अरब देशों में रमज़ान के महीने में सार्वजनिक रूप से खाने-पीने को लेकर अलग-अलग नियम और सांस्कृतिक मान्यताएँ हैं।
कई अरब देशों में, विशेष रूप से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), और कतर में, रमज़ान के दौरान दिन के समय सार्वजनिक स्थानों पर खाना, पीना गैरकानूनी है। इसका उद्देश्य उन लोगों के प्रति सम्मान दिखाना है जो रोज़ा रख रहे हैं।
भले ही कुछ स्थानों पर कानूनी रूप से अनुमति हो, लेकिन रोज़ा रखने वालों के सामने खाना-पीना असभ्य माना जाता है। रमज़ान के दौरान, सहानुभूति और सम्मान दिखाना महत्वपूर्ण है।
कई रेस्तरां और कैफे दिन के समय बंद रहते हैं या केवल टेक-आउट ( पैक करवा के घर ले जाना) सेवाएं प्रदान करते हैं। हालाँकि ये नियम कई देशों और जगह के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं।
भारत में भी एक व्रत होता है जिसमे रमजान के रोज़े की तरह पुरे दिन पानी तक ग्रहण नहीं किया जाता और बिना आहार, बिना पानी के इस व्रत को किया जाता है। यहाँ तक कि रोज़े की तरह इस व्रत में मुँह का थूक भी नहीं निंगला जाता।

व्रत का नाम है निर्जला एकादशी। इस व्रत की खास बात ये है कि रोज़े में जहाँ अरब देशों में सार्बजनिक रूप से खाना खाने पर प्रतिबंध होता है वहीँ इस व्रत में लगभग हर गली- मोहल्ले और नुक्क्ड़ पर मीठा पानी पिलाया जाता है, तरबूज खिलाये जाता हैं तथा लंगर लगाए जाते हैं। तो आइये जानते हैं निर्जला एकादशी’ के व्रत के बारे में।
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Toggleनिर्जला एकादशी कब आती है
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘निर्जला एकादशी’ कहलाती है। ये जून महीने की भीषण गर्मी में आती है। इस बार की निर्जला एकादशी शुक्रबार , 6 जून 2025 को है। अन्य माह की एकादशियों में फलाहार किया जाता है परंतु इसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता।
एक ओर ज्येष्ठ की भीषण गर्मी और दूसरी ओर साधक द्वारा निर्जल व्रत रखना। पूरा एक दिन बिना पानी के रहना भारतीय उपासना पद्धति में कष्ट सहिष्णुता की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
भारतीय उपासना पद्धति में व्रत व उपवास का बहुत महत्त्व है। हमारे यहाँ प्रत्येक मास कोई-न-कोई बड़ा व्रत होता ही है। निर्जला एकादशी का व्रत भी उनमे से एक है।
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आत्मसंयम की होती है परीक्षा
निर्जला एकादशी के दिन पानी का वितरण देखकर आपके मन में एक प्रश्न अवश्य आता होगा कि जहाँ इस दिन के उपवास में पानी न पीने का व्रत होता है तो यह पानी वितरण करने वाले, कहीं लोगों का धर्म भ्रष्ट तो नहीं कर रहे हैं।
लेकिन ऐसा करना व्रतधारी लोगों की एक कठिन परीक्षा की ओर संकेत करता है। चारों ओर जल का वितरण देखते हुए भी साधक का मन विचलित नहीं होता। वस्तु, पदार्थ उपलब्ध होते हुए उनका त्याग करना ही त्याग है अन्यथा उनके न होने पर तो अभाव कहा जाएगा।
अतः अभाव को त्याग नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर जो लोग व्रत नहीं करते, लेकिन गर्मी के कारण व्याकुल हो जाते हैं और उनको ऐसी स्थिति में एक गिलास ठंडा पानी मिल जाता है तो उनकी आत्मा प्रसन्न हो जाती है।

अतः इस उपासना का सीधा संबंध एक ओर जहाँ पानी न पीने के व्रत की कठिन साधना है, वहीं आम जनता को पानी पिलाकर परोपकार की प्राचीन भारतीय परंपरा से भी है।
जल संरक्षण का संदेश देता है निर्जला एकादशी का व्रत
इस व्रत के व्यावहारिक पक्ष पर विचार करें तो पाते हैं कि यह व्रत वास्तव में पानी की अहमियत को बताता है। जल, पंच तत्त्वों में से एक माना गया है। चूँकि अकसर इनसान किसी विषय या वस्तु का महत्त्व, उसके शरीर और मन में होने वाले अनुभव के आधार पर ही समझता है।
यही कारण है कि इस व्रत को , जल का महत्त्व बताने के लिए ही धर्म के माध्यम से परंपराओं में शामिल किया गया। जब व्रती पूरे दिन जल ग्रहण नहीं करता है, तब जल की प्यास से खुद-ब-खुद उसे जल का महत्त्व महसूस हो जाता है।
किंतु धर्म भाव के कारण वह दृढ़ता से व्रत संकल्प पूरा करता है। यह समय एक कठिन तप के समान होता है। वह भी गर्मी के ऐसे मौसम में, जब जल की ठंडक की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है।
निर्जला एकादशी के दिन क्या दान किया जाता है
प्यासे लोगों को ठंडा पानी पिलाना और मीठा शरबत बांटना इस दिन का सबसे प्रमुख दान है। कई लोग मटके में ठंडा पानी भरकर या टैंकरों के माध्यम से पानी उपलब्ध कराते हैं।
विभिन्न प्रकार के शरबत जैसे नींबू पानी, गुड़ का शरबत, खस का शरबत आदि भी बांटे जाते हैं ताकि लोगों को गर्मी में राहत मिल सके।
गर्मी के मौसम में फल ठंडक प्रदान करते हैं इसलिए खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा और अन्य मौसमी फल भी दान किए जाते हैं। छाछ, लस्सी और अन्य पारंपरिक ठंडे पेय पदार्थ भी बांटे जाते हैं। कुछ लोग अन्न जैसे चावल, दाल या पका हुआ भोजन भी दान करते हैं

नोट :- अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में दान की जाने वाली वस्तुओं में थोड़ा अंतर हो सकता है लेकिन पानी और शीतल पेय पदार्थों का दान लगभग हर जगह प्रमुखता से किया जाता है।
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