हर राज्य में राज्य की अपनी एक सहकारी समिति है ये सहकारी समितियां जिस मॉडल पर काम करती हैं उसे कहते हैं सब एक के लिए और एक सब के लिए। भारत में दुग्ध सहकारी समितियां आनंद पैटर्न (Anand Pattern – 3 Tier Model) पर काम करती हैं। इस मॉडल की शुरुआत गुजरात के अमूल से हुई थी और आज पंजाब के Verka (Milkfed), बिहार के Sudha, राजस्थान के Saras और कर्नाटक के Nandini जैसे ब्रांड इसी मॉडल पर चलते हैं।

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आइए इस पूरी प्रक्रिया को अच्छे से समझते हैं।

गाँव में समिति का गठन

किसी गाँव में कम से कम 10-15 पशुपालक किसान मिलकर एक प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति (Primary Dairy Cooperative Society – DCS) बनाने की पहल करते हैं।

प्राथमिक शर्तें और आवश्यकताएँ

गाँव के कम से कम 11 पशुपालक किसान होने चाहिए जो अलग-अलग परिवारों से हों और एक सोसाइटी बनाने को तयैर हों ।

गाँव से रोजाना कम से कम 100 लीटर दूध एकत्र होने की संभावना होनी चाहिए। दूध की मात्रा इस बात पर भी निर्भर करती है की मिल्कफेड चिलिंग सेंटर से आपके गॉव की दूरी कितनी है।

गाँव में एक छोटा सा शेड होना चाहिए जहाँ दूध की नाप-तौल टेस्टिंग और कैन जैसी जरुरी चीज़ें रखी जा सकें।

दूध के बर्तनों की सफाई के लिए पानी और मिल्क टेस्टिंग मशीन चलाने के लिए बिजली कनेक्शन।

जिला दुग्ध संघ (District Milk Union) से संपर्क

अपने जिले के जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (District Co-operative Milk Producers’ Union) के कार्यालय में जाना होता है।

वहाँ पर मार्गदर्शक अधिकारी से मिलकर उनको बताना होता है कि हम अपने गाँव में नई सहकारी समिति खोलना चाहते हैं।

इसके बाद, डेयरी अधिकारी गाँव में आकर सर्वे करते हैं और ऊपर लिखी चीज़ों के बारे में वेरिफिकेशन करते हैं।

समिति की बैठक

सर्वे पास होने के बाद, गाँव के किसानों की एक बैठक बुलाई जाती है

गाँव के सभी इच्छुक दुग्ध उत्पादकों को एकत्र किया जाता है।

प्रवर्तक समिति (Promoter Committee) का चुनाव: काम को आगे बढ़ाने के लिए 5 से 7 किसानों की एक अस्थायी (Promoter) कमेटी चुनी जाती है।

इनमें से एक व्यक्ति को ‘मुख्य प्रवर्तक’ चुना जाता है जो कागजी कार्रवाई और बैंक का काम देखता है।

शेयर पूंजी और प्रवेश शुल्क जुटाना

समिति की वित्तीय शुरुआत के लिए किसानों से राशि ली जाती है ये प्रत्येक सदस्य से एक बार ली जाती है और 50 रूपये तक होती है।

प्रत्येक किसान से कम से कम 1 शेयर का पैसा लिया जाता है ।

यह सारा पैसा बैंक में खुलने वाले समिति के अस्थायी खाते में जमा किया जाता है।

पंजीकरण (Registration) की कागज़ी प्रक्रिया

सहकारिता विभाग से ‘समिति पंजीकरण फॉर्म’ लिया जाता है।

डेयरी फेडरेशन के तय किए गए नियम पुस्तिका पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर करवाए जाते हैं।

ज़रूरी दस्तावेज़

सभी सदस्यों के आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक पासबुक की कॉपी।

किसानों के पास उपलब्ध मवेशियों की संख्या का विवरण।

रेंट एग्रीमेंट या सहमति पत्र (अगर पंचायत भवन या निजी जगह इस्तेमाल हो रही हो)।

शुरुआती सदस्यों की सूची और उनके द्वारा खरीदे गए शेयर का ब्योरा।

सहायक निबंधक (Assistant Registrar – ARCS) इन कागजातों की जांच के बाद समिति को ‘पंजीकरण प्रमाण पत्र’ (Registration Certificate) जारी करते हैं।

सेटअप, उपकरण और कर्मचारियों की नियुक्ति

पंजीकरण के बाद समिति का ढांचा तैयार किया जाता है

स्टाफ की नियुक्ति की जाती है

सचिव (Secretary): जो हिसाब-किताब, रजिस्टर और दैनिक प्रबंधन देखेगा ।

परीक्षक : जो दूध का फैट और एसएनएफ (SNF) चेक करेगा।

सहायक: जो कैन उठाने और सफाई का काम करेगा।

उपकरण : जिला मिल्क यूनियन की तरफ से या समिति द्वारा ये सामान लगाया जाता है

वेइंग स्केल (दूध तोलने वाली मशीन)।

ऑटोमैटिक मिल्क एनालाइजर (फैट और SNF नापने की मशीन)।

एल्युमिनियम/स्टील के दूध के कैन ।

कंप्यूटर/डाटा प्रोसेसर और रसीद प्रिंटर

कामकाज और दूध संकलन की शुरुआत

एक निश्चित तारीख तय करके जिला संघ के अधिकारियों की मौजूदगी में केंद्र का संचालन शुरू किया जाता है।

रोज सुबह और शाम किसान दूध लाते हैं, मशीन से टेस्टिंग होती है, कंप्यूटर रसीद निकलती है और दूध को इंसुलेटेड कैन में भर दिया जाता है।

जिला दुग्ध संघ की गाड़ी रोजाना तय समय पर आकर गाँव से दूध के कैन उठा लेती है और चिलिंग सेंटर ले जाती है।

हर 10 दिन में जिला संघ द्वारा गाँव की समिति के खाते में पैसा भेजा जाता है, जिसे सचिव सभी किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर देता है।

नोट :- इस सहकारी समिति में कोई भी किसान 20 लीटर से ज्यादा दूध नहीं दे सकता अगर उसे 20 लीटर से ज्यादा दूध देना होता है तो उसे विशेष परमिशन की अवस्य्क्ता होती है।

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