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भोन्दूशाह मेला जो नादौन और धर्मशाला को आपस में जोड़ता है Bhondushah-mela-nadaun-dharmshala-history

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हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले की नादौन तहसील के बड़ा गॉव में एक मेला लगता है मेले का नाम है भोन्दूशाह। ये मेला करीब 7 दिनों तक चलता है।

इस मेले के देखने लोग दूर दूर से आते हैं लेकिन हिमाचल प्रदेश में ही बहुत कम लोगों को पता है कि ये मेला धर्मशाला के दाढ़ी नामक स्थान पर भी लगता है। क्या है इस मेले का इतिहास, महत्त्व और मुख्य आकर्षण आइये जानते हैं।

हिमाचल प्रदेश में साल भर कई मेले लगते हैं क्यूंकि हिमाचल प्रदेश में अधिकतर स्थान बहुत दुर्गम थे और बाजार बहुत सीमित थे इसलिए जब लोगों की ज़रूरतों की सारी चीज़ें एक जगह पर उपलब्ध होने लगी तो मेलों का महत्त्व बढ़ गया।

भोन्दूशाह मेला भी उनमे से एक है इसे नादौन के बड़ा में भोन्दूशाह और धर्मशाला के दाड़ी में बाबा धुम्मूशाह मेला के नाम से जाना जाता है।

यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं है बल्कि यह हमीरपुर जिले के नादौन और कांगड़ा जिले के धर्मशाला के बीच लोक-आस्था की एक अनूठी कड़ी है।

बाबा भोन्दूशाह जी का इतिहास

बाबा भोन्दूशाह जी एक महान सूफी संत थे। माना जाता है कि सूफी संत बाबा भोन्दूशाह जी ने अपने आध्यात्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण समय काँगड़ा जिले के दाड़ी क्षेत्र में बिताया। वहाँ उन्होंने एकांत में ईश्वर भक्ति की।

जब उनकी आध्यात्मिक शक्तियों और जनसेवा की धूम (प्रसिद्धि) चारों दिशाओं में फैल गई तो वे धुम्मूशाह के नाम से प्रसिद्ध हुए।

​वे किसी एक धर्म की सीमाओं में बंधकर नहीं रहे। उनके दरबार में हिंदू, मुस्लिम, सिख और हर वर्ग का व्यक्ति समान आस्था के साथ शीश नवाता है।

दाड़ी के बाद बाबा भोन्दूशाह जी नादौन तहसील के बड़ा गाँव पहुँचे। यहाँ का शांत माहौल और प्राकृतिक वातावरण उन्हें बहुत प्रिय लगा जिसके बाद वे यहीं निवास करने लगे और अपने जीवन का अंतिम समय यहीं बिताया।

बड़ा गाँव में रहते हुए बाबा जी ने जाति-पात से ऊपर उठकर हर गरीब, पीड़ित और बीमार व्यक्ति की निस्वार्थ सेवा की। लोक मान्यताओं के अनुसार, उनके आशीर्वाद से लोगों की मन्नतें पूरी होने लगीं और उनकी आध्यात्मिक ख्याति पूरे क्षेत्र में फैल गई।

हिमाचली लोकबोली में भोन्दू शब्द अत्यंत सीधे-सादे, निष्कपट और सांसारिक छल-कपट से दूर रहने वाले व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है। बाबा जी के अत्यंत सादे और नम्र सूफी स्वभाव के कारण श्रद्धालुओं ने उन्हें भोन्दूशाह नाम दिया।

नोट :- दोनों स्थानों पर क्रमशः अप्रैल और जून में मेले आयोजित होते हैं। ऐतिहासिक रूप से नादौन का मेला बैलों के व्यापार के लिए जाना जाता था जबकि दाड़ी का मेला व्यापार और कुश्ती (छिंज) का बड़ा केंद्र रहा है। ​नादौन और दाड़ी (धर्मशाला) दोनों ही स्थानों पर यह मेला लगभग 2 शताब्दियों से भी अधिक समय से निरंतर आयोजित होता आ रहा है।

दो स्थान, एक आस्था: नादौन और धर्मशाला का जुड़ाव

बहुत कम मेले ऐसे होते हैं जिनका विस्तार दो अलग-अलग जिलों में इस तरह से देखने को मिलता है। बाबा भोन्दूशाह जी के जीवन और तपोभूमि से जुड़े दो मुख्य केंद्र हैं

​बड़ा गाँव, नादौन (ज़िला हमीरपुर) —नादौन बड़ा मेले का इतिहास इन हिंदी

​हमीरपुर की नादौन तहसील के बड़ा गाँव में बाबा भोन्दूशाह जी की मज़ार स्थित है। यहाँ हर साल जून महीने में भव्य मेला आयोजित होता है। मेले की आधिकारिक शुरुआत पीर बाबा भोंधू शाह जी की मज़ार पर पारंपरिक झंडा फहराने और पवित्र चादर चढ़ाने के साथ होती है।

स्थानीय लोग, मेले में आने वाले श्रद्धालु और मेले के प्रबंधक दरगाह पर माथा टेकते हैं, दीपक जलाते हैं और इलाके की खुशहाली व शांति के लिए दुआ मांगते हैं।

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इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिता (छिंज) होती है। मेले की शुरुआत के साथ ही विभिन्न अखाड़ों से पहलवान यहाँ पहुँचते हैं और दंगल का आगाज़ होता है।

पूजा और रस्मों के बाद मेले में दुकानें, झूले और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं जहाँ आसपास के गाँवों से भारी संख्या में लोग खरीदारी के लिए जुटते हैं।

दाड़ी, धर्मशाला (ज़िला कांगड़ा) — बाबा धुम्मूशाह मेला धर्मशाला

​कांगड़ा जिले के धर्मशाला स्थित दाड़ी क्षेत्र में बाबा धुम्मूशाह जी की गद्दी है। अपनी जीवन-यात्रा के दौरान बाबा जी यहाँ भी लंबे समय तक रुके थे।

धर्मशाला के दाड़ी मेला ग्राउंड में हर साल 8 से 15 अप्रैल में राज्य स्तरीय बाबा धुम्मूशाह मेला आयोजित किया जाता है।

दाड़ी मेला ग्राउंड के पास स्थित इस पवित्र स्थान पर बाबा जी की गद्दी स्थापित है जहाँ संगमरमर और सुंदर नक्काशीदार संरचना बनी हुई है।

अप्रैल में आयोजित होने वाले राज्य स्तरीय मेले के दौरान इसी गद्दी पर सबसे पहले प्रशासनिक अधिकारियों और मेला समिति द्वारा पारंपरिक चादर पोशी की जाती है।

जिसके बाद ही मेले और छिंज (दंगल) की आधिकारिक शुरुआत होती है। परिसर में मुख्य स्थान पर बाबा जी का झंडा साहिब लहराता है और श्रद्धालु यहाँ मन्नत माँगते हुए दीपक जलाते हैं।

भोन्दूशाह मेला जो नादौन और धर्मशाला को आपस में जोड़ता है Bhondushah-mela-nadaun-dharmshala-history

मेले का ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्त्व

​आज के समय में तो मेले मनोरंजन और खरीदारी का जरिया हैं लेकिन पुराने ज़माने में नादौन का भोन्दूशाह मेला बहुत बड़ा पशु मेला हुआ करता था।

जून का महीना मक्की की बुआई और मानसूनी खेती की तैयारी का समय होता था और खेती का दौर पूरी तरह बैलों पर निर्भर था। उस दौर में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के कोने-कोने से किसान और पशु व्यापारी हट्टे-कट्टे बैल और मवेशी खरीदने व बेचने यहाँ आते थे।

बैलों की सजावट के सामान जैसे घंटियाँ, रंग-बिरंगी रस्सियाँ आदि से पूरा बाज़ार सजता था। हालाँकि अब आधुनिक मशीनों के आने से बैलों का व्यापार अब नहीं होता लेकिन इस मेले की ऐतिहासिक पहचान आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है।

​मेले के प्रमुख आकर्षण

​मेले की शुरुआत मज़ार पर चादर चढ़ाने, चिराग रोशन करने और सूफी कव्वालियों के साथ होती है। नादौन और दाड़ी—दोनों ही मेलों का सबसे बड़ा आकर्षण छिंज यानी कुश्ती प्रतियोगिता है। इसमें हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के नामी पहलवान हिस्सा लेते हैं।

​बाबा भोंडूशाह का मेला केवल एक तारीख या धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह नादौन की ऐतिहासिक माटी और धर्मशाला की वादियों को जोड़ने वाला एक ऐसा अदृश्य पुल है जो हमें सिखाता है कि आस्था और सूफी परंपराएं इंसानों को बाँटती नहीं बल्कि आपस में जोड़ती हैं।

यदि आप हिमाचली संस्कृति, ऐतिहासिक मेलों और पीर-फ़कीरों की परंपरा को करीब से समझना चाहते हैं तो जून में नादौन के बड़ा गाँव और अप्रैल में धर्मशाला के दाड़ी मेले का अनुभव एक बार ज़रूर लें!

संदर्भ: राज्य स्तरीय बाबा धुम्मूशाह मेला समिति स्मारिका (दाड़ी, कांगड़ा) एवं स्थानीय लोक-इतिहास लेख।

FAQ

बाबा भोन्दूशाह मेला (बाबा धुम्मूशाह मेला) कहाँ और कब आयोजित होता है?

यह मेला दो मुख्य स्थानों पर आयोजित होता है—
​नादौन (हमीरपुर): तहसील नादौन के बड़ा गाँव में हर साल जून के महीने में।

बाबा भोंडूशाह और बाबा धुम्मूशाह में क्या अंतर है?

बाबा भोंडूशाह और बाबा धुम्मूशाह एक ही सिद्ध सूफी संत के दो प्रचलित नाम हैं। उनके सादे और निष्कपट स्वभाव के कारण उन्हें भोन्दूशाह और उनकी प्रसिद्धि (धूम) के कारण उन्हें धुम्मूशाह कहा जाता है।

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