आजकल चीन से यूरोप में व्यापार करना हो तो चीन ने रेल मार्ग बिकसित कर लिया है जो कि चीन के भीतरी शहरों से कजाकिस्तान और रूस होते हुए बेलारूस और पोलैंड के रास्ते यूरोप (जर्मनी के डुइसबर्ग) तक जाता है।
अभी फ़िलहाल रूस – यूक्रेन युद्ध करके इसका उपयोग कम हो गया था परन्तु पहले ये बहुत प्रचलन में था। इसके अलावा समुद्री मार्ग और हवाई मार्ग से आसानी से एशिया और यूरोप के बीच व्यापार होता है।
इसके अलावा भारत से यूरोप में व्यापार करना हो तो भी ये समुद्री मार्ग और जल मार्ग के रास्ते आसानी से हो जाता है। परन्तु लगभग 3000 साल पहले जब न तो हवाई जहाज होते थे और न ही आज कि तरह उन्नत तकनीक, उस समय लोग हजारों किलोमीटर तक व्यापार किस रास्ते से करते होंगे।

तो आज हम बात कर रहे हैं सिल्क रुट या रेशमी मार्ग की जो रास्तों की एक बड़ी श्रृंखला थी जो पूर्व को पश्चिम से जोड़ती थी। इस रास्ते से न केवल चीज़ों का व्यापार हुआ बल्कि विचारों का भी लेन देन हुआ।
भारत में जन्मा बौद्ध धर्म और अरब में जन्मा इस्लाम इसी रास्ते से होते हुए चीन के साथ साथ दुनिया के अन्य देशों में पहुंचा। इसी प्रकार कई यात्री जैसे फ़ा हियान, ह्वेन त्सांग, मार्को पोलो, इब्न बतूता और झांग कियान इसी रास्ते से होते हुए इतना दुनिया के अन्य देशों की यात्रा कर सके।
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Toggleरेशम मार्ग (सिल्क रोड) का नाम रेशमी मार्ग क्यों पड़ा
रेशमी मार्ग कई देशों से होकर गुजरता था इसलिए इस नाम को अलग अलग देशो में अलग अलग नामो से जाना जाता था बल्कि 1877 ईस्वी से पहले तो रेशम मार्ग का कहीं जिक्र ही नहीं था।
1877 ईस्वी में एक जर्मन जिओग्राफर जिनका नाम फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफेन था वो 1868 से 1872 के बीच चीन की यात्राएं करते हैं और अपनी यात्राओं के आधार पर वो जर्मन भाषा में एक किताब China: Ergebnisse eigener Reisen und darauf gegründeter Studien लिखते हैं। उन्होंने जर्मन भाषा में इस रोड को साइडेनस्ट्रासे कहा था जिसका मतलब होता है रेशम मार्ग
हालाँकि ये प्रकाशन 5 खंडो और एक एटलस में प्रकाशित हुआ था जिसका पहला खंड 1877 में छपा था। इस किताब में पहली बार रेशमी मार्ग का जिक्र हुआ और इस प्रकार सिल्क रोड (या रेशमी मार्ग ) नाम 1877 में पहली बार अस्तित्व में आया।

अगर फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफेन भारत की यात्रा करते और उन यात्राओं पर किताब लिखते तो इस रास्ते का नाम कुछ और होता। क्यूंकि भारत में ये व्यापारिक मार्ग उत्तरापथ के नाम से जाना जाता था जिसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने बनबाया था।
नोट :- एटलस मानचित्रों वाली एक पुस्तक होती है। इसमें विश्व के भौगोलिक, सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक मानचित्र शामिल होते हैं।
फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफेन ने इस मार्ग को रेशमी मार्ग क्यों कहा
एक तो फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफेन ने अपनी यात्राओं के दौरान जो किताब लिखी थी उसमे इस मार्ग का बार बार जिक्र हुआ था इसलिए उन्हें इस मार्ग को एक नाम देना जरुरी था।
दूसरा उस समय चीन का रेशम पश्चिम की दुनिया की बेशकीमती चीज़ों में सुमार था। केवल अमीर लोग ही इसको पहनना अफ़्फोर्ड कर पाते थे। इस प्रकार पश्चिम के लोग इस मार्ग को चीन से आने वाले रेशम के कपड़े के रूप में ही देखते थे।
वैसे तो इस मार्ग से बहुत सारी चीज़ों का लेन देन हुआ परन्तु रेशम की उस समय पश्चिम में इतनी मांग थी कि फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफेन ने इसको रेशमी मार्ग नाम दे दिया।
आज इस पुराने मार्ग को हर कोई रेशमी मार्ग कह रहा है बिना ये जाने कि जब ये मार्ग उपयोग में था तो कोई इसे रेशमी मार्ग कहता ही नहीं था बल्कि जिन जिन देशो से ये मार्ग गुजरता था उन्होंने अपनी अपनी भाषा में इसके नाम रखे हुए थे।
रेशमी मार्ग किन किन स्थानों से होकर गुजरता था ?
रेशमी मार्ग कोई एक सीधा रास्ता नहीं था बल्कि यह जमीन और समुद्र मार्गों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क था जो पूर्वी देशों को, पश्चिम देशों से जोड़ता था। यह मार्ग कई देशों और महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों से होकर गुजरता था।
मोटे तौर पर सिल्क रोड पश्चिम में कांस्टेंटिनोपल (यानी आज का इस्तांबुल) और मिस्र के काहिरा से शुरू होते हुए बग़दाद के रास्ते समरकंद पहुँचता था।
जहाँ से एक रूट ताशकंद होते हुए चीन के उरुमची और आगे शंघाई तक जाता, तो दूसरा रूट चीन के काशगर से होते हुए काराकोरम शृंखला को पार कर भारत और तिब्बत को इससे जोड़ता था।
नोट :- 2001 में तालिबान शासन ने बामियान घाटी में चट्टान को काटकर बनाई गई दो विशाल बुद्ध मूर्तियों (जो 6ठी शताब्दी की थीं) को तोप के गोलों और बारूद से पूरी तरह से नष्ट कर दिया था।
बामियान और मेस ऐनक, अफगानिस्तान के प्राचीन बौद्ध स्थल थे जो कि सिल्क रूट की मुख्य शाखाओं पर ही स्थित थे। वे मध्य एशिया से भारत आने वाले और भारत से चीन जाने वाले मार्गों पर महत्वपूर्ण स्टॉप-ओवर थे।

इसके अलावा सिल्क रोड समुद्र में भी ऑपरेट होता था। दक्षिण चीन सागर, मक्का स्ट्रीट, हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी, अरब सागर, फारस की खाड़ी और लाल सागर में सिल्क रूट से व्यापार हुआ करता था, जिसके माध्यम से इसकी पहुँच पुर्तगाल से लेकर पूर्व में जापान और कोरिया तक थी।
सिल्क रोड गोबी के रेगिस्तान और पामीर के पहाड़ सहित दुनिया के कुछ सबसे कठिन इलाकों से गुज़रता था। इसके रखरखाव की कोई व्यवस्था न होने के कारण सड़कें अक्सर खराब होती थीं और इन इलाकों में लुटेरे व्यापारियों को लूट लेते थे।
इससे बचने के लिए व्यापारी लम्बे कारवाँ में शामिल हो जाते थे। वैसे ऐसे बहुत कम लोग थे जिन्होंने इस पूरे रास्ते की यात्रा की हो। अधिकतर मार्ग में पड़ने वाले बिचौलियों से ही सामान लेकर अपने-अपने स्थान पर लौट जाते थे, जिसकी वजह से उनको सामान बहुत महँगा पड़ता था।
नोट :- गोबी रेगिस्तान को गोबी रेगिस्तान इसलिए कहा जाता था क्योंकि ‘गोबी’ शब्द मंगोलियाई भाषा में विशाल, शुष्क और पथरीले रेगिस्तानी क्षेत्र के लिए प्रयोग किया जाता है। यह रेगिस्तान मुख्य रूप से मंगोलिया और उत्तरी चीन में फैला हुआ है। मंगोलियाई लोग इस क्षेत्र के मूल निवासी और पड़ोसी हैं, इसलिए उन्होंने अपनी भाषा के शब्द का उपयोग करके इसे नाम दिया।
मध्य एशिया में इसके रास्ते में जो शहर आते थे वो थे – किर्गिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाखस्तानसमरकंद, बुखारा, मर्व, खोतान, फरगाना, अल्माटी।
दक्षिण एशिया में इसके रास्ते मे जो शहर आते थे वो थे – भारत , पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तक्षशिला (पाकिस्तान), पेशावर (पाकिस्तान), काबुल, बाल्ख (अफगानिस्तान), पटना, वाराणसी।
इसके अलावा जहाँ से ये मार्ग गुजरता था वो जगह थीं – ईरान , इराक हैमडन, बसरा, बगदाद।
नोट :- 1648 से पहले दुनिया में साम्राज्य ,रियासतें और शहर-राज्य हुआ करते थे, जहाँ लोगों की पहचान उनके शासक या धर्म से जुड़ी होती थी, न कि एक किसी विशेष देश से। आज अपने अपने देश को लेकर लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं लेकिन 1648 से पहले एक राष्ट्र की केवल कल्पना ही की जाती थी कोई राष्ट्र था नहीं। भारत में वल्लभभाई भाई पटेल जी ने 565 रियासतों को इक्कठा किया था तो अमेरिका में अब्रह्मम लिंकन ने यही काम किया था।
रेशम मार्ग से किन चीज़ों का आदान-प्रदान हुआ?
रेशम मार्ग का सबसे प्रसिद्ध उत्पाद रेशम था, जिसका उत्पादन 3000 ईसा पूर्व में चीन में शुरू हुआ था। लेकिन इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण वस्तुओं का लेन-देन हुआ।
घोड़े: मध्य एशिया के मैदानी इलाकों में पाले गए घोड़ों की भारत में अत्यधिक माँग थी।
कागज : चीन में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में आविष्कार हुआ कागज, बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ पहले पूरे एशिया में और फिर इस मार्ग से यूरोप तक पहुँचा।
मसाले : यूरोप में मसालों की भारी माँग थी, जिसका उपयोग भोजन और दवा के रूप में होता था।
अन्य सामान : रोमन कांच के बर्तन, चीन का बारूद (600 ईस्वी के आसपास), सोना, चाँदी और कीमती पत्थर।
रेशम मार्ग और बौद्ध धर्म का प्रसार
मध्य यूरेशिया (यानी यूरोप और एशिया का जुड़ा हुआ भाग) प्राचीन काल से ही अपनी घुड़सवारी के लिए जाना जाता है। यूरेशिया के इस इलाके में सिल्क रूट शुरू होने के बहुत पहले से कई रास्ते मौजूद थे।
सिल्क रोड के माध्यम से चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार पहली शताब्दी ईस्वी में शुरू हुआ। इस समय बौद्ध धर्म पूरे पूर्व और मध्य एशिया में फैलने लगा।
महायान, थेरवाद और तिब्बती बौद्ध धर्म, बौद्ध धर्म के तीन प्राथमिक रूप हैं जो सिल्क रोड के माध्यम से पूरे एशिया में फैले हुए थे।
जब मौर्य साम्राज्य के एक शासक सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया, तो उन्होंने इस धर्म को अपने साम्राज्य में आधिकारिक दर्जा दे दिया, तो रेशम मार्ग पर इस धर्म को लेकर लोगों का ज्ञान और भी बढ़ गया।
चौथी शताब्दी ईस्वी के बाद से चीनी, कोरियाई और जापानी यात्रियों ने मूल बौद्ध धर्म ग्रंथों की अच्छी से जानकारी लेने के लिए भारत की यात्राएँ कीं। ये यात्राएँ इसी सिल्क रूट के ज़रिये हुईं।
ये यात्री थे
- फाह्यान – 399 ईस्वी से 412 ईस्वी
- ह्वेनसांग – 629 ईस्वी से 645 ईस्वी
- इत्सिंग – 671 ईस्वी से 695 ईस्वी
- हाईचो – लगभग 723-727 ईस्वी
- सुन्डो – 372 ईस्वी
- ज़ेनजो – 14वीं शताब्दी के जापानी भिक्षु थे
सिल्क रोड के किनारे बौद्ध मठों का निर्माण हुआ जहाँ व्यापारियों को एक शहर से दूसरे शहर जाते हुए बौद्ध मठों में रहते हुए जगह दी जाती थी। इसका परिणाम ये हुआ कि यात्रियों ने यात्राओं के दौरान बौद्ध धर्म का प्रसार शुरू कर दिया।
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा बनाया गया उत्तरापथ जिसे आज ग्रैंड ट्रंक रोड कहा जाता है, बंगाल को तक्षशिला से जोड़ती थी। इस प्रकार सिल्क रोड का भारत के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
भारत में रेशमी मार्ग मुख्य रूप से 7 राज्यों से होकर गुज़रता था जो हैं
- बिहार
- जम्मू और कश्मीर
- महाराष्ट्र
- पुदुचेरी
- पंजाब
- तमिलनाडु
- उत्तर प्रदेश
- उत्तराखंड
इनमें मुख्य रूप से 12 स्थल प्रमुख थे
- पुरुषपुर पेशावर (अब पाकिस्तान)
- तक्षशिला रावलपिंडी के पास (अब पाकिस्तान)
- श्रीनगर/गिलगित -बाल्टिस्तान
- लेह लद्दाख
- मथुरा उत्तर प्रदेश
- बनारस उत्तर प्रदेश
- ताम्रलिप्ती पश्चिम बंगाल
- नालंदा बिहार
- पाटलिपुत्र बिहार
- भरुकच्छ गुजरात
- जैसलमेर राजस्थान
- नाथू ला दर्रा सिक्किम
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