NABARD : National Bank for Agriculture and Rural Development

नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) गॉँव में सड़कों, पुलों, सिंचाई परियोजनाओं और गोदामों का निर्माण करवाता है परन्तु क्या हम जानते हैं कि नाबार्ड के तहत होने वाला किसी भी तरह का निर्माण राज्य सरकारों पर कर्ज की तरह होता है। जिसका राज्य सरकारों को कम ब्याज पर ही सही पर भुगतान करना पड़ता है।

हर साल जब राज्य का वित्त मंत्री बजट पेश करता है तो भाषण में “RIDF”, “NABARD-assisted“, या “सूक्ष्म सिंचाई/ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर फंड” शब्द आते ही समझ जाइए कि नाबार्ड के लोन, बजट या किश्त की बात हो रही है। इस प्रकार राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा इस ऋण को चुकाने में लग जाता है।

नाबार्ड के पास इतना पैसा कहाँ से आता है।

नाबार्ड के पास पैसा 5 तरीकों से आता है

बैंकों पर पेनाल्टी पैसे का मुख्य स्त्रोत

भारत में सभी कमर्शियल बैंकों (जैसे HDFC, SBI, ICICI आदि) के लिए एक नियम है जिसे ‘प्रायोरिटी सेक्टर लैंडिंग‘ (PSL) कहते हैं जिसके तहत जितना लोन वो हर साल देते हैं उसका 40% हिस्सा कृषि के लिए देना जरुरी होता है। परन्तु ये 40% लोन का टारगेट बैंक कभी पूरा नहीं कर पाते।

क्यूंकि कई बार फसल खराब होने या सूखा पड़ने पर किसानों के लिए लोन चुकाना मुश्किल हो जाता है और राज्यों द्वारा समय-समय पर की जाने वाली कृषि ऋण माफी की घोषणाओं से किसानों में कर्ज न चुकाने की प्रवृत्ति बढ़ती है इस कारण ये बैंक कृषि लोन देने से परहेज ही करते हैं।

इसके अलावा किसानो के पास स्पष्ट जमीन के मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं होते। और CIBIL / क्रेडिट स्कोर या इनकम प्रूफ नहीं होता। इसके कारण बैंक रिस्क उठाने से कतराते हैं।

इसके विपरीत नाबार्ड को दिया हुआ पैसा, नाबार्ड द्वारा बैंकों को समय पर वापस कर दिया जाता है इसलिए बैंकों का पैसा डूबता नहीं है। इसलिए बैंक ग्रामीणों को लोन देने के बजाय नाबार्ड को देना ही उचित समझते हैं।

अब जब बैंक अपने 40% ऋण के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाते तो उन्हें बची हुई अंतर-राशि, नाबार्ड के RIDF (ग्रामीण अवसंरचना विकास कोष) में जमा करानी पड़ती है।

बॉन्ड्स जारी करके या बाजार से उधर लेकर

नाबार्ड खुद के इंस्टीट्यूशनल बॉन्ड्स जारी करता है जिन्हें बड़े निवेशक, पेंशन फंड, बीमा कंपनियां (LIC आदि) और कॉर्पोरेट खरीदते हैं क्यूंकि इनसे कंपनियों को एक तय दर पर नियमित और स्थिर आय प्राप्त होती है

वे इन बॉन्ड्स में निवेश करके टैक्स बचा सकती हैं। इन बॉन्ड्स को आमतौर पर उच्चतम क्रेडिट रेटिंग (AAA) मिलती है, जिससे पैसा डूबने का जोखिम न के बराबर होता है। और कंपनियां इन उच्च-रेटेड बॉन्ड्स को बैंक में बंधक रखकर आवश्यकता पड़ने पर अल्पकालिक ऋण (Short-term Loans) भी आसानी से प्राप्त कर सकती हैं।

भारत सरकार से सहायता

नाबार्ड की 100% हिस्सेदारी भारत सरकार के पास है। समय-समय पर केंद्र सरकार अपनी इक्विटी/कैपिटल बढ़ाकर नाबार्ड में पैसा डालती है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मिलने वाला लोन

विश्व स्तर पर ग्रामीण विकास और जलवायु परिवर्तन के लिए काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं नाबार्ड को बहुत कम ब्याज पर लम्बी अवधि के लिए लोन देती हैं। ये लोन विश्व बैंक, ADB (Asian Development Bank) और KFW जैसी वैश्विक संस्थाओं से प्राप्त होता है।

खुद की कमाई और लोन की रीपेमेंट

नाबार्ड ने राज्य सरकारों, सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को जो लाखों करोड़ रुपये का लोन दिया है उससे उसे लगातार भारी मात्रा में ब्याज मिलता है।

नाबार्ड की स्थापना कब और क्यों हुई

बैंकों की पहुंच कम होने के कारण गांव के गरीब किसान और मजदूर कर्ज के लिए स्थानीय साहूकारों पर निर्भर थे जो उनसे भारी ब्याज वसूलते थे और गरीब मजदूरों की कई पीडियाँ केवल ब्याज का भुगतान करती रहती थीं।

केंद्रीय बैंक होने के नाते RBI के लिए देश की मौद्रिक नीति संभालने के साथ-साथ हर गांव की वित्तीय समस्याओं को संभालना मुश्किल हो रहा था।

सहकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक जैसी संस्थाएं सीधे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और राज्य सरकारों को रिपोर्ट करते थे। इसलिए एक ऐसी संस्था की अवस्य्क्ता थी जो इनकी देख रेख कर सके।

इसके अलावा 1982 से पहले ग्रामीण कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, सड़कों-गोदामों के निर्माण और गैर-कृषि रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कोई समर्पित संस्था नहीं थी।

इन सभी कमियों को दूर करने के लिए 1979 में बी. शिवरामन समिति का गठन किया गया। समिति ने सिफारिश की कि RBI से कृषि ऋण का पूरा ढांचा अलग करके एक अलग ‘शीर्ष बैंक’ बनाया जाए, जिसके बाद 12 जुलाई 1982 को नाबार्ड का जन्म हुआ।

नाबार्ड का काम क्या क्या है नाबार्ड कैसे लोन देता है।

नाबार्ड किसानों को सीधा लोन देने के बजाय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों को कम ब्याज पर फंड उपलब्ध कराता है। फसल, खाद-बीज की अल्पकालिक जरूरतों से लेकर ट्रैक्टर, सिंचाई और डेयरी फार्मिंग जैसे लम्बी अवधि के कामों के लिए लोन उपलब्ध करवाता है।

RIDF के जरिए राज्य सरकारों को गांवों में सड़कें, पुल, सिंचाई परियोजनाएं आदि के लिए सस्ता कर्ज देता है।

समय समय पर ग्रामीण बैंको और सहकारी बैंको का ऑडिट करता है। ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए SHG (Self Help Group) (स्वयं सहायता समूह) बनाकर उन्हें बैंकों से लोन दिलाने की सुविधा देता है। गांवों में वित्तीय जागरूकता अभियान चलाता है ताकि लोग बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठा सकें।

नाबार्ड के ऋण का भुगतान राज्य सरकारें कैसे करती हैं

नाबार्ड के लोन का भुगतान करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के वित्त विभाग की होती है। राज्य सरकार हर साल अपने वार्षिक बजट में “Debt Servicing” (कर्ज पुनर्भुगतान) के तहत नाबार्ड के मूलधन और ब्याज की किस्तों के लिए अलग से फंड रखती है।

ऋण चुकाने का समय 7 बर्ष का होता है जिसमे 2 साल का केवल ग्रेस पीरियड होता है जिसमे केवल ब्याज चुकाया जाता है। इसके बाद अगले 5 वर्षों में समान किस्तों में लोन चुकता किया जाता है।

जिन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए नाबार्ड से लोन लिया गया था जैसे सड़कें और पुल, सिंचाई, मंडी आदि उनमें से कई से राज्य सरकार को राजस्व मिलता है जैसे टोल टैक्स, पानी का शुल्क, वेयरहाउसिंग शुल्क आदि। इस राजस्व का उपयोग नाबार्ड की किस्तों के भुगतान में किया जाता है।

अगर राज्य सरकारें किसी बजह से नाबार्ड के लोन की किस्त समय पर चुकाने में विफल रहती है तो राज्य सरकारों के खाते जो रिज़र्व बैंक में होते हैं उनसे रिज़र्व बैंक डायरेक्ट ऑटो डिडक्ट कर लेता है।

इन खातों में अगर बैलेंस न भी हो तो इनमे ओवरड्राफ्ट की सुबिधा होती है। जैसे हमारे किसी अकाउंट में अगर ओवरड्राफ्ट की सुबिधा है और उसमे यदि 30,000 रूपये है तो ओवरड्राफ्ट की सुबिधा के कारण हम उसमे से 50,000 रूपये निकाल सकते हैं।

हमें 20,000 रूपये पर व्याज भरना होगा और जैसे ही 20,000 रूपये अकाउंट में दोवारा आ गए तो लोन उसी समय बंद हो जायेगा और हमें केवल उतने दिनों का ही व्याज भरना पड़ेगा जितने दिनों तक वो पैसे हमारे अकाउंट में नहीं थे।

सभी राज्यों सरकारों के खाते रिज़र्व बैंक में WMA (Ways and Means Advances) और ओवरड्राफ्ट (Overdraft) होते हैं। इस प्रकार खाते में पैसा न होने के वाबजूद काम चलता रहता है। केंद्र सरकार से मिलने वाली ग्रांट भी इसी खाते में आती है।

इसके अलावा केन्द्र सरकार से राज्यों को मिलने वाले करों के हिस्से (SGST) और विशेष सहायता अनुदान का उपयोग भी राज्य सरकारें अपने दीर्घकालिक नाबार्ड ऋणों को चुकाने के लिए करती हैं।

राज्यों पर बहुत ज्यादा क़र्ज़ बढ़ जाये तो क्या होता है

जब राज्यों पर बहुत ज़्यादा क़र्ज़ बढ़ जाये तो बजट का एक बड़ा हिस्सा इसको चुकाने में लग जाता है जिसके फलस्वरूप सरकारें सबसे पहले सड़कें, पुल, अस्पताल, स्कूल और सिंचाई जैसी पूंजीगत संपत्तियों के निर्माण पर खर्च रोक देती हैं।

स्वास्थ्य, शिक्षा, मुफ्त बिजली, राशन और पेंशन जैसी योजनाओं के लिए फंड की कमी हो जाती है। सब्सिडी या तो बंद करनी पड़ती है या कम करनी पड़ती है, जिसका सबसे सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।

वित्तीय संकट इतना गहरा जाता है कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को समय पर तनख्वाह और पेंशन देने के लाले पड़ जाते हैं।

भारतीय संविधान (Article 293) के तहत केंद्र सरकार राज्य के अतिरिक्त कर्ज लेने पर कैपिंग लगा देती है। वित्तीय स्थिति ज्यादा बिगड़ने पर RBI से ‘ओवरड्राफ्ट’ मिलना बंद हो जाता है और राज्य की क्रेडिट रेटिंग गिर जाती है, जिससे भविष्य में कोई बैंक या संस्था उसे आसानी से लोन नहीं देती।

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