सन 1995 में जनवरी में सयुंक्त राष्ट्र महासभा में ये प्रस्ताव पारित हुआ कि प्रतिवर्ष 16 सितम्बर को “ओज़ोन” परत के सरंक्षण के लिए “अन्तर्राष्ट्रीय दिवस” के रूप में मनाया जायेगा क्यूंकि इसी दिन 16 सितम्बर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर हुए थे।
जिसके अनुसार ऐसे पदार्थ जो ओजोन परत को नुक्सान पहुंचाते हैं उन पदार्थों को पूरी तरह से समाप्त करने की समय सारणी तयैर की गई थी। इस प्रकार आज पर्यावरण की सुरक्षा की महत्ता से हम सब भली भांति परिचित हैं। वन और बृक्षों की रक्षा के लिए अलग अलग प्रचार और प्रसार के साधनो का उपयोग भी किया जाने लगा है।

लेकिन पुराने समय में इसी उदेस्य से पीपल, बट, केला, आंबला आदि बृक्षों में भगवान के निवास की बात कही गई थी। इतना ही नहीं एक बृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर बताकर बृक्षारोपण और उनके पालन पोषण की प्रेरणा दी गई थी।
सिर्फ पेड़ पौधे ही नहीं, पर्वत, नदियों यहाँ तक की सर्पों, जानवरों और अन्य वन्य जीव- जंतुओं को भी ईस्वर से जोड़कर बताया गया था जिससे जनसाधारण सहज ही इनकी सुरक्षा कर सके क्यूंकि सोशल मीडिया के बिना सामान्य जनमानस को इनकी उपयोगिता के बारे में बताना असम्भव था।
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इस पृथ्वी ग्रह पर जीवन का विकास मात्सय (मछली) से आरंभ होकर उभयचरी (जो जमीन और पानी दोनों में रहते हैं) और स्तनधारी जीवों और फिर मनुष्य अवतारों तक, एक विकास के क्रम में हुआ है
हिन्दू दर्शन स्पष्ट रूप से मानता है कि मनुष्य शुरू से मनुष्य के रूप में नहीं जन्मा है , बल्कि वह स्वयं इस जीवन प्रकारों से होकर विकसित हुआ है
लगभग सभी हिन्दू धर्म-ग्रंथ इस धारणा को अत्यधिक महत्व देते है कि ईश्वर की रचना को क्षति नहीं पहुंचाने और उसके जीवों को नहीं मारने से हमें उसकी कृपा प्राप्त होती है। ऋग्वेद के काल में (लगभग 1500 ई.पू.) अनेक वृक्षों और पौधों की पूजा की जाती थी क्योकि वे ईश्वर के विभिन्न गुणों का प्रतीक थे।
पर्यावरण को पूर्व-वैदिक काल में भी महत्वपूर्ण माना गया था। मोहनजोदड़ों और सिंधु घाटी सभ्यताओं में भी ‘वृक्ष पूजा‘ के संदर्भ मिलते है। वैदिक काल में वनों की रानी ‘आरण्यनी’ की पूजा वनों की देवी के रूप में होती है।
जंतुओं और प्रकृति के प्रति भगवानों के साथ ही श्रद्धा की जाती थी। पीपल, गंगा, हिमवन, तुलसी, बरगद के वृक्षों को आज भी पवित्र माना जाता है।
सर्पों और नंदी (बैल) की आज भी पूजा का जाती है। गरुड़, चूहा, शेर, मोर और चीते जैसे जीवो को ईश्वर का वाहन बताया गया है। वैसाखी, लोहड़ी और बसंत पंचमी जैसे प्राकृतिक उत्सव, त्यौहार के रूप में मनाये जाते हैं।

वैदिक मनुष्य ने चार प्रमुख तत्वों -सूर्य, अग्नि, पृथ्वी और आकाश की पहचान की थी जो जीवन को चलाते है और इसलिए उनकी देवी-देवताओं के रूप में पूजा की जाती थी। (हे वृक्षों के राजा, आपकी जड़े ब्रह्मा, मध्यभाग विष्णु और अग्र भाग शिव का स्वरुप है। अतः सभी देवताओं के वास वाले देव हम आपको प्रणाम करते हैं)। – आपको देखने से रोग दूर हो जाते है। (ऋग्वेद 1-48-5)
आयुर्वेदिक औषधि पर लिखे प्राचीन ग्रन्थ चरक संहिता में दिव्य जड़ी बूटियों का वर्णन है, जिसमे व्यक्तिगत् स्वास्थ्य और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के हित के लिए पर्यावरणीय संतुलन के संरक्षण के विषय में पूरी जानकारी दी गई है।
वृक्ष लगाने को पुराणों में अत्यधिक पुण्य का कार्य माना जाता है। अग्नि पुराण और वाराह पुराण में वृक्षों से होने वाले हितों का उल्लेख है।
दुर्गा सप्तसदी में कहा गया है कि जब तक पृथ्वी वृक्षों और वनों से भरे पर्वतों से आच्छादित रहेगी, वह मानव जाति का पालन पोषण और देखभाल करती रहेगी।
पर्यावरण और प्रकृति के साथ ईसाई धर्म
बाइबल में लिखा गया है कि ईस्वर ने आदम और हव्वा को एक बाग (ईडन गार्डन) की देखभाल के लिए रखा गया था।
पृथ्वी का स्वामी, इसकी सब बस्तुएं, जगत और वो सब जो इसमें रहते हैं वो ईस्वर हैं (स्त्रोत 24:1)
जंगल का प्रत्येक जानवर और हजारों पर्वतों पर मवेशी सब मेरे हैं (स्त्रोत 30:10)
पर्यावरण और प्रकृति के साथ बौद्ध धर्म
बुद्ध ने सुत्ता-निपात में कहा है – तुम घासों और बृक्षों को जानो, फिर तुम कृमियों को और विभिन्न प्रकार की चीटियों को जानो। तुम छोटे बड़े 4 पैर वाले जीवों को भी जानो। सांपों, मछली जो पानी में रहती है, पक्षी जो पंखो के साथ पैदा होते हैं और हवा में उड़ते हैं उनको भी जानो।
बौद्ध धर्म की शिक्षाएं, कर्म के सिद्धांत और प्रभाव के सिद्धांत पर आधारित हैं। बौद्ध धर्म की शिक्षाएं बतातीं हैं कि इन पर्यावरण के प्रति लापरवाही से पर्यावरण संकट पैदा हो सकता है इसलिए प्रकृति का जीविका की अवस्य्क्ता से अधिक दोहन नहीं किया जाना चाहिए।
बौद्ध धर्म में नदियों, वनो, घास, पर्वतों आदि का अत्यधिक सम्मान किया है। बौद्ध धर्म में सूर्य, चन्द्रमा के साथ साथ अन्य ग्रहों का भी अत्यधिक सम्मान किया है।
पर्यावरण और प्रकृति के साथ इस्लाम धर्म
कुरान में कहा गया है कि – निश्चित रूप से अल्लाह है जिसने 6 दिनों में स्वर्ग और पृथ्वी की रचना की। वह रचनाकार और नियंत्रणकर्ता है (कुरान 7:54) वास्तव में प्रत्येक चीज़ को एक निश्चित अनुपात में और नियत मात्रा में बनाया है (कुरान 54:49)
इस प्रकार कुरान जोर देता है कि प्रकृति के नियमो का पालन करना चाहिए और निर्धारित सीमाओं का उलंघन नहीं करना चाहिए।
पर्यावरण और प्रकृति के साथ सिख धर्म
सिख धर्म बताता है कि ईस्वर ने मनुष्य को ऐसी कोई विशेष सत्ता नहीं दी है जिससे वो प्रकृति को नियंत्रित करे और उस पर अधिकार दिखाए।
आदि ग्रन्थ (पृष्ट 16) में कहा गया है
आद्य सत्य से वायु उत्पन्न हुई।
वायु से जल उत्पन्न हुआ।
जल से 3 जगत उत्पन्न हुए।
और वह स्वयं सृष्टि की रचना में डूबा हुआ है।

गुरुओं के इतिहास में उनके प्राकृतिक पर्यावरण, पशु- पक्षियों, जीव-जंतुओं, पृथ्वी, नदी, पर्वतों से विशेष सबंधों और प्रेम की अनेक कहानियों मिलती हैं।
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