियों को ‘बोझ’ मानने बाले समाज , लड़कियों की सुरक्षा और बिगड़ जाने की आशंका, शादी में देने वाला दहेज, ग़रीबी, लड़कियों की कम पढ़ाई- अनेक ऐसी बातें हैं जो कम उम्र की शादी की वजह बनती हैं।

आज भी कई राज्यों में लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है।

राज्य18 से कम उम्र में शादी (%)
पश्चिमी बंगाल41.6%
बिहार40.8%
त्रिपुरा40.1%
झारखण्ड32.2%
राजस्थान25.4%
उत्तर प्रदेश19.0%

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