भारतीय दर्शन में कुम्भ का बहुत महत्त्व है। हमने घरों में अपने बड़ों को , अपनी किसी यात्रा के समय, घर की दहलीज पर कलश रखते देखा होगा। हिन्दू धर्म में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को शुरू करने से पहले कलश स्थापना का प्रचलन है।

कोई भी मांगलिक कार्य इसके बिना अधूरा है। कलश या कुंभ घट का पर्यायवाची है और घट शरीर का। कुंभ माटी का बना होता है यानि नश्वर ।
इसलिए अपना उदेश्य पूरा करके खंडित हो जाता है और फिर से माटी में मिल जाता है। हमारे शरीर के साथ भी ऐसे ही होता है इस प्रकार कुंभ हमारे शरीर का प्रतीक भी है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय दर्शन जाने अनजाने में भारतियों के रोम रोम में बसा हुआ है जिन भारतियों ने भारतीय दर्शन के बारे में कभी पढ़ा नहीं है वो भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसका इस्तेमाल करते हैं।
इसी प्रकार भारतबर्ष में विशेष पर्व खासकर मेष सक्रांति और मकर सक्रांति के समय नदियों में नहाने की भी परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। मेष सक्रांति (वैसाखी) जब सूर्य, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन हरिद्वार और ऋषिकेश में भारी मेला लगता है और लोग यहाँ गंगा नदी में स्नान करते हैं।

बहीं हिमाचल प्रदेश में भी ब्यास नदी के तट पर बिल-कालेश्वर में वैसाखी मेला लगता है जिसे हिमाचली भाषा में “बसोया” कहा जाता है। पूरे भारतबर्ष में बहुत सारे कालेश्वर मंदिर हैं। और अधिकतर नदियों के किनारे ही हैं। पुराने समय में सभ्यताएं नदियों के किनारे ही बस्ती थीं।
वास्तव में कालेश्वर का अर्थ होता है जिसने काल को जीत लिया हो अर्थात जो समय से परे हो और ये भगवान शिव का ही एक नाम है। इस प्रकार सभी कालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित होते हैं।
“कुंभ और स्नान” की बात के बाद अब आते हैं कुंभ स्नान या कुंभ पर्व पर। कुंभ मेला जो 12 बर्षों में एक बार लगता है इस मेले में पूरे भारत के लोग इक्कठे होकर स्नान में भाग लेते हैं। इसलिए इस मेले का महत्व और भी बढ़ जाता है।
2010 में हरिद्वार में कुंभ मेले का सफल और शांतिपूर्ण आयोजन हुआ था जिसके लिए उत्तराखण्ड का नाम नोबल पुरस्कार के लिए चयनित हुआ था । उस बर्ष कुंभ मेले में 1 करोड़ लोगों ने उपस्थित होकर पुरे विश्व को हैरान कर दिया था।
ये पहला मौका था जब इतने सारे लोग एक उदेस्य के लिए एकत्रित हुए थे । साथ ही कुंभ मेले को साल 2017 में यूनेस्को ने “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” की सूची में शामिल किया था
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Toggleकुंभ के 4 स्थान कौन से हैं
कुंभ मेला हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसमे करोड़ों श्रद्धालु, कुंभ पर्व स्थल – प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में इक्क्ठे होते हैं और पवित्र नदी में स्नान करते हैं। इस मेले का जिक्र हिन्दू पुराणों में भी मिलता है।
कुंभ मेले के आयोजन के लिए जतोतिष, खगोल एवं विज्ञान सब देखना पड़ता है तब जाकर ये पता चलता है कि आने वाला कुंभ मेला कब और किस स्थान पर लगाया जायेगा।
कुंभ मेले की पौराणिक कथा
विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब वैद्यराज धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे तो उस अमृत कलश को पाने के लिए देवताओं और असुरों के बीच एक युद्ध हुआ था जिसमे असुरों ने कुल 12 बार उस अमृत कलश को छीनने की कोशिश की थी।
8 बार तो उन्होंने सागर के ऊपर पड़ने वाले अंतरिक्ष में कलश को छीन लिया था और 4 बार धरती पर अमृत कलश को छीना गया था। इसी छीना झपटी के समय अमृत कलश में से अमृत की कुछ बुँदे धरती पर गिर पड़ी।
और इस प्रकार 4 बार धरती पर जिस जगह पर अमृत की बुँदे गिरीं वो 4 स्थान हैं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। इसलिए इन्ही स्थानों पर अमृत उत्सव को कुंभ पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
ये चारों स्थान नदी के किनारे पर स्थित हैं। नासिक, गोदावरी नदी के तट पर स्थित है, उज्जैन – क्षिप्रा नदी के तट, हरिद्वार – गंगा नदी के तट पर तथा प्रयाग गंगा, यमुना तथा सरस्वती के संगम तट पर स्थित है। ये चारों स्थान हिन्दू धर्म के पावन तीर्थों के रूप में प्रसिद्ध हैं।
कुंभ मेला 12 बर्षों में एक बार क्यों लगता है
वास्तव में इसका एक वैज्ञानिक कारण ये भी है। हमारे सौरमंडल के सब ग्रह सूर्य का चक्र लगाते हैं उसी प्रकार बृहस्पति जो सबसे बड़ा ग्रह माना गया है जिसे गुरु ग्रह का दर्जा भी दिया है वो सूर्य का चक्र लगाने में 12 बर्ष का समय लगाता है।
बृहस्पति ग्रह के पास सर्बाधिक 92 चन्द्रमा हैं जो बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण के कारण इसके चारों ओर चक्र लगाते हैं। बृहस्पति अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी को धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों से बचाता है। और धरती पर अगर जीवन संभव है तो उसमे बृहस्पति ग्रह का गुरुत्वाकर्षण भी एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। इस प्रकार कुंभ पर्व हम धरतीवासियों का गुरु बृहस्पति को धन्यवाद देने का तरीका है।
परन्तु कुंभ मेले के आयोजन 12 बर्षों में किया जाता है इसके स्कंदपुराण में 2 कारण बताये गए हैं। पहला कारण ये हैं कि अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में जो युद्ध हुआ था वो 12 दिनों तक चला था
और चूँकि देवताओं का एक दिन मनुष्यो के एक बर्ष के बराबर माना जाता है इसलिए उन 12 दिनों को धरती के 12 बर्षों के बराबर माना गया है और इस प्रकार कुंभ मेले का आयोजन 12 बर्षों के बाद किया जाता है।
स्कंदपुराण के अनुसार, कुंभ मेले का आयोजन 12 बर्षों के बाद किया जाता है इसका दूसरा कारण देवासुर संग्राम में कलश की रक्षा मुख्य रूप से सूर्यदेव, बृहस्पतिदेव और चंद्रदेव ने की थी तब इन तीनों देवताओं ने जिन स्थितियों में कलश की रक्षा की थी बाद में उन्ही स्थितियों के पुनर्योग पर कुंभ पर्व मनाया जाने लगा।
कुंभ मेला हर बार अलग अलग जगह पर क्यों आयोजित होता है।
हरिद्वार में कुंभ मेला कब लगता है
हरिद्वार नगरी, महादेव शिवशंकर के निवास स्थान – “कैलाश” का प्रवेश द्वार है। हरिद्वार नगरी त्रेता और द्वापर युग में भी एक पावन तीर्थ के रूप में जानी जाती रही है।
कुंभ का समय तब होता है जब सूर्य देव अपनी उत्तरायण की यात्रा शुरू करते हैं और हरिद्वार उत्तर में ही स्थित है। इस प्रकार हरिद्वार का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस प्रकार हरिद्वार में ही प्रथम राशि मेष में सूर्य के आने से इस महापर्व का योग बनता है।

हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग और नासिक पर कब – कब कुंभ का आयोजन होगा इसका बर्णन भी स्कंदपुराण में मिलता है। स्कंदपुराण के अनुसार जब सूर्य मेष राशि में हो और बृहस्पति कुंभ में, तब हरिद्वार में गंगा के किनारे पर कुंभ पर्व का योग बनता है।
और ये योग वैशाख मास पर पड़ता है इसलिए सामान्य जनभाषा में हरिद्वार कुंभ पर्व को वैशाखी स्न्नान भी कहा जाता है और इसे कुंभहस्त मेला भी कहा जाता है।
सर्वेक्षण विभाग को अपने सर्वे के समय ऐसे कई ऐतिहासिक सबूत मिले हैं जिनसे भी यही पता चलता है कि हरिद्वार ही पहली कुंभ नगरी रही होगी।
उज्जैन में कुंभ मेला कब लगता है
जब चंद्र और सूर्य मेष राशि में आ जाएं और बृहस्पति सिंह राशि में आ जाये तब क्षिप्रा नदी के तट पर, उज्जैन में कुंभ पर्व का आयोजन किया जाता है इसे सिंहस्त मेला भी कहा जाता है।
राशियाँ कैसे तय की गई और उनमे बाकि ग्रह कैसे प्रवेश करते हैं ये कैसे तय किया गया पढ़ने के लिए क्लिक करें
प्रयाग में कुंभ मेला कब लगता है
प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है और यहाँ पर 3 पवित्र नदियों, गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। हालाँकि अब सरस्वती नदी बिलुप्त हो गई है परन्तु धर्मग्रंथों में इस नदी का बर्णन मिलता है जो संगम स्थल पर बाकि दोनों नदियों के साथ मिलती थी।
चंद्र और सूर्य हर साल माघ के महीने में मकरस्त होते हैं यानि मकर राशि में आते हैं भारतीय संवत की ये तिथि, मकर सक्रांति निश्चित है अन्य तिथियों में परिवर्तन होता रहता है परन्तु इसकी स्थिति कभी नहीं बदलती।
इसलिए हर साल वैसाखी की तिथि निश्चित होती है। सूर्य और चंद्र की इस स्थिति के कारण प्रयागराज में माघ मेला लगता है । इस समय कल्पवास का बड़ा महत्त्व होता है

बृहस्पति सूर्य का चक्र लगाने में 12 बर्ष का समय लगाते हैं और इस प्रकार जब बृहस्पति 12 राशियों में भ्रमण करते हुए, 12 बर्षों के बाद जब माघ के महीने में वृषभ राशि या मेष राशि में प्रवेश करते हैं तब जाकर प्रयागराज में कुंभ का योग बनता है।
नोट :- बृहस्पति ग्रह सूर्य का चक्र लगाने में 12 बर्षों का समय लेता है इस प्रकार बृहस्पति एक राशि में लगभग एक बर्ष तक रहता है और इस प्रकार मेष राशि 12 बर्षों के बाद दोवारा पहुँचता है।
नासिक में कुंभ मेला कब लगता है
दक्षिण की गंगा, गोदावरी तट पर स्थित नासिक में कुंभ तब आता है जब देवगुरु बृहस्पति, वृश्चिक राशि में आ जाते हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा, सिंह राशि में होते हैं।
कल्पवास क्या होता है
एक निश्चित समय पर नियमपूर्वक प्रयाग क्षेत्र में रहने को कल्पवास कहते हैं फिर चाहे ये एक दिन का निवास हो, एक सप्ताह का या पुरे माघ महीने का, ये कल्पवास ही कहलाता है। साधारण तौर पर एक महीने तक प्रयाग में रहने को कल्पवास कहा गया है।
पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादसी से कल्पवास प्रारम्भ हो जाता है और माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादसी तक चलता है। विष्णु पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है
कल्पवास के नियम क्या होते हैं
पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रे ने कल्पवास की व्याख्या की है जिसमे उन्होंने इन्ही सारे नियमो को बताते हुए कुल 21 नियमों का पालन करने को कहा है। उनमे से कुछ नियम हैं
- दिन में सोना नहीं।
- श्रृंगार से दूर रहना।
- ब्रह्मचर्य का पालन करना। कल्पवास केवल सन्यासी करें ये जरुरी नहीं है। कई बार गृहस्त पति- पत्नी जाकर भी कल्पवास करते हैं। हाँ कल्पवास के समय उनका आचरण तपस्वियों वाला ही होता है।
- रात में सोने से पहले जप करना।
- प्रतिदिन यथासंभव दान-पुण्य करना।
- 24 घंटे में सिर्फ एक बार केवल अपना पकाया हुआ भोजन करना।
- सुख हो या दुख मेला क्षेत्र छोड़कर जाना नहीं।
- भोजन बिना तेल-मसाला का सात्विक होना चाहिए।
- जमीन पर सोना। हर प्रकार की सुख सुविधाओं से दूर रहना।
- खाली समय पर सोने के बजाय धार्मिक पुस्तकों का पाठ करना।
- हमेशा सत्य बोलना। मन में किसी के प्रति गलत विचार न लाना।
- 24 घंटे में कम से कम चार घंटे प्रवचन सुनना।
- शालीन वस्त्र धारण करना।
- प्रतिदिन संतों को भोजन कराने के बाद कुछ खाना।
- गंगा जल का पान करना।
- मन में लोभ, मोह, छल व कपट का भाव न लाना। सगे-संबंधियों से दूर रहना।
- हवन के अतिरिक्त अग्नि का ताप नहीं लेना
- शिविर के बाहर तुलसी का पौधा लगाना, जाते समय उसे प्रसाद स्वरूप साथ लेकर जाना।
- 24 घंटे में तीन बार गंगा स्रान करना होता है। पहला स्रान सूर्योदय से पूर्व, दूसरा दोपहर व तीसरा शाम को होता है।
- कल्पवासी यहां तपस्वी की भांति रहते हैं। मेला क्षेत्र में एक बार प्रवेश करने पर घर का मोह छोड़ देते हैं। कोई मरे या पैदा हो उससे उनका कोई वास्ता नहीं होता।
- कल्पवास के लिए वैसे तो उम्र की कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन माना जाता है कि संसारी मोह- माया से मुक्त और जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके व्यक्ति को ही कल्पवास करना चाहिए।
इस कल्पवास के लिए 12 बर्षों का इंतज़ार नहीं करना पड़ता ये कभी भी किया जा सकता है। वैसे तो कल्पवास तवस्वी लोग ही करते हैं परन्तु कुंभ मेले के समय जो भी कल्पवास में शामिल होने जाता है वो एक रात्रि का कल्पवास करता ही है।
अर्धकुंभ क्या होता है। कुंभ मेले और अर्धकुंभ में क्या अंतर होता है।
अर्धकुंभ केवल हरिद्वार और प्रयागराज में ही होते हैं उज्जैन और नासिक में नहीं। कुंभ की शुरुआत तो महाकुंभ के रूप में ही हुई थी जो 12 साल के बाद आता है और इसे पूर्ण कुंभ भी कहा जाता है।
लेकिन फिर विद्वानों ने अर्ध कुंभ के आयोजन पर विचार किया क्यूंकि पुण्य लाभ के लिए 12 बर्ष की प्रतीक्षा बहुत लम्बी हो जाती है इसलिए सबको लगने लगा कि 6 साल के बाद अर्धकुंभ का आयोजन होने लगे तो पुण्य के प्रसार का लाभ जल्दी और ज्यादा लोगों को मिल पायेगा।
इसके साथ अर्ध कुंभ के आयोजन का दूसरा कारण ये भी था कि पुरे भारत के लोग छठे साल में इक्कठे होकर अपने अपने क्षेत्र की समस्याओं पर विचार भी कर सकते थे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए चारों शंकराचार्यों ने मिलकर धार्मिक महोत्सव के रूप में अर्धकुंभ को मान्यता प्रदान की थी।
कुंभ पर्व की तरह अर्धकुंभ की शुरुआत भी हरिद्वार से ही हुई थी। ऐतिहासिक रूप से यहाँ पर अर्धकुंभ का पहला संकेत 1318 ईस्वी में मिलता है जब तैमूर लंग ने हरिद्वार में जाकर लूटपाट और खूनखराबा किया था।
सन 1837 में जब हरिद्वार में अर्धकुंभ पर्व मनाया गया था तब उसके ठीक 3 साल के बाद प्रयाग में भी संतो और महात्माओं ने मिलकर अर्धकुंभ की घोषणा की थी। और इस तरह से सन 1840 में प्रयाग में पहली बार अर्ध कुंभ का आयोजन किया गया था।
पहले कैसे मनाया जाता था कुंभ मेला
बर्तमान कुंभ का जो रूप देखने को मिलता है उसका श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को जाता है क्यूंकि आदि गुरु शंकराचार्य ने ही हरिद्वार कुंभ को राष्ट्रीय पर्व का रूप दिया।
उन्होंने ही बर्तमान कुंभ का स्वरूप स्थापित किया और कुंभ पर्व का नाम प्रयाग, उज्जैन और नासिक से भी जोड़कर देश में 4 कुंभ परम्पराओं की नीव डाली। आदि गुरु शंकराचार्य के बिना ये कुंभ पर्व हरिद्वार तक ही सीमित रह जाता।
भारतीय इतिहास के स्वर्णिम युग, गुप्त साम्राज्य के समय जब हिन्दू पुराण और साहित्य दोवारा सम्पादित किये गए थे तभी उन पुराणों और ज्योतिष के आधार पर कुंभ पर्व के स्थान और समय को भी स्थाई रूप दिया गया था।
पुरातत्व विभाग को हरिद्वार से ऐसा पाषाण (पत्थर) मिला था जो 9वीं शताब्दी का बना हुआ था और उस पर समुद्र मंथन के दृश्य बनाये गए थे। वो पत्थर आज भी गुरुकुल के संग्राहलय में सुरक्षित हैं। गुरुकुल का संग्रहालय, हरियाणा के झज्जर ज़िले में स्थित है।
नारद पुराण में भी हरिद्वार – कुंभ योग का जिक्र मिलता है जो कि 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच लिखा गया था। लेकिन प्रयागराज का कुंभ कब शुरू हुआ इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता और उज्जैन और नासिक दोनों तो काफी बाद में शुरू हुए हैं मुख्य रूप से कुंभ पहले केवल हरिद्वार में ही मनाया जाता था इसलिए हरिद्वार को कुंभ नगरी भी कहा जाता है।
अन्य कौन से कुंभ हैं
शास्त्रों और धर्मग्रंथों में 12 कुंभ पर्वों का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार कुछ और भी कुंभ हैं जिन्हे अभी इतनी पहचान और प्रसिद्धि नहीं मिली है वो हैं।
दक्षिण भारत के कुम्भकोणम (तमिलनाडु) का कुंभ – महामहम मेला
कुम्भकोणम, कावेरी नदी पर स्थित दक्षिण भारत का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है।
वास्तव में महामहम एक जलाशय का नाम है जो कि तमिलनाडु के एक गॉव कुम्भकोणम में बना हुआ है वहाँ हर 12वें साल महामहम जलाशय के किनारे कुंभ राशि में ही गंगा तट जैसा स्नान पर्व होता है।
छत्तीसगढ़ का कुंभ ( राजीव लोचन महोत्सव )
राजिम छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध तीर्थ है। प्राचीन कुंभ स्थलियों में एक स्थली राजिम भी मानी जाती है।
छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक राजधानी राजिम में 3 पवित्र नदियां, महानदी ( चित्रोत्पला ), सोंढुर और पैरी की पावन त्रिवेणी में राजिम कुंभ का पावन आयोजन होता है।
यहाँ राजिम में बहुत पुराने समय से ही माघ पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक धार्मिक मेला लगता आया है।
बृन्दावन का कुंभ मेला
हरिद्वार कुंभ मेले में लगभग 250 साल पहले शैव अखाड़े और वैष्णव अखाड़े के बीच श्रेष्ठता को लेकर बड़ा संघर्ष हुआ था उसी के बाद वैष्णव अखाड़ा, कुंभ स्नान के लिए बृन्दावन प्रस्थान कर गया।
कुछ आचार्यों का ऐसा भी मानना है कि वहां पहले से ही ये पर्व मनाया जाता रहा है। वृन्दावन का कुंभ पर्व, हरिद्वार कुंभ मेले से ठीक पहले बसंत पंचमी से शुरू होकर होली तक चलता है। और हर 12वें साल, बृन्दावन में कुंभ मेले का आयोजन सदियों से चलता आ रहा है।
जब औरंगजेव ने हिन्दू धर्म स्थलों को नष्ट करते हुए बृन्दावन के प्रसिद्ध श्री गोविंद देव जी मंदिर पर आक्रमण किया था उस समय बृन्दावन में कुंभ मेला चल रहा था। संत महात्माओं ने औरंगजेव का जमकर मुकाबला किया था और हजारों साधुओं को मुग़ल सेना के हाथों मौत के घाट उतार दिया गया था।
नेपाल में भी होता है कुंभ पर्व
विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र कहे जाने वाले देश नेपाल के काठमांडू से 32 किलोमीटर दक्षिण पूर्व स्थित बागमती प्रांत के, कवरेपालनचोक जिले के, पनौती शहर में त्रिवेणी संगम तट पर हर 12 बर्ष में मकर मेला लगता है ये भी कुंभ मेला ही कहलाता है।
यहाँ पर रुद्रावती, लीलावती और पुन्यावती नामक 3 नदियों का संगम होता है इसलिए ये तीर्थ भी काफी महत्वपूर्ण है वहाँ पर पुरे एक महीने तक श्रद्धालुओं समेत साधु संतों की भीड़ देखने को मिलती है परन्तु फिर भी कुंभ की महिमा हरिद्वार और प्रयागराज में ही सबसे ज्यादा देखने को मिलती है।
कुंभपर्व में पहले स्नान को लेकर अखाड़ों में होती रही है लड़ाइयाँ
250 साल पहले 1760 में जब सन्यासी सम्प्रदाय (शैव पंथ ), वैरागी सम्प्रदाय (वैष्णव पंथ) के बीच पहले स्नान करने को लेकर लड़ाई हुई थी तब सैकड़ों वैरागी संन्यासियों की मौत हो गई थी। लेकिन समय बीतने के साथ अखाड़ों के बीच संघर्ष भी समाप्त हो गया।
आखिरी संघर्ष 1906 ईस्वी के कुंभ में हुआ था इसके बाद सभी अखाड़ों ने मिलकर एक अखाड़ा परिषद का गठन कर लिया और ये सुनिश्चित किया गया कि परिषद् का निर्णय ही सर्वमान्य होगा ये जरुरी भी था क्यूंकि इसी से साधुओं के आपसी मतभेद समाप्त किये जा सकते थे।
अब जो तीन शाही स्नान होते हैं मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी इनमे प्रत्येक अखाड़े का समय पहले से ही निर्धारित रहता है इसलिए अब ये प्रश्न ही नहीं आता कि पहले कौन सा अखाडा स्न्नान करने के लिए जायेगा या फिर शाही स्नान से पहले जो शाही सवारी निकलती है वो किस अखाड़े की शाही सवारी होगी। ये सारी चीज़ें पहले से ही निर्धारित होती हैं।
जब भी इस तरह के महापर्व का आयोजन होता है तो उससे सालों पहले सारी चीज़ों को निर्धारित करके उनकी रूप रेखा बना ली जाती है।
कुंभ पर्व के 13 अखाड़े कौन कौन हैं
2010 का कुंभ इतिहास का वो पहला अवसर था जब संत समाज ने आगे बढ़कर आपसी सदभाव और सहिष्णुता की मिसाल कायम की ।उस कुंभ में 13 अखाड़े एक साथ नज़र आये। इन 13 अखाड़ों की नीव आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में डाली थी। ये 13 अखाड़े हैं।
- श्री निरंजनी अखाड़ा
- श्री जूना अखाड़ा
- श्री महानिर्वाण अखाड़ा
- श्री अटल अखाड़ा
- श्री आह्वान अखाड़ा
- श्री आनंद अखाड़ा
- श्री पंचाग्नि अखाड़ा
- श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा
- श्री वैष्णव अखाड़ा
- श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा
- श्री उदासीन नया अखाड़ा
- श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा
- श्री निर्मोही अखाड़ा

ये अखाड़े सन्यासी सम्प्रदाय (शैव पंथ ), वैरागी सम्प्रदाय (वैष्णव पंथ) और उदासी सम्प्रदाय (सिख साधु) से सम्बन्ध रखते हैं। इनमे सबसे अधिक 7 अखाड़े शैव पंथ के हैं और वैरागी और उदासी पंथ के 3-3 अखाड़े हैं।
अखाड़ों की परम्परा की नीव आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा रखी गई थी उस समय विदेशी आक्रमणों से हिन्दुओ की रक्षा हेतु एक योद्धा बर्ग की अवस्य्क्ता अनुभव की गई। अखाड़ा प्रणाली तभी से भारतीय धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का प्रतीक मानी जाती है।
ये सब अखाड़े सन 2010 में इक्कठे नज़र आये और आने वाले समय के लिए 2 पम्पराओं की नीव पड़ गई।
पहली परम्परा कि शाही स्नान के दरवाजे सभी अखाड़ों के लिए खोल दिए गए जिससे ये मतभेद न हो कि कौन कम श्रेष्ठ है और कौन अधिक। दूसरी वैष्णव संतो के चैत्र पूर्णिमा पर कुंभ स्नान को भी शाही स्नान का दर्जा मिल गया।
कुंभ का बर्तमान स्वरूप आदि गुरु शंकराचार्य की देन
जगत गुरु आदि शंकराचार्य ने बौद्ध विचारकों के साथ शास्त्रार्थ करके उनको पराजित किया और उन्होंने सनातनी वैदिक धर्म की विजय पताका भारत में फैलाई।
उसके बाद भी उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने धर्म रक्षा हेतु उनके आदेशानुसार दसनामी सन्यासी समुदाय की स्थापना की जो शस्त्र और शास्त्र दोनों से अद्वैत मत की रक्षा कर सकें।
जन साधारण से संपर्क करने और उन्हें धर्माचरण के नियमो से आवगत करवाने के लिए हर 12वें साल कुंभ पर्व में दसनामी सन्यासियों का भाग लेना आवश्यक कर दिया गया। इसी का अनुसरण करते हुए भक्ति मार्ग के वैष्ण्व आचार्यों ने साधु संतो की सेना बनाई जिन्हे वैरागी कहा जाने लगा।
मध्य काल में कैसे मनाया जाता था कुंभ पर्व
500 ई. में गुप्त साम्राज्य के पतन से लेकर लगभग 1500 ई. में मुगल साम्राज्य के उदय तक के समय को मध्य काल के नाम से जाना जाता है। सम्राट अकबर के प्रमुख दरबारी बीरबल, जहांगीर और औरंगजेव माघ मेले के समय प्रयाग में रहते थे।
और जो औरंगजेव अपनी धर्मान्धता और कट्टरता के लिए जाना जाता था उसने अपने माघ मास के दौरान सोमेश्वरनाथ महादेव मंदिर की पूजा अर्चना के लिए 3 गॉंव की भूमि दान में दी थी
वहाँ के पुजारी को 1000 स्वर्ण मुद्राएं और 10 तोले सोना भी दान में दिया था इतना ही नहीं उसी साल उसने कई सारे मंदिरों को ढेर सारी जागीर और धन दौलत भी दान में दी थी जिसमे उज्जैन का महाकलेश्वर मंदिर भी शामिल है
आपदाओं में भी होता रहा है कुंभ का आयोजन
1924 के अर्ध कुंभ के समय जब गंगा नदी पुरे उफान पर थी और त्रिवेणी संगम बहुत गहरा हो गया था।
तो उस समय की ब्रिटिश सरकार ने अर्ध कुंभ के सफल आयोजन के लिए गंगा नदी से एक नहर खोदकर यमुना नदी में मिला दी थी और लोगो की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक कृत्रिम संगम कुंड बनाया गया।
परन्तु उस समय मदन मोहन मालवीय जी और पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इसका जमकर विरोध किया था। यहां तक कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं प्राकृतिक संगम में स्नान करने के लिए छलांग भी लगा दी थी
जिससे लोगों को पता चले कि उसकी गहराई में डूबने का खतरा नहीं है इस सारी घटना का जिक्र नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में किया है।
कुंभ की ऐतिहासिक घटनाएं
- 600 ईसा पूर्व बौद्ध लेखों में नदी मेलों की उपस्थिति।
- 400 ईसा पूर्व सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले का क्रमबद्ध बर्णन किया।
- 600 ईस्वी चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुम्भ में स्नान किया।
- 804 – निरंजनी अखाड़े का गठन।
- 1146 – जूना अखाड़े का गठन।
- 1398 – तैमूर, हिन्दुओं के प्रति सुल्तान की सहिष्णुता के दण्ड स्वरूप दिल्ली को ध्वस्त करता है और फिर हरिद्वार मेले की ओर कूच करता है और हजारों श्रद्धालुओं का नरसंहार करता है।
- 1585 – मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यस्था की लड़ाका इकाइयों का गठन।
- 1760 – शैवों और वैष्णवों के बीच हरिद्वार मेलें में संघर्ष, 1,800 मरे।
- 1780 – ब्रिटिशों द्वारा मठवासी समूहों के शाही स्नान के लिए व्यवस्था की स्थापना।
- 1820-हरिद्वार मेले में हुई भगदड़ से 430 लोग मारे गए।
- 1884 प्रांसीसी यात्री तवेर्निए नें भारत में 12 लाख हिन्दू साधुओं के होने का अनुमान लगाया।
- 1890 – नासिक में शैव और वैष्णव साम्प्रदायों में संघर्ष, 60,000 मरे।
- 1906 – ब्रिटिश कलवारी ने साधुओं के बीच मेला में हुई लड़ाई में बीचबचाव किया।
- 1854- चालीस लाख लोगों अर्थात भारत की 1 प्रतिशत जनसंख्या ने प्रयागराज में आयोजित कुम्भ में भागीदारी की; भगदड़ में कई सौ लोग मरे।
- 1989 – गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने 6 फरवरी के प्रयाग मेले में 1.5 करोड़ लोगों की उपस्थिति प्रमाणित की, जोकी उस समय तक किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्रित लोगों की सबसे बड़ी भीड़ थी।
- 1985 – प्रयागराज के अर्धकुम्भ के दौरान 30 जनवरी के स्नान दिवस को 2 करोड़ लोगों की उपस्थिति।
- 1988 – हरिद्वार महाकुम्भ में 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु चार महीनों के दौरान पधारे 14 अप्रैल के एक दिन में 1 करोड़ लोग उपस्थित।
- 2001- प्रयागराज के मेले में छः सप्ताहों के दौरान 7 करोड़ श्रद्धालु, 24 जनवरी के अकेले दिन 3 करोड़ लोग उपस्थित।
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