जब बात हिमाचल के सेब की आती है तो सबको ये लगता है कि हिमाचल में सेब अंग्रेजो की देन परन्तु ये बात सच नहीं है। 1865 में ब्रिटिश अफसर कैप्टन आर.सी. ली और 1870 में कर्नल रैनिक ने कुल्लू में सेब के कुछ पौधे जरूर लगाए थे लेकिन वे खट्टे किस्म के सेब थे।
जिसका इस्तेमाल अंग्रेज जैम, जेली या सॉस आदि बनाने के लिए करते थे। उनको पहाड़ियों में न तो कोई व्यावसायिक खेती करनी थी न ही हिमाचल को एक सेब निर्यातक के रूप में देखने का उनका कोई विज़न था।
हिमाचल प्रदेश में मीठे और व्यापारिक सेब लाने का श्रेय एक अमेरिकी सत्यानंद स्टोक्स जिनका असली नाम सैम्युअल इवांस स्टोक्स था उनको जाता है इन्ही की बहु विद्या स्टोक्स कांग्रेस पार्टी की दिग्गज नेता रही और हिमाचल विधानसभा चुनाव में 8 बार विधायक चुनी गईं।
तो इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि जब कोई अपना स्वार्थ छोड़कर लोगों के भले की ठान लेता है तो वो कैसे इतिहास के पन्नो पर अमर हो जाता है और वो एक छोटे से जीवनकाल में वो कर जाता है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। हम बात कर रहे हैं सत्यानंद स्टोक्स एक अमेरिकी जिसने बना दिया हिमाचल को एप्पल स्टेट

सैम्युअल इवांस स्टोक्स अमेरिका से भारत कैसे आए (1904)
किसी व्यक्ति के बोले गए अच्छे-बुरे शब्द सामने वाले को किस तरह से प्रभावित कर सकते हैं इसका प्रमाण हैं सत्यानंद स्टोक्स। सैम्युअल स्टोक्स अमेरिका के फिलाडेल्फिया के एक अमीर परिवार से थे।
उनके परिवार का कालीन का बहुत बड़ा और सफल व्यापार था। सैम्युअल के माता-पिता चाहते थे कि वह बड़ा होकर परिवार के इस पुश्तैनी बिजनेस को संभाले लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।
1903 के अंत या 1904 के शुरुआती महीनों की बात है डॉ. मार्कस ब्रैडफोर्ड कार्लटन जो कि भारत के एक प्रसिद्ध पादरी थे वो अमेरिका गए हुए थे। वे भारत के हिमाचल प्रदेश के (सबथू – शिमला के पास) कुष्ठ आश्रम के प्रमुख थे।
उस समय भारत में कुष्ठ रोग फैला हुआ था और इससे पीड़ित लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ब्रैडफोर्ड कार्लटन की बातों से प्रभावित होकर सैम्युअल ने मात्र 21-22 साल की उम्र में अपने परिवार के सुख-सुविधा भरे जीवन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला किया।
सन 1904 में वे अमेरिका छोड़कर भारत आ गए और सीधे हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में स्थित सबथू के कुष्ठ आश्रम पहुँच गए। वहाँ उन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने हाथों से रोगियों की सेवा की।
कोटगढ़ की खोज और पहाड़ों से लगाव
कुष्ठ आश्रम में कुछ समय बिताने के बाद, स्वास्थ्य कारणों और एक शांत वातावरण की तलाश में सैम्युअल शिमला से आगे बढ़कर कोटगढ़ पहुँचे।
कोटगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, वहाँ के ऊंचे पहाड़, देवदार के जंगल और वहाँ के सीधे-साधे पहाड़ी लोग उन्हें इतने भाए कि उन्होंने हमेशा वहीं बसने का निर्णय ले लिया।
सैम्युअल स्टोक्स और एग्नेस ग्रास (छोटो देवी) का विवाह
सैम्युअल स्टोक्स जब कुष्ठ आश्रम में रोगियों की सेवा कर रहे थे वहाँ उनका संपर्क एक अमेरिकी मूल की लड़की एग्नेस ग्रास (छोटो देवी) से होता है वो भी एक मिशनरी के तहत भारत आईं थीं।
12 सितंबर 1912 को दोनों शादी कर लेते हैं इस समय तक इनका नाम सैम्युअल स्टोक्स और एग्नेस ग्रास ही था। दोनों ने मिलकर कोटगढ़ की पहाड़ियों में एक अपना आशियाना बनाया, जिसे ‘स्टोक्स फार्म’ के नाम से जाना गया।
| परिवार के सदस्य | रिश्ता | विवरण |
| सत्यानंद स्टोक्स (मूल नाम: सैम्युअल इवांस स्टोक्स) | परिवार के मुखिया | हिमाचल में सेब की क्रांति लाने वाले महान शख्सियत |
| छोटो देवी (मूल नाम: एग्नेस ग्रास) | पत्नी | अमेरिका से भारत आईं |
| लाल सिंह स्टोक्स | पुत्र | सत्यानंद स्टोक्स के इकलौते बेटे |
| विद्या स्टोक्स | बहू | लाल चंद स्टोक्स की पत्नी और पूर्व कैबिनेट मंत्री |
| दरपदी स्टोक्स | पुत्री | सत्यानंद स्टोक्स की पुत्री |
| सुमित्रा स्टोक्स | पुत्री | सत्यानंद स्टोक्स की पुत्री |
| तारा स्टोक्स | पुत्री | सत्यानंद स्टोक्स की सबसे छोटी पुत्री |
अमेरिका से सेब के पौधे छिपाकर भारत लाना और कोटगढ़ में रोपण
सैम्युअल स्टोक्स ने महसूस किया कि हिमाचल प्रदेश के लोग बहुत गरीब हैं और उनके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है। यहीं से उनके मन में यह विचार आया कि इस इलाके की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे किसानों की आजीविका बेहतर हो सके।

1916 में जब वे अमेरिका गए तो वहां से लुइसियाना की प्रसिद्ध ‘डेलीशियस‘ किस्म के ‘रेड डिलीशियस‘ और ‘गोल्डन डिलीशियस‘ सेब के पौधे अपने सामान में छिपाकर कोटगढ़ ले आये।
कोटगढ़ में लगाए गए इन पौधों में 1926 के आसपास पहली बार मीठे और लाल सेब के फल आए।
सैम्युअल स्टोक्स की निस्वार्थ भावना से शिमला में बने सेब के बगीचे
डॉ. वर्गीज कुरियन और सैम्युअल स्टोक्स के मन में भी होता कि मैं ही सारा लाभ कमाऊंगा और किसी को कुछ नहीं बताऊंगा तो वो न तो इतिहास में अमर हो पाते और न ही हिमाचल एप्पल स्टेट बन पाता न ही भारत दुनिया का नंबर एक दुग्ध उत्पादक
डॉ. वर्गीज कुरियन ने कैसे बनाया भारत को दुनिया का नंबर एक दुग्ध उत्पादक देश
स्टोक्स का यह मानना बिल्कुल नहीं था कि वे अकेले ही इन सेबों का व्यापार करें और अमीर बनें। उन्होंने कोटगढ़ के स्थानीय किसानों को मुफ्त में सेब के पौधे बांटे।
उन्होंने लोगों को सिखाया कि कैसे पेड़ों की देखभाल की जाती है, फलों की तुड़ाई कैसे होती है और उन्हें लकड़ी के बक्से में सुरक्षित कैसे पैक किया जाता है।
हिमाचल प्रदेश में सेब की क्रांति और किसानों का विकास
उस समय पहाड़ों में सड़कें नहीं थीं और शिमला या अन्य बाजारों तक सामान पहुँचाना बहुत कठिन था। स्टोक्स ने ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था पर काम किया। उन्होंने लकड़ी की पेटियों में सेब पैक करने की शुरुआत की ताकि लंबी दूरी तय करते समय सेब सड़े नहीं।
धीरे-धीरे कोटगढ़ के सेबों की मिठास और खूशबू शिमला और देश के बड़े बाजारों तक पहुँचने लगी जिससे यहाँ के किसानों की आमदनी कई गुना बढ़ गई और पूरा क्षेत्र समृद्ध हो गया। सेब की इस एक फसल ने हिमाचल प्रदेश की पूरी आर्थिक तकदीर बदल दी।
जो कोटगढ़ कभी गरीबी और बेगार से जूझ रहा था वह बाद में देश के सबसे समृद्ध बागवानी क्षेत्रों में से एक बन गया। उन्होंने कोटगढ़ की बंजर और उपेक्षित पहाड़ियों की तस्वीर को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
कुल्लू घाटी का जुड़ना (आर.सी. ली और अन्य बागवान)
स्टोक्स की सफलता के बाद कुल्लू के स्थानीय बागवानों और ब्रिटिश अधिकारियों (जैसे आर.सी. बेनर्जी या अन्य प्रगतिशील किसानों) ने भी स्टोक्स से प्रेरित होकर मीठी किस्मों के पौधे मंगाए।
कुल्लू की घाटी सेब की खेती के लिए भौगोलिक रूप से बहुत अनुकूल थी, इसलिए वहाँ भी तेजी से बड़े-बड़े सेब के बगीचे बनने लगे। जब हिमाचल में सेब की आर्थिक सफलता साफ दिखने लगी, तो सरकार ने भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
आजादी के बाद हिमाचल सरकार ने बागवानी विभाग (Horticulture Department) की स्थापना की। सरकार ने किसानों को कम ब्याज पर लोन, दवाइयाँ, खाद और सेब के नए पौधे उपलब्ध कराए। रोहड़ू, जुब्बल, कोटखाई, किन्नौर और लाहुल-स्पीति जैसे ठंडे इलाकों में सरकारी नर्सरी खोली गईं।
बेगार प्रथा के खिलाफ सत्यानंद स्टोक्स का ऐतिहासिक संघर्ष
सैम्युअल ने स्थानीय पहाड़ी संस्कृति को बहुत गहराई से समझा। उन्होंने वहाँ के आम लोगों की तरह रहना, उनकी भाषा बोलना और उनकी जीवनशैली को अपनाना शुरू कर दिया।
उन्होंने कोटगढ़ के स्थानीय निवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। उनके घर के दरवाजे हर जरूरतमंद के लिए हमेशा खुले रहते थे। धीरे-धीरे वे विदेशी जमीन से आए एक व्यक्ति नहीं बल्कि कोटगढ़ के अपने परिवार के सदस्य बन चुके थे जिन्हें स्थानीय लोग बहुत सम्मान और आदर की दृष्टि से देखते थे।
उन्होंने महसूस किया कि बाहरी लोग (अंग्रेज अधिकारी) पहाड़ी किसानों का शोषण करते थे और उन्हें बेगार जैसी कुप्रथाओं का सामना करना पड़ता था। सैम्युअल ने इस अन्याय के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और स्थानीय किसानों के हक में खड़े हुए।
नोट : बेगार प्रथा उस समय हिमाचल में बहुत प्रचलित थी जिसके तहत अंग्रेज अधिकारी और राजा महाराजा यहाँ की जनता से मुफ्त में काम करवाते थे जिसमे ऊँचे ऊँचे स्थानों तक सामान की ढुलाई, खेतों में काम, मुफ्त में मजदूरी आदि शामिल थे आज भी हिमाचली भाषा में जिस काम को करने के पैसे नहीं मिलते उसको हिमाचल के लोग बगार ही है कहकर सम्बोधित करते हैं।
सत्यानंद स्टोक्स ने इस कुप्रथा के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को पत्र लिखे, कानूनी लड़ाई लड़ी और पहाड़ी किसानों को एकजुट किया।
डॉ. यशवंत सिंह परमार और सत्यानंद स्टोक्स के प्रयत्नो से अंततः अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े और हिमाचल की पहाड़ियों से बेगार प्रथा का अंत हुआ।
अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन और जेल जाने वाले पहले अमेरिकी
भारत में उस समय अंग्रेजो के विरुद्ध आंदोलन हो रहे थे। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन और स्वदेशी अभियान की शुरुआत की तो स्टोक्स उससे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपने सारे पश्चिमी सूट और कपड़े त्याग दिए और हाथ से काती हुई सफेद खादी पहनना शुरू कर दिया।
वे कोटगढ़ और शिमला के ग्रामीण इलाकों में चरखा चलाने का प्रचार करने लगे। एक अमेरिकी मूल के व्यक्ति को खादी में देखकर ब्रिटिश सरकार हैरान और चिंतित हो गई।
सत्यानंद स्टोक्स एकमात्र ऐसे विदेशी व्यक्ति थे जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (AICC) का सदस्य चुना गया था। 1920 में उन्होंने नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया

दिसंबर 1921 में उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जेल जाने वाले पहले और एकमात्र अमेरिकी नागरिक थे।
जब महात्मा गांधी को उनकी गिरफ्तारी का पता चला तो उन्होंने अपने अखबार ‘Young India’ में स्टोक्स की बहादुरी और देशभक्ति की जमकर तारीफ की।
ईसाई धर्म से हिंदू धर्म और ‘सत्यानंद’ नाम अपनाने की कहानी
सैम्युअल ने भारतीय दर्शन, भगवद्गीता और उपनिषदों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे उनका झुकाव हिंदू धर्म और भारतीय जीवनशैली की तरफ बढ़ने लगा।
1932 में उन्होंने पूरी तरह वैदिक रीति-रिवाज से हिंदू धर्म अपनाया। धर्म परिवर्तन के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘सत्यानंद स्टोक्स’ और उनकी पत्नी ने अपना नाम छोटो देवी रख लिया।
सत्यानंद स्टोक्स की विरासत और उनका अंतिम समय
अपने जीवन के आखिरी वर्षों में भी सत्यानंद स्टोक्स पूरी तरह सक्रिय रहे। 14 मई 1946 को उनका निधन हुआ। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उन्हें कोटगढ़ की उसी मिट्टी में दफनाया/विलीन किया गया जिससे उन्हें सबसे ज्यादा प्रेम था। आज भी कोटगढ़ और पूरा हिमाचल प्रदेश उन्हें “हिमाचल की बागवानी के पिता” और एक महान देशभक्त के रूप में याद करता है।
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FAQ
सत्यानंद स्टोक्स कौन थे?
सत्यानंद स्टोक्स (मूल नाम: सैम्युअल इवांस स्टोक्स) अमेरिका के फिलाडेल्फिया के एक अमेरिकी नागरिक थे जो भारत आए, स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और हिमाचल प्रदेश के कोटगढ़ में ‘रेड डिलीशियस’ सेब लाकर इसे भारत का ‘एप्पल स्टेट’ बनाया।
हिमाचल में सेब की शुरुआत किसने की थी?
हालांकि अंग्रेजों ने 1865 में कुल्लू में कुछ खट्टे सेब के पौधे लगाए थे, लेकिन हिमाचल में मीठे और व्यापारिक सेब की असली शुरुआत 1916 में सत्यानंद स्टोक्स ने अमेरिका से लाकर कोटगढ़ में की थी।
सत्यानंद स्टोक्स का मूल नाम क्या था?
सत्यानंद स्टोक्स का मूल नाम सैम्युअल इवांस स्टोक्स (Samuel Evans Stokes Jr.) था।
कोटगढ़ हिमाचल प्रदेश के किस जिले में है?
कोटगढ़ हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में स्थित है, जिसे ‘एप्पल हार्टलैंड’ (Apple Heartland) कहा जाता है।
सत्यानंद स्टोक्स की पत्नी का क्या नाम था?
उनकी पत्नी का मूल नाम एग्नेस ग्रास (Agnes Grant) था, जिन्हें भारत में ‘छोटो देवी’ (या प्रियदेवी) के नाम से जाना गया।