प्राचीन काल से ही व्रत और उपवास मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग रहे हैं आजकल भूखे रहने को व्रत का पर्यायवाची मान लिया जाता है और व्रत को ईस्वर को पाने का एक साधन समझा जाता है परन्तु क्या सच में भूखे रहने से ईस्वर को पाया जा सकता है। शुरुआत करते हैं भगवान बुद्ध के जीवन की एक सच्ची घटना के साथ।

बौद्ध ग्रन्थ ललितविस्तर सूत्र और बुद्धचरित बताते हैं कि गौतम बुद्ध जब उरुवेला के जंगल में परम ज्ञान की खोज कर रहे थे तब उन्होंने भोजन का त्याग कर दिया था कई बार तो उन्होंने कई कई महीनो तक, पुरे दिन में केवल चावल का एक दाना मात्र ग्रहण किया था ।

जिसकी वजह से उनकी हालत बहुत खराब हो गई थी। उन्हें लग रहा था कि उनकी मृत्यु निकट है। जब उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हुई तो सबसे पहले उन्होंने सुजाता नाम की एक महिला के हाथों से खीर खाई थी।

इस घटना के बाद बुद्ध को मध्यम मार्ग का ज्ञान हुआ था । इस घटना को बुद्ध के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है गौतम बुद्ध ने ये माना था कि शरीर को कष्ट देकर ईस्वर को नही पाया जा सकता। तो फिर लोग व्रत क्यों करते हैं और क्या व्रत का मतलब केवल भूखे रहना होता है।

व्रत और उपवास में क्या अंतर होता है

व्रत अर्थात् दृढ़ता, निश्चय, संकल्प। ब्रत का मतलब है निर्धारित संकल्प के अनुसार आचरण करने का अनुष्ठान जैसे राष्ट्र सेवा का ब्रत लेना जबकि उपवास शब्द उप और वास के योग से बना है जिसमे उप का मतलब होता है ऊँचा, ऊपर, आत्मा और वास का मतलब रहना,टिकना या वास करना।

इस प्रकार उपवास का मौलिक अर्थ है भौतिक वृत्तियों से हटकर, आत्मा के सनिकट वास करना। क्यूंकि भोजन त्याग आदि से मनुष्य को दैनिक झंझटों से फुर्सत मिल जाती है।

और वो आत्म चिंतन में सरलतापूर्ण लीन हो पाता है इसलिए इसका सामान्य अर्थ निराहार रहना मान लिया गया है। सच तो यह है उपवास में भोजन छोड़ना नहीं पड़ता, छूट जाता है। उपवास एक ऐसी अवस्था का नाम है, जब भक्त भगवान में इतना लीन हो जाता है कि उसे खाने-पीने की सुध नहीं रहती।

अक्सर उपवास का व्रत लिया जाता है इसलिए उपवास और व्रत को आम भाषा में एक ही मान लिया जाता है। अब रही ब्रत की कोटियों की बात तो व्रत को दो कोटियों में विभाजित किया जा सकता है

व्रत कितने प्रकार के होते हैं

व्रत मुख्य तौर पर दो प्रकार के होते हैं

  • काम्य
  • नित्य

काम्य :- ये व्रत किसी विशेष इच्छा या कामना को पूरी करने के लिए किये जाते हैं जैसे संतान प्राप्ति, धन लाभ, पद लाभ आदि अभीष्ट फलों के लिए जो व्रत किये जाते हैं उन्हें काम्य व्रत कहा जाता है। काम्य व्रत आसक्ति से प्रेरित होते हैं। आसक्ति का मतलब होता है किसी वस्तु या व्यक्ति से अत्यधिक लगाव होना।

नित्य :- ये व्रत किसी अभिलाषा की पूर्ति के हेतु नहीं किये जाते बल्कि आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा से भक्ति एवं प्रेम के लिए किये जाते हैं। ये व्रत अनासक्ति के भाव से प्रेरित होते हैं। शास्त्रों में नित्य व्रत का पालन ही निष्काम कर्मयोग बताया गया है। निष्काम का अर्थ होता है बिना किसी कामना से किया गया कार्य। इस प्रकार नित्य व्रत का स्थान सबसे ऊपर है।

आयुर्वेद के अनुसार उपवास का महत्व

आयुर्वेद के अनुसार उपवास रखने से भोजन में अरुचि, अजीर्ण, उदरशूल, वातव्याधि एवं मंदाग्नि जैसे घातक रोगों से बचा जा सकता है। इसलिए कितने लोग तो ऐसे हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से नियमपूर्वक उपवास करते हैं, ताकि वह तंदुरुस्त रहें।

बढ़ती जनसख्याँ भी एक कारण

पहले समय में उपवास इसलिए भी रखे जाते थे ताकि अन्न की बचत हो सके तथा हर भूखे को भी भोजन मिल सके। हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी नियमित रूप से व्रत रखते थे क्यूंकि देश में हरित क्रांति अभी आई नहीं थी और देश में गरीबी और भुखमरी ने अपने पाँव पसार रखे थे

तब न केवल खाने वाले अधिक थे बल्कि खेतों में अनाज भी कम था। ऐसे में व्रत-उपवास को ही एकमात्र उपाय समझा गया। साल 1965 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध के समय तो लाल बहादुर शास्त्री जी ने लोगों से हफ्ते में एक दिन का व्रत करने की अपील की थी।

लोगों ने प्रण किया कि हफ्ते में कम-से-कम एक दिन निराहार रहा जाए, ताकि जिन लोगों को भोजन नहीं मिलता, उन्हें भी मिले।

क्या बर्तमान समय में उपवास में खाने का त्याग कर दिया जाता है

क्या बर्तमान समय में उपवास के दौरान खाने का त्याग किया जाता है ? शायद नहीं। सच तो यह है व्रत के दिनों में बाकि दिनों से अधिक पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन किया जाता है । आम दिनों में भले ही फल-सलाद खाएँ जाएं या न खाएँ जाएं , बादाम-काजू खाएँ जाएं या न खाएँ जाएं , जूस-नारियल पानी आदि न पिए, परंतु व्रत में जरूर खाते-पीते हैं

आम दिनों में दिन में तीन बार भोजन किया जाता है परन्तु व्रत में दिन भर केवल खाया ही जाता है । व्रत की नमकीन, व्रत के लड्डू, व्रत के चिप्स, व्रत की मिठाई, व्रत के चावल, व्रत का आटा, व्रत का नमक, व्रत के आलू आदि व्रत के नाम पर सब कुछ मिलता है। बाकायदा दुकानें सजती हैं।

सच तो यह है, न केवल दुकानें सजती हैं, घर में भोग एवं प्रसाद के नाम पर विशेष व्यंजन बनते हैं, जो कहने को भले ही सादा, बिना लहसुन-प्याज का खाना होता है, परंतु पूरी तरह घी-तेल में डूबा होता है। चाशनी में डूबे, मेवों से लैस पकवान, मिठाई व खीर-हलवे से व्रत खोला जाता है।

व्रतों से जुड़ी हुई है कई पौराणिक और चमत्कारिक कथाएं

हमने कई व्रतों में पौराणिक और लौकिक कथाएं पढ़ी या सुनी होंगी जो उन व्रतों के महत्व को बताती हैं परन्तु उनमे से बहुत सी कथाएं बड़ी अटपटी सी और असंभव सी लगती हैं।

जिनको पढ़ते और सुनते हुए कई बार ये विचार आता है कि ये कथाएं केवल व्रत की उपयोगिता के लिए लिखी गई हैं लेकिन इनकी मौलिकता और प्रमाणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती।

परन्तु इस तरह की कथाओं को पढ़ते या सुनते समय ये ध्यान रखना चाहिए कि ये कथाएं उस समय रची गई थीं जब न तो प्रिंटिंग प्रेस थे न रेडियो और न टेलीविज़न। इसके साथ अधिकतर लोग अनपढ़ थे ऐसे में उन्हें दर्शन और नीतियों की बारीकियाँ समझाने के न तो साधन थे न ही साधक।

इसलिए लोगों के मन में अलग अलग नीतिपरक सिद्धांतों की स्थापना को ध्यान में रखते हुए ऐसी चमत्कारिक कथाओं की रचना की गई जिन पर जनमानस सहज ही भरोसा कर सकें।

इस प्रकार इन कथाओं की सार्थकता यही है कि बिना किसी प्रचार साधन के आज तक ये कथाएं जन – साधारण द्वारा याद रखी जा रही हैं और लोगो की श्रद्धा और आस्था को मजबूती प्रदान कर रही हैं।

विद्वानों ने अपनी योजनाओं में इस कदर कामयाबी हासिल की है कि आज भी किसी भी व्रत में कथा का बड़ा महत्व माना जाता है ऐसा लगता है कि बिना कथा सुने ब्रत पूर्ण नहीं होता।

कथा के साथ ब्रत में धर्म के दस अंगो का पालन भी शामिल है

मनु के अनुसार धर्म के 10 अंग हैं

  • ब्रह्मचर्य
  • सत्य
  • तप
  • दान
  • संयम
  • क्षमा
  • शौच
  • अहिंसा
  • शांति
  • और अस्तेय

नवरात्री के व्रतों की वैज्ञानिकता

वैसे तो नवरात्री साल में 4 बार मनाई जाती है। जो भारत की 4 ऋतुओं के बदलने का प्रतीक मानी जाती है

  • शारदीय नवरात्री (सितम्बर- अक्टूबर)
  • चैत्र नवरात्री ( मार्च – अप्रैल)
  • आषाढ़ महीने की गुप्त नवरात्री (जून और जुलाई)
  • पौष महीने की गुप्त नवरात्री ( दिसंबर और जनवरी)

नोट :- गुप्त नवरात्री में माँ दुर्गा की गुप्त साधना की जाती है। गुप्त नवरात्री में माँ दुर्गा की पूजा साधु संत और सन्यासी करते हैं। जबकि गृहस्थ लोग चैत्र और शारदीय नवरात्री मानते हैं।

गृहस्त लोग वर्ष में दो बार नवरात्री मनाते हैं —शारदीय और चैत्र। इन दोनों ही नवरात्रों का काफी महत्त्व है। दोनों नवरात्र संपातों में पड़ते हैं। ‘संपात’ का अर्थ है—स्थूल रूप से दिन-रात का बराबर होना या पृथ्वी का सूर्य से सम दूरी पर होना।

बर्ष में 2 बार दिन और रात बराबर होते हैं और उसी समय बर्ष में 2 बार नवरात्रि मनाई जाती है। इस समय 9 दिन तक दुर्गा माँ की पूजा की जाती है और व्रत रखे जाते हैं

शिवरात्रि के व्रत का समय

शिवरात्रि फाल्गुन माह की चर्तुदशी के दिन आती है, यानी वर्ष का अंतिम मास फाल्गुन एवं अंतिम अँधेरी रात्रि चतुर्दशी। शिव संपूर्ण जगत् के काल स्वरूप हैं अर्थात् मृत्यु के देवता हैं। उनके द्वारा प्रलय होने पर ही संपूर्ण सृष्टि पुनः स्थापित होती है। इसी कारण उनका पर्व भी वर्ष के अंतिम मास व अंधकार की अंतिम रात को मनाया जाता है।

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