डार्विन के ‘विकासवाद के सिद्धांत’ (Theory of Evolution) से पहले, दुनिया भर में इंसानों की उत्पत्ति को लेकर अलग अलग धारणाएं प्रचलित थीं। उस समय अधिकतर लोग धार्मिक ग्रंथों और कथाओं पर भरोसा करते हैं और उन सबकी एक सामान्य परिभाषा थी कि ईस्वर ने सब प्रजातियों को जोड़ों के रूप में भेजा है।
ईसाई और यहूदी धर्म में माना जाता था कि ईश्वर ने मात्र छह दिनों में पूरी सृष्टि की रचना की। पहले पुरुष ‘आदम’ को मिट्टी से बनाया और उनके शरीर की पसली से पहली महिला ‘हव्वा’ (Eve) को बनाया। सभी इंसान इन्हीं की संतान हैं।
इस्लाम में भी यही माना जाता है कि अल्लाह ने पहले इंसान और नबी ‘आदम’ को मिट्टी से बनाया और उनमें जान डाली।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा हैं। उन्होंने अपने अलग-अलग अंगों से मनुष्यों, ऋषियों और अन्य जीवों को उत्पन्न किया। मनु (पहले पुरुष) और शतरूपा (पहली महिला) से मानव जाति आगे बढ़ी।
दुनिया के सब धर्मो में लगभग इसी तरह की मान्यताएं प्रचलित थीं। डार्विन ने पहली बार सब तथ्यों के आधार पर इन सब मान्यताओं का खंडन किया।
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Toggleचार्ल्स डार्विन की विकासवाद के सिद्धांत’ (Theory of Evolution) की यात्रा
चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के श्रूस्बरी में एक अमीर और पढ़े-लिखे परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉक्टर थे और चाहते थे कि डार्विन भी डॉक्टर बनें। इसके लिए उन्हें एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी भेजा गया, लेकिन डार्विन सर्जरी और खून देखकर डर गए और मेडिकल की पढाई छोड़ दी।
इसके बाद उनके पिता ने उन्हें पादरी बनाने की कोशिश की परन्तु उनका मन धार्मिक किताबों से ज़्यादा प्रकृति विज्ञान में लगता था।
उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने 22 साल की उम्र में 5 साल के लिए एचएमएस बीगल की ऐतिहासिक यात्रा की। उन्हें HMS Beagle नाम के एक समुद्री जहाज़ पर दुनिया की सैर करने का मौका मिला। यह यात्रा 5 साल (1831 से 1836) तक चली। इस यात्रा के दौरान उन्होंने दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और कई द्वीपों का दौरा किया।
गैलापागोस नामक द्वीप की ऐतिहासिक यात्रा
गैलापागोस नामक द्वीप पर डार्बिन ने देखा कि एक ही प्रजाति की चिड़ियों के अंग अलग-अलग द्वीपों पर अलग तरह के हो गए थे । जैसे किसी द्वीप पर अगर चिड़ियों को पेड़ो में छेद करके कीड़े निकलने की अवस्य्क्ता थी तो वहां पर उनकी चोंच मोटी हो गई थी।
और अगर कोई ऐसी जगह है जहाँ पर चिड़िया को मिट्टी से कीड़े निकालने पड़ते थे वहाँ पर उसी प्रजाति की चिड़ियों की चोंच पतली हो गई थी ऐसा इसलिए था क्योंकि हर द्वीप पर भोजन के साधन अलग थे।
इस यात्रा से डार्विन ने हज़ारों पेड़-पौधों, जानवरों के नमूने और जीवाश्म इकट्ठे किए और अपनी डायरी में बारीकी से नोट्स लिखे।
डर्बिन ने देखा क़ि पौधे और जीव जैसे मधुमखियाँ, तितलियां, मक्खियां और भृंग जैसे जीव, पौधों के आपस में सम्भोग के लिए जरुरी होते हैं उन्होंने इसे पॉलिनेशन नाम दिया।
पौधे इन जीवो के लिए ही सजते हैं सूंदर फूल तयैर करते हैं और अपने फूलों के अंदर रस डालते हैं ताकि ये कीट उनकी तरफ आकर्षित हों। जब कोई मधुमक्खी ‘मेल पोलन’ (पुरुष हिस्से) को उड़ाकर महिला हिस्से के ऊपरी चिपचिपे भाग पर छोड़ती है तो पोलन के अंदर से एक बेहद पतली नली निकलती है। यह नली बीच की पाइप से होते हुए नीचे ओवरी तक पहुँचती है।
वहाँ जाकर यह ‘मेल पोलन’ अंदर मौजूद ‘फीमेल अंडे’ से मिल जाता है। इसी मेल को पॉलिनेशन और फर्टिलाइजेशन कहते हैं। इस मिलन के बाद:
- फूल की ओवरी बढ़कर फल बन जाती है।
- अंदर मौजूद अंडे बढ़कर बीज बन जाते हैं।
अजीब ऑर्किड के फूल ने लगाई विकासबाद की थ्योरी पर मोहर
सन् 1862 में, डार्विन को मेडागास्कर के जंगलों से एक बहुत ही अजीब ऑर्किड का फूल भेजा गया। इस फूल के पीछे एक बहुत लंबी, हरी नली लटकी हुई थी, जिसकी लंबाई लगभग 11 से 12 इंच थी। इस लंबी नली के बिल्कुल आखिरी छोर पर मीठा रस मौजूद था।
डार्विन ने जब इस फूल को देखा, तो उन्होंने कहा कि अगर इस फूल का रस इतनी गहराई में है, तो इस धरती पर कोई ऐसा जीव या पतंगा ज़रूर मौजूद होगा, जिसकी जीभ 11-12 इंच लंबी होगी जिसके लिए इस पौधे ने रस तयैर किया है। बिना ऐसे जीव के, यह फूल अपनी नस्ल आगे बढ़ा ही नहीं सकता।
उस समय के बाकी वैज्ञानिकों और लोगों ने डार्विन की इस बात का खूब मज़ाक उड़ाया। डार्विन की इस भविष्यवाणी को पागलपन समझा गया। डार्विन अपनी बात पर अड़े रहे लेकिन अपनी ज़िंदगी में वे उस जीव को कभी देख नहीं पाए और 1882 में उनकी मृत्यु हो गई।
डार्विन की मौत के 21 साल बाद और उनकी भविष्यवाणी के करीब 41 साल बाद, सन् 1903 में वैज्ञानिकों ने मेडागास्कर के जंगलों में सचमुच एक ऐसा पतंगा खोज निकाला, जिसकी जीभ अविश्वसनीय रूप से 11 से 12 इंच लंबी थी !
जब वह अपनी जीभ को समेटता था तो वह उसकी छाती के नीचे गोल लिपट जाती थी और जब वह फूल का रस पीने जाता तो उसकी जीभ पूरी खुलकर फूल के बिल्कुल अंत तक पहुँच जाती थी।
वैज्ञानिकों ने उसे प्रिडिक्टा नाम दिया जिसका मतलब है जिसकी भविष्यवाणी पहले ही की जा चुकी थी।
इस घटना को सह-विकास का नाम दिया गया।
इस घटना को विज्ञान की भाषा में सह-विकास (Co-evolution) कहा जाता है। इसका मतलब है कि दो अलग-अलग जीव (एक पौधा और एक कीड़ा) ज़िंदा रहने के लिए एक-दूसरे पर इस कदर निर्भर थे कि वे करोड़ों सालों में एक साथ विकसित हुए।
फूल की नली लंबी होती गई ताकि हर कोई उसका रस न चुरा सके और पतंगे की जीभ लंबी होती गई ताकि वह उस रस तक पहुँच सके।
विकासवाद का सिद्धांत (Theory of Evolution)
इंग्लैंड लौटने के बाद, डार्विन ने सालों तक अपने इकट्ठा किए गए नमूनों पर रिसर्च की। 1859 में उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध किताब लिखी, जिसका नाम था: “On the Origin of Species” (जीवों की उत्पत्ति)।
इस किताब में उन्होंने दो मुख्य सिद्धांत दिए
1 प्राकृतिक चयन
डार्विन ने समझाया कि प्रकृति खुद तय करती है कि किस जीव को जीवित रहना चाहिए। जो जीव अपने पर्यावरण के हिसाब से खुद को ढाल लेता है वही जिंदा बचता है और अपनी नस्ल आगे बढ़ाता है। जो खुद को नहीं बदल पाते, वे धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। इसे “Survival of the Fittest” (जो सबसे योग्य है, वही बचेगा) भी कहा जाता है
2. समान पूर्वज
उन्होंने बताया कि दुनिया के सभी जीव अलग-अलग पैदा नहीं हुए हैं बल्कि हम सबके पूर्वज एक ही थे। समय और माहौल के साथ-साथ एक ही प्रजाति से अलग-अलग जीव बनते चले गए।
उदाहरण के लिए, उन्होंने बताया कि इंसानों और बंदरों/चिंपैंजी के पूर्वज एक ही थे और सारे पेड़ पौधे पहले शैवाल के रूप में थे और अपनी पर्यावरण की ज़रूरतों के हिसाब से हजारों सालो में अपने आपको अलग अलग तरह से बना लिया।
विवाद और आलोचना
जब डार्विन ने यह सिद्धांत दिया, तो पूरी दुनिया में तहलका मच गया
उस समय समाज में यह मान्यता थी कि भगवान ने सभी जीवों और इंसानों को जैसा आज वे दिखते हैं वैसा ही एक बार में बनाया है। डार्विन के सिद्धांत ने इस बात को चुनौती दी इसलिए चर्च और धार्मिक लोगों ने उनका भारी विरोध किया।
अखबारों और कार्टूनों में डार्विन का चेहरा बंदर के शरीर पर लगाकर उनका मज़ाक उड़ाया गया।
लॉर्ड केल्विन की वजह से अंतिम समय में परेसान रहे थे डार्बिन
लॉर्ड केल्विन जो उस समय के महानतम भौतिक विज्ञानी थे उन्होंने अपने बताया कि पृथ्वी की उम्र 2 से 10 करोड़ साल के बीच है। अब ये डार्बिन की परेशानी का कारण बन गया।
डार्विन की थ्योरी का सबसे बुनियादी नियम यह था कि एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति बनने में (जैसे बंदर या पूर्वजों से इंसान बनने में) करोड़ों-अरबों साल का बहुत लंबा वक्त लगता है। डार्विन का मानना था कि पृथ्वी बेहद पुरानी है तभी इतने धीरे-धीरे विकास (Evolution) मुमकिन हुआ।
19 अप्रैल 1882 को 73 वर्ष की आयु में इंग्लैंड के डाऊन हाउस में डार्बिन का निधन हो गया।
रेडियोएक्टिविटी( रेडियोधर्मिता ) की खोज और फोटोसिंथेसेस (प्रकाश संस्लेषण) ने उनकी थ्योरी’ को सही साबित किया।
रेडियोएक्टिव डेटिंग के आधार पर ये साबित हुआ कि पृथ्वी की उम्र 450 करोड़ साल से ज्यादा है। डीएनए तकनीक से पता चला कि चिम्पाजी के 98% डीएनए, इंसान के डीएनए से मैच होते हैं ।
प्रकाश संश्लेषण का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पता चला कि रेगिस्तान के इलाको में पौधों ने अपना प्रकाश संस्लेषण का तरीका ही बदल लिया है वो वहाँ पर नाईट शिफ्ट कर रहे हैं।
चार्ल्स डार्बिन की थ्योरी कुछ कुछ ये कहती है कि अगर किसी भालू को ऐसी परिस्थियाँ मिलें कि उसे पानी में ही रहना पड़े और वहीँ पर भोजन ढूढ़ना पड़े तो हजारों सालों के बिकासबाद के प्रोसेस में वो मछली बन जायेगा।
वैज्ञानिको का मानना
वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से लगभग 60 से 70 लाख साल पहले पृथ्वी पर एक ऐसा जीव रहता था जो इंसानों और चिंपांज़ी दोनों का साझा पूर्वज था। वक्त के साथ उसकी एक नस्ल से चिंपांज़ी बन गए और दूसरी नस्ल धीरे-धीरे विकसित होकर आज का आधुनिक इंसान (Homo sapiens) बन गई।
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