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पाश्चुराइजेशन क्या होता है इस प्रक्रिया का नाम पाश्चुरीकरण क्यों पड़ा 

paschurikaran
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1850 के दशक में फ्रांस में वाइन और बियर का बहुत बड़ा कारोबार था। लेकिन उस समय फ्रांसीसी वाइन निर्माताओं को एक भयानक समस्या का सामना करना पड़ रहा था

शराब बनाते समय कई बार वह अचानक खट्टी हो जाती थी और स्वाद पूरी तरह से सड़ जाता था।

इसके कारण वाइन उद्योग को बहुत भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।

उस ज़माने में लोग मानते थे कि शराब अपने आप खराब हो जाती है या यह रासायनिक क्रिया का नतीजा है।

इस समस्या के समाधान के लिए 1856 में फ्रांस के वाइन निर्माताओं और वहां की सरकार ने लुई पाश्चर से मदद मांगी।

लुई पाश्चर ने बैक्टीरिया का पता लगाया

लुई पाश्चर ने जब खराब हो चुकी वाइन और अच्छी वाइन के सैंपल्स को माइक्रोस्कोप  के नीचे रखकर जांचा, तो उन्होंने देखा अच्छी वाइन में केवल गोल आकार के यीस्ट के कण थे, जो शक्कर को अल्कोहल में बदलते थे ।

खट्टी वाइन में यीस्ट के अलावा लंबे छड़ के आकार के छोटे-छोटे जीवाणु थे।

पाश्चर ने निष्कर्ष निकाला कि ये बैक्टीरिया ही वाइन में मौजूद अल्कोहल को एसिटिक एसिड में बदल देते हैं, जिससे वाइन खट्टी और खराब हो जाती है।

अब सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वाइन में मौजूद उन हानिकारक बैक्टीरिया को मारा कैसे जाए? क्यूंकि अगर वाइन को बहुत ज्यादा उबाला जाता, तो उसका स्वाद, रंग और वाष्प पूरी तरह से नष्ट हो जाते थे और वह पीने लायक नहीं रहती थी।

लुई पाश्चर ने अलग-अलग तापमान पर वाइन को गर्म करके देखना शुरू किया। सन 1864 में कई प्रयोगों के बाद उन्होंने पाया कि यदि वाइन को पूरी तरह से उबालने के बजाय 55°C से 60°C (130°F–140°F) के बीच कुछ मिनटों के लिए गर्म किया जाए और फिर तुरंत ठंडा कर दिया जाए, तो वाइन को खराब करने वाले सभी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं और वाइन के स्वाद और गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता।

इसी सफल तकनीक को पाश्चुरीकरण नाम दिया गया। पाश्चर ने 1865 में इस प्रक्रिया का पेटेंट कराया।

वाइन से ‘दूध’ तक का सफर

शुरुआत में यह तकनीक केवल वाइन और बियर को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल हुई थी। लेकिन 19वीं सदी के अंत में वैज्ञानिकों ने इसे दूध पर लागू करने का फैसला किया

1880-1890 के दशक में जर्मन और अमेरिकी डॉक्टरों ने पाया कि पाश्चराइजेशन तकनीक से दूध के खतरनाक टीबी बैसिलस बैक्टीरिया को भी मारा जा सकता है।

आज दूध कैसे प्रोसेस होता है

आज डेयरियों (जैसे Verka, Amul) में पाश्चुरीकरण मुख्य रूप से HTST (High Temperature Short Time) विधि से किया जाता है

[कच्चा दूध] ──(72°C पर 15-20 सेकंड तक गर्म)──> [तुरंत 4°C तक ठंडा] ──> [सुरक्षित पैकेट बंद दूध]

दूध को 71.7°C (161°F) पर 15 से 20 सेकंड के लिए गर्म किया जाता है।

इसके तुरंत बाद दूध को तेजी से 4°C (39°F) या उससे नीचे ठंडा कर दिया जाता है।

इस प्रक्रिया से दूध में मौजूद 99.9% हानिकारक रोगजनक बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, बिना दूध को उबाले और उसके पोषक तत्वों को नष्ट किए। इसके बाद दूध को कई दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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