हम जानते हैं कि नर शेर और मादा बाघिन के मेल से लाइगर पैदा होता है। ये दुनिया की सबसे बड़ी बिल्ली की प्रजाति मानी जाती है। नर बाघ और मादा शेरनी के मेल से टाइगॉन पैदा होता है। ये आकार में आमतौर पर अपने माता-पिता से छोटा होता है।

नर गधे और मादा घोड़ी के मेल से खच्चर बनता है। नर घोड़ा और मादा गधी का मेल कराया जाए, तो उससे जो बच्चा पैदा होता है उसे हिनि कहते हैं। हिनि आकार में खच्चर से थोड़ी छोटी होती है।

ज़ेब्रा और गधे के मेल से ज़ोंकी बनता है। ज़ेब्रा और घोड़ा मिले तो उसे ज़ोर्स कहते हैं। इनके शरीर पर ज़ेब्रा की तरह धारियां देखने को मिलती हैं। घरेलू गाय और यूरोपीय बाइसन के मेल से बना जानवर ज़ुब्रॉन है।

इस तरह पैदा हुए अधिकतर जानवर आगे बच्चे पैदा नहीं कर सकते क्यूंकि उनके क्रोमोसोम में हल्का सा अंतर होता है जैसे घोड़े में 64 क्रोमोसोम होते हैं और गधे में 62 क्रोमोसोम होते हैं जिससे वो जोड़े नहीं बना पाते। ये बच्चा पैदा करने में इसलिए सक्षम हो जाते हैं क्यूंकि भ्रूण का विकास माइटोसिस नाम की प्रक्रिया से होता है। इसमें एक कोशिका अपनी हूबहू कॉपी बनाकर दो कोशिकाओं में बंटती है।

इल्या इवानोव जो कि रूस के एक प्रसिद्ध जीवविज्ञानी थे उन्होंने इंसान और चिंपैंजी का हाइब्रिड बनाने की कोशिश की थी क्यूंकि चिम्पाजी का 98% डीएनए इंसान के डीएनए से मैच करता है। उन्होंने मादा चिंपैंजी में इंसानी शुक्राणु डालकर उन्हें गर्भवती करने की कोशिश की लेकिन कोई भी गर्भ 16 दिन से ज्यादा नहीं टिक पाया।

हालाँकि उन्होंने इसका उल्टा भी करने की कोशिश की थी लेकिन नैतिक विरोध के चलते उनको गिरफ्तार कर लिया गया। वैज्ञानिको का मानना है कि वो सफल इसलिए नहीं हो पाए इंसानों में 46 (23 जोड़े)(23 नर के- 23 मादा के) क्रोमोसोम होते हैं और चिंपैंजी/बंदरों में 48 (24 जोड़े) क्रोमोसोम होते हैं।

इसलिए एक तो ये आपस में 23 और 24 मिलकर आपस में जोड़े नहीं बना पाते। दूसरा, इंसान और चिम्पाजी लगभग 70-80 लाख साल पहले एक दूसरे से अलग हुए थे तो एवोलुशन के प्रोसेस में इनके क्रोमोसोम की अंदरूनी बनावट और जीन की व्यवस्था एक-दूसरे से इतनी अलग हो चुकी है कि शुक्राणु और अंडा आपस में मिलकर शुरुआती भ्रूण बनाने के निर्देश को समझ ही नहीं पाते।

चाहे जो भी हो एक प्रजाति को बच्चा पैदा करने के लिए कम से कम ये कंडीशन जरुरी है कि उसके पूर्वज एक होने चाहिए। घोड़े और गधे के पूर्वज लगभग 50-60 लाख साल पहले एक ही थे, शेर और बाघ के पूर्वज एक ही थे। डार्विन ने सबसे पहले अपनी यात्राओं के दौरान ये जाना था कि एक ही तरह की प्रजाति की चिड़ियाँ अलग अलग जगहों पर, भोजन के लिए अलग अलग परिस्थितियों मिलने के कारण, अलग अलग तरह की हो गई थीं।

उसी प्रकार कुत्ते और भेड़िये के पूर्वज भी एक ही थे जिसका फायदा उठाते हुए, इंसान ने निर्मित किये ऐसे कुत्ते जिसे हम वुल्फडॉग कहते हैं इन्हे आधिकारिक रूप से घर में रखने के लिए मान्यता मिली हुई है। सावलोस वुल्फडॉग और जर्मन शेफर्ड या चेकोस्लोवाकियन वुल्फडॉग इनमे प्रमुख हैं।

कुत्ते और भेड़िये में क्रोमोसोम्स की संख्या कितनी होती है

कुत्ते और भेड़िये दोनों में ही क्रोमोसोम की संख्या 78 होती है जिसमे 39 नर के होते हैं और 39 मादा के होते हैं। इसलिए ये बच्चे पैदा कर सकते हैं और इनके बच्चे भी आगे बच्चे पैदा कर सकते हैं।

कैसे पैदा होता है वुल्फडॉग

वुल्फडॉग पैदा करने के लिए आमतौर पर मादा कुतिया और नर भेड़िये का चुनाव किया जाता है इसके पीछे का कारण है कि एक तो कुतिया अपने बच्चों को इंसानो के साथ घुलना मिलना सिखाएगी जबकि अगर मादा भेड़िया होगी तो वो बच्चो को लेकर आक्रामक हो सकती है।

इसके अलावा अगर मादा कुतिया होगी तो गर्भावस्था के दौरान उसकी देखभाल करना, सही खान-पान देना और डिलीवरी के समय डॉक्टर या इंसानी मदद देना बहुत आसान होता है।

मादा कुत्ते के रूप में आमतौर पर जर्मन शेफर्ड, साइबेरियन हस्की को चुना जाता है, क्योंकि इनका शारीरिक आकार और ढांचा भेड़ियों से मिलता-जुलता होता है।

प्रजनन

वुल्फडॉग पैदा करने में पीडियों की कड़ी मेहनत लगती है।

फर्स्ट जनरेशन:- इसमें मादा कुत्ते और नर भेड़िये का मिलन करवाया जाता है।

इस मिलन से जन्म लेने वाले बच्चे 50% भेड़िये और 50% कुत्ते के गुणों के साथ जन्म लेते हैं।

सेकंड जनरेशन :- फर्स्ट जनरेशन से पैदा होने वाली मादा कुतिया का मिलन फिर से जर्मन शेफर्ड से करवाया जाता है।

इस मिलन से जन्म लेने वाले बच्चे 25% भेड़िये और 25% कुत्ते के गुणों के साथ जन्म लेते हैं।

थर्ड जनरेशन :- सेकंड जनरेशन से पैदा होने वाली मादा कुतिया का मिलन फिर से जर्मन शेफर्ड से करवाया जाता है।

इस मिलन से जन्म लेने वाले बच्चे 12.5% भेड़िये और 12.5% कुत्ते के गुणों के साथ जन्म लेते हैं।

इस प्रकार कुत्तो का स्तर 3 भागों में विभाजित हो जाता है

वुल्फडॉग में भेड़िये का कितना अंश है, इसे तीन श्रेणियों में बांटा जाता है

लो-कंटेंट :- इसमें 12.5% से 20% भेड़िये का डीएनए होता है। इनका व्यवहार और दिखना काफी हद तक नॉर्मल कुत्ते (जैसे हस्की या जर्मन शेफर्ड) जैसा होता है।

मिड-कंटेंट: इसमें 35% से 75% भेड़िये का डीएनए होता है। इनमें भेड़ियों की तरह लंबे पैर, पतली छाती और शर्मीला/आक्रामक मिला-जुला व्यवहार दिखता है।

हाई-कंटेंट: इसमें 75% से ज्यादा भेड़िये का डीएनए होता है। ये दिखने और बर्ताव में लगभग 90% असली भेड़िये जैसे ही होते हैं।

गर्भावस्था और जन्म

मादा (चाहे वह भेड़िया हो या कुत्ता) की गर्भावस्था का समय इंसानों की तरह नहीं बल्कि लगभग 60 से 65 दिन का होता है।

मादा एक बार में 4 से 8 पिल्लों को जन्म देती है।

जन्म के समय वुल्फडॉग के बच्चे पूरी तरह से अंधे और बहरे होते हैं। वे पूरी तरह से अपनी मां की गर्माहट और दूध पर निर्भर रहते हैं। 10 से 14 दिनों के बाद उनकी आंखें खुलती हैं।

वुल्फडॉग के साथ जुड़ी चुनौतियां

वुल्फडॉग को पालना आम कुत्तों को पालने जितना आसान क्यों नहीं होता।

वुल्फडॉग को पालना आम कुत्तों को पालने जितना आसान नहीं होता क्यूंकि कुत्ते सदियों से इंसानों के साथ रहने के लिए ढले हैं लेकिन भेड़िये जंगली और आजाद मिजाज के होते हैं। वुल्फडॉग में कब भेड़िये का जंगलीपन हावी हो जाए यह कहना मुश्किल होता है।

ये आमतौर पर अनजान लोगों से बहुत डरते हैं या दूर भागते हैं। अगर इन्हें खतरा महसूस हो तो ये आक्रामक हो सकते हैं।

इनके लिए बहुत बड़े और मजबूत बाड़े की जरूरत होती है क्योंकि ये ऊंची से ऊंची दीवार कूद सकते हैं या जमीन खोदकर भाग सकते हैं।

कई देशों और भारत के भी कई राज्यों में वुल्फडॉग को घर पर पालना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

जर्मनी के कैप्टन मैक्स वन स्टीफनिट्ज़ ने बनाया था पहला जर्मन शेफर्ड कुत्ता

पहला जर्मन शेफर्ड कुत्ता बनाने का श्रेय कैप्टन मैक्स वन स्टीफनिट्ज़ नाम के एक पूर्व जर्मन घुड़सवार अधिकारी को जाता है जिन्होंने 1899 में इसे बनाया था।

उस समय जर्मनी में भेड़-बकरियों को चराने के लिए कई अलग-अलग तरह के कुत्ते इस्तेमाल होते थे । मैक्स एक ऐसा कुत्ता बनाना चाहते थे जो बहुत बुद्धिमान, समझदार और फुर्तीला हो।

अप्रैल 1899 में, मैक्स वन स्टीफनिट्ज़ एक डॉग शो में जाते हैं वहाँ पर उनकी नज़र ‘हेक्टर लिंकराइन’ नाम के कुत्ते पर पड़ती है। हेक्टर देखने में बिलकुल भेड़िये जैसा दिखता था वो बहुत समझदार और फुर्तीला लग रहा था इसलिए मैक्स ने उसे तुरंत खरीद लिया और उसका नाम बदलकर ‘होरांड वोन ग्राफराथ’ रख दिया। इस कुत्ते को आधिकारिक तौर पर दुनिया का पहला जर्मन शेफर्ड माना जाता है।

उसी साल मैक्स ने अपने दोस्त के साथ मिलकर ‘सोसाइटी फॉर जर्मन शेफर्ड डॉग्स’ (SV) की स्थापना की और होरांड को इस नस्ल के रजिस्टर में पहला नंबर दिया।

नस्ल को और बेहतर और मजबूत बनाने के लिए होरांड की ब्रीडिंग जर्मनी के अलग-अलग क्षेत्रों के बेहतरीन काम करने वाले कुत्तों के साथ कराई गई। धीरे-धीरे, चरवाहा कुत्ता होने के साथ-साथ अपनी समझदारी के कारण यह पुलिस, सेना और सुरक्षा के कामों में भी पूरी दुनिया में सबसे लोकप्रिय नस्ल बन गया।

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