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राधा स्वामी व्यास जी की शिक्षाएं और उनका हिन्दू धर्म पर प्रभाव

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आज हम बात करने जा रहे कि हिन्दू धर्म के मानने वालों ने व्यास वाले बाबा जी कि शिक्षाओं को कैसे ख़ुशी ख़ुशी अपना लिया क्यूंकि हिन्दू धर्म तो सर्वश्रेष्ठ धर्म हैं हिन्दू धर्म की शिक्षाएं इतनी शानदार हैं कि दूसरी किसी शिक्षा के लिए जगह ही नहीं बचती

राधा स्वामी सतसंग की स्थापना कब हुई | राधा स्वामी सतसंग की स्थापना किसने की।

मत की स्थापना स्वामी शिव दयाल सिंह सेठ ने की थी । 24 अगस्त 1818 को उनका जन्म उत्तर प्रदेश में में हुआ था।

उन्होंने 15 फरवरी सन 1861 को राधा स्वामी सत्संग की शुरुआत यहीं से की थी। इनकी पत्नी का नाम राधा था।

पहले गुरु की मृत्यु के 11 साल बाद 1889 में सेना से रिटायर जयमल सिंह ने पंजाब में ब्यास नदी के किनारे नामदान देना शुरू कर दिया।

इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्यूंकि व्यास वाले बाबा जी अपनी शिक्षाओं के साथ साथ एक (flexibility) लचीलापन प्रदान करते हैं जिससे किसी को अपना धर्म त्यागने की आवश्यकता नहीं और वो अपने धर्म में रहते हुए भी उनकी शिक्षाओं को मान सकता है।

लेकिन फिर भी अगर हमारे पास वेद हैं पुराण हैं तो भी अगर पूरी दुनिया बाबा जी के पीछे है तो इसका कुछ तो कारण होगा। तो इसके सम्भाबित कारण जो समझ में आये वो इस प्रकार हैं।

हिन्दू धर्म की औपचारकिताएं

आप हर हफ्ते 2 दिन बाबा जी का सत्संग सुन सकते हो इसमें बस आपने सेवा करनी होती है वो भी अपनी मर्जी से।

हर रविवार को आप 1 घंटा जाकर बाबा जी का सत्संग सुन सकते हो। और इसके लिए आपको कोई पैसे नहीं देने होते। न ही इसमें कोई औपचारकता होती है।

इसके बिपरीत अगर आपको हिन्दू धर्म में रविवार को कथा करवानी हो तो सामग्री इस प्रकार है

सामानमात्रा
 श्री फल1
 सुपारी9
 लौंग5 ग्राम
 इलायची5 ग्राम
 पान के पत्ते9
 रोली2 पैकेट
 मोली2 गोली
 जनेऊ3
कच्चा दूध50 ग्राम
 दही50 ग्राम
 देशी घी1/2  किलो ग्राम
 शहद150 ग्राम
 शक्कर150 ग्राम
 साबुत चावल1/2 किलो
 पंच मेवा150 ग्राम
 पंच मिठाई1 किलो ग्राम
 ॠतु फल1 किलो ग्राम
 फूल माला,फूल5
 धूप, अगरबत्ती2 – 1 पैकेट
 हवन सामग्री5 किलो ग्राम
 जौ500 ग्राम
 काले तिल500 ग्राम
 मिट्टी के बड़ा दीया3
 रूई2पैकेट
 पीला कपड़ासवा मीटर
 कपूर7 टिक्की
 दोने11 पैकेट
 आम के पत्ते7 पत्ते
आम की लकडियां1/2 किलो ग्राम
 केले के पत्ते72
 आटे का प्रसाद1/2 किलो ग्राम
 ब्राम्हण को वस्त्र और दक्षिणा2100/-
सत्य नारायण जी कथा सामग्री
राधा स्वामी व्यास जी की शिक्षाएं और उनका हिन्दू धर्म पर प्रभाव

अब कोई बताये ये कथा हर हफ्ते करनी पड़ जाये तो इस महंगाई के समय में पाँचवा या छठा हफ्ता आते आते कथा में इन सब चीज़ों के साथ साथ फूल चढ़ाते चढ़ाते हमें अपने फूल हरिद्वार में चढ़ाने पड़ जायेंगे।

जटिल भाषा

हिन्दू धर्म में सारा काम संस्कृत में होता है। हमारे पुजारी जी कथा करते हैं तो मंत्र उच्चारण भी संस्कृत में करते हैं। उदाहरण के लिए

  • ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
  • लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्यान नग्म्य्म।
  • वन्दे विष्णुम भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम।

अब इन मंत्रो को कोई संस्कृत का जानकर ही समझ सकता है। संस्कृत सबसे आसान भाषा है परन्तु आम बोल चाल की भाषा न होने के कारण किसी की समझ में नहीं आती

दूसरी और बाबा जी के सत्संग आम भाषा में होते हैं। जो हर व्यक्ति की समझ में आ जाते हैं। उदाहरण के लिए सत्संग में कुछ इस तरह से कहा जाता है

अकालपुर्ख आखदे ने मर्दानेया (मर्दाना बाबा नानक जी का सेवक था जो उस समय उनका अनुयायी बन गया था ) ऐ तेरी जमीना जयदाता इथे ही रह जाणियां ने, एह दौलता सोहरता इथे ही रह जाणीयां है।

एह तेरे नाल नहीं जा सकदीयां है। जिंना लेई तू चोरियां करदा है। जिंना लेई तू ठगियां करदा है। झूठ बोल्दा है। उना ने अंत वेले तेरा साथ नहीं देणा है।

अब चूँकि ये एक पंजाबी बोली है जिसे उत्तर भारत के लोग आसानी से समझ जाते हैं। तो ये इनके द्वारा बताई गई शिक्षाएं लोगो के दिलों तक असर करती हैं।

नवाचार (innovation) का आभाव

सत्यनारायण भगवान की कथा में ले देकर बस 3 या 4 कहानियाँ हैं। वही भव सागर से पार लगाने वाली कहानी जिसमे लक्ष्मी माता जी लोगो को भगवन श्री सत्य नारायण जी की कथा सुनने से भटकाने के लिए मटकों से हाथ लगाती हैं और वो सोने के बन जाते हैं।

वही कहानी बार बार रिपीट होती हैं और इस सदी के लोग उस कहानी से अपने आपको रिलेट नहीं कर पाते। हमारे पूजनीय पुरोहित जी इसमें अपनी कुछ भी नई और ताजी सामग्री जोड़ने में असमर्थ हैं।

जबकि सतसंग में जमीन, रिश्तेदारों और बच्चों संबधी नए नए और लोगों से जुड़े हुए उदाहरण दिए जाते हैं। तो लोग इन चीज़ो से अपने आपको रिलेट कर पाते हैं। इसलिए वहां पर बार बार जाने से भी लोग सत्संग को सुनने से ऊबते नहीं हैं।

कर्मकांड के विरुद्ध प्रतिक्रिया

मंदिरों में जाना और पूजा पाठ करवाना लोगो को महंगा पड़ता है। पुरोहित जी कभी भी कोई भी पाठ करवाने को बोल देते हैं। हिन्दू धर्म की इन्ही कमियों की वजह से किसी समय बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए रास्ता बना था।

दूसरी तरफ सत्संग में ऐसी कोई भी बंदिश नहीं है। पूजा पाठ के लिए मूर्ति की आवस्य्क्ता होती है जबकि बाबा जी का ध्यान आप सोते सोते भी लगा सकते हो। और इसके लिए आपको किसी भी औपचारिकता की अवस्य्क्ता नहीं होती।

जाति प्रथा

अगर हम समझते हैं कि जाति प्रथा ख़त्म हो चुकी है तो ये हमारी नासमझी है। ये हैं दलितों और अधीनस्थ जातियों के ख़िलाफ़ कुछ बड़े अपराध, जो हाल ही के वर्षों में हुए हैं।

1968 में तमिलनाडु राज्य के की झवेनमनी में चवालीस दलितों को ज़िन्दा ज़ला दिया गया। 1977 में बिहार के बेल्छी में चौदह दलितों को ज़िन्दा ज़ला दिया गया।

1978 में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन जंगलों में स्थित एक द्वीप मरीछझपी में वामपंथ नेतृत्व वाली सरकार के एक बेदखली अभियान के दौरान, बांग्लादेश के सैकड़ों दलित शरणार्थियों का नरसंहार कर दिया।

1984 में आन्ध्र प्रदेश के करमचेडू में छह दलितों की हत्या कर दी गई, तीन दलित महिलाओं का बलात्कार हुआ और अनेकों जख्मी हुए।

1991 में चुन्दुरु, आन्ध्र प्रदेश में भी, नौ दलितों की निर्मम हत्या की गई और उनका शव एक नहर में फेंक दिया गया। 1997 में तमिलनाडु में मेलावलावु में एक निर्वाचित दलित पंचायत नेता और पाँच दलितों की हत्या की गई। 2000 में कर्नाटक राज्य के कम्बलापल्ली में छह दलितों को ज़िन्दा जलाया गया।

2002 में हरियाणा राज्य के झज्जर जिले में, एक पुलिस थाने के बाहर पाँच दलितों की हत्या कर दी गई। ह्यूमन राइट्स वाच (1999) और नवसर्जन (2009) की रिपोर्ट

1931 में जब आंबेडकर पहली बार गांधी से मिले तो गांधी ने उनसे प्रश्न किया कि वे कांग्रेस की इतनी कटु आलोचना क्यों करते हैं ? (उस समय कांग्रेस की आलोचना का मतलब होता था, मातृभूमि के लिए संघर्ष का विरोध) आंबेडकर का जवाब था, “गांधी जी, मेरी कोई अपनी मातृभूमि नहीं है, कोई भी अछूत जिसमें थोड़ी-सी भी चेतना हो, इस मातृभूमि पर गर्व नहीं करेगा।

राधा स्वामी सत्संग में सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है।

राधा स्वामी मत में सभी से सामान व्यवहार किया जाता है। चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई , चाहे कोई ब्राह्मण हो या कोई दलित सभी एक साथ बैठते है। एक साथ भोजन करते हैं। इस तरह से उनमे ऊँच नीच की भावना नहीं रहती।

उपसंहार

हत्या और आत्महत्या में फर्क सिर्फ इतना होता हैं कि आत्महत्या में हत्यारा सम्पूर्ण समाज होता है

जापान के बारे में एक आर्टिकल में एक बार लिखा गया था कैसे एक परिवार में एक लड़की के पिता की इच्छा पर उसका अंतिम संस्कार जला कर किया गया और माता की इच्छा पर उसका अंतिम संस्कार दफना कर किया गया।

क्या हम पुरानी रूढ़ियों को तोड़ते हुए इस महान संस्कृति में नई ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।

डेरा समुदाय में नाम दान कैसे और क्यों दिया जाता है पढ़ने के लिए क्लिक करें

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