वो बच्चा जो सबकी तरह अपने जीवन को लेकर बहुत सी इच्छाएं लेकर पैदा हुआ था। जिसके मन में भी और बच्चों की तरह पढाई करने के सपने थे, गुडा-गुडी का खेल, खेलने के सपने थे, जीवन में कुछ कर दिखाने के सपने थे परन्तु उसके जन्म के साथ ही उसके माता पिता ने उसके सपनो की हत्या कर दी।

उनको ऐसे सफर पर भेज दिया गया जहाँ से वापस आने का कोई रास्ता नहीं। उन बच्चों को त्यागने के बाद उनके साथ क्या क्या हुआ, किस तरह की जिल्ल्त भरी जिंदगी उनको जीनी पड़ी, समाज से किस तरह से उनको तृस्कृत किया गया उसके माता पिता ने भी कभी इसकी सुध नहीं ली।

उनमे असीम संभावनाएं होने के वावजूद उनसे, उनकी पढाई करने के मौके छीन लिए गए, उनको समाज से अलग थलग कर दिया गया। उनसे रोजगार के अवसर छीन लिए गए।

पुलिस स्टेशन में उनकी कंप्लेंट तक नहीं लिखी गई और फिर उन्होंने समाज को डराकर, जलील करके पैसा कमाया क्यूंकि पेट तो ईस्वर ने उनको भी दिया है और भूख उनको भी लगती है।

हम बात कर रहे हैं किन्नर समाज की जिन्हे बहुत सभ्य कहे जाने वाले इंसानो ने, इंसानो के मूल अधिकारों से भी बंचित कर दिया।

किन्नर समाज की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

  • 2006 में बनी फिल्म ‘बिटवीन द लाइन्स’
  • डॉ. भोलानाथ तिवारी द्वारा लिखित किताब “किन्नर देश में”
  • किन्नर साहित्य : व्यथा यातना और संघर्ष : डॉ. देव्यानी
  • ज़िन्दगी 50-50 : भगवंत अनमोल
  • किन्नर अबूझ रहस्यमय जीवन : शरद द्विवेदी
  • मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी ! : लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी
  • किन्नर गाथा : शीला डागा

इन सब किताबों में किन्नरों की परिस्थितयों के बारे में विस्तार से उल्लेख किया। किस तरह से उनको ताली बजाना सिखाया जाता है। किस तरह से लोगो को अजीव सा महसूस करा कर पैसे कमाना सिखाया जाता है और किन्नर बच्चे अपने माता पिता द्वारा त्याग किये जाने पर किस तरह से प्रताड़ित किये जाते हैं।

किन्नर कैसे पैदा होते हैं

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वीर्य की अधिकता से लड़का तथा रक्त की अधिकता से लड़की पैदा होती है अगर दोनों बराबर हों तो किन्नर संतान पैदा होती है।

विज्ञान के अनुसार

  • विज्ञान कहता है कि महिलाओं के अंदर x-x तथा पुरुषों के अंदर x-y क्रोमोजम्स होते हैं इन क्रोमोजम्स के मिलन से भ्रूण बनता है।
  • लड़का :- पुरुष का y क्रोमोजम्स जब महिला के x क्रोमोजम से मिलता है तो लड़का पैदा होता है
  • लड़की :- पुरुषों का x क्रोमोजम्स जब महिला के x क्रोमोजम से मिलता है तो लड़की पैदा होता है
  • किन्नर :- किन्नर या तीसरे जेंडर का जन्म क्रोमोजम डिसऑर्डर के चलते होता है। इस डिसऑर्डर में पुरुष के पास y क्रोमोजम की दो एक्स्ट्रा कॉपियां होती हैं और इस प्रकार xyyy क्रोमोजम्स का मिलन हो जाता है जिससे किन्नर पैदा होता है। ऐसे बच्चों के जननांग स्पष्ट नहीं होते। जिससे पता नहीं चल पाता कि वो लड़का है या लड़की

तृतीय प्रकृति के लिए किन्नर या हिजड़ा शब्द कहाँ आया

किन्नरों के लिए हिंदी में किन्नर, उर्दू में हिजड़ा और अंग्रेजी में ट्रांसजेंडर शब्द इस्तेमाल होता है। प्राचीन भारत में किन्नरों के लिए तृतीय प्रकृति शब्द भी इस्तेमाल होता था। भारत के प्राचीन ग्रन्थ कामसूत्र में यही शब्द इस्तेमाल हुआ है।

हिजड़ा एक उर्दू शब्द है

जो कि अरबी भाषा के ‘हिज्र शब्द से निकला है जिसका अर्थ है अपने समुदाय को छोड़कर बाहर निकलने वाला। मतलब स्त्री, पुरुषों के समाज से बाहर निकलकर अपना अलग समाज बनाने वाला।

जिस तिथि को हजरत मोहम्मद साहब, मक्का छोड़कर मदीना आये थे उस तिथि को ‘हिज्रत कहते हैं और हिजरी संबत इसी घटना से शुरू होता है। इस प्रकार वो मक्का का त्याग करके मदीना गए थे।

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किन्नर शब्द की एक लम्बी यात्रा है। प्राचीन साहित्य में किन्नर देवताओं का मनोरंजन करने वाली जाति के रूप में बर्णित है। आज भी हिमाचल प्रदेश के एक जिले का नाम किन्नौर है यहाँ के निवासी किन्नर कहलाते हैं।

वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में शिव की कथा आती है माना जाता है की वही प्रदेश आज का किन्नौर कहलाता है।

किन्नरों के लिए और जो शब्द इस्तेमाल होते हैं उनमे

  • मराठी – छक्का
  • गुजराती – पवैया
  • पंजाबी – खुसरा
  • तेलगु – नपुंसकुड़ू
  • पाकिस्तान – ख्वाजासिरा या तृतीय पंथी

आदि शब्दों का प्रयोग होता है। शब्द कोई भी हो, किसी भी भाषा में हो – ये सभी नाम मानव समूह के नर-नारी के अतिरिक्त जो तीसरा वर्ग है उसे सम्बोधित करते हैं ।

भारतीय सभ्यता के शुरुआती दौर में किन्नरों की दशा

महाभारत-का रचनाकाल ई.पू. 2000 का माना जाता है । महाभारत में किन्नरों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है-बृहन्नला एवं शिखण्डी के प्रसंग के रूप में। वनवास के समय में जब अर्जुन, अपने पिता की नगरी इंद्रलोक में अस्त्र शस्त्र की शिक्षा के लिए जाते हैं।

तो इंद्रलोक की अप्सरा उर्वसी, अर्जुन पर मोहित हो जाती है। चूँकि उर्वसी, अर्जुन के पिता, इंद्र की प्रेमिका थी इसलिए अर्जुन, उर्वसी को माता कहकर उनके साथ संबंध से इंकार कर देते हैं इस पर उर्वसी अर्जुन को एक बर्ष के लिए नपुसंक होने का श्राप देती हैं।

इस प्रकार एक बर्ष के अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने बृहन्नला के रूप में, राजा विराट की पुत्री, उत्तरा को नृत्य सिखाया था।

उसी प्रकार महाभारत में शिखण्डी नाम के एक और चरित्र का बर्णन मिलता है जो भीष्म की मृत्यु का कारण बना था। भीष्म ने अंबा, अंबिका और अंबालिका का उनके स्वयंवर से हरण कर लिया था क्यूंकि वो उनका विवाह अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से करवाना चाहते थे।

परन्तु अम्बा किसी और से प्रेम करती थी इसलिए उसने भीष्म से वापस जाने के लिए बिनती की। भीष्म ने अम्बा को आज़ाद तो कर दिया परन्तु अम्बा के प्रेमी ने उसे स्वीकार नहीं किया। अम्बा ने उसके बाद भीष्म से विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था।

उसके बाद अम्बा ने परशुराम से भीष्म को दंड देने की विनती की परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। उसके बाद अम्बा ने तपस्या करके भीष्म की मृत्यु का कारण बनने का वरदान माँगा। अगले जन्म में उसने शिखंडी(किन्नर) के रूप में जन्म लिया और भीष्म की मृत्यु का कारण बनी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत काल में एक किन्नर बच्चा पैदा होने के बाद भी अपने माता पिता, अपने परिवार और समाज के साथ ही रहता था। उनको परिवार से अलग नहीं किया जाता था।

वात्स्यायन के कामसूत्र का समय ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व से तीन सौ वर्ष पूर्व के बीच माना जाता है। कामसूत्र में भी तृतीया प्रकृति का वर्णन मिलता है जो किन्नरों के लिए इस्तेमाल हुआ है।

मुग़ल शासनकाल में किन्नरों की दशा

मुग़ल काल में, मुगलों की रानियों की सुरक्षा के लिए किन्नरों की नियुक्ति की जाती थी। ये एक ऊँची पदवी होती थी और किन्नरों के द्वारा ही मुगलों की रानियों से मिला जा सकता था। उनके अलावा कोई भी मुगलों की रानियों से नहीं मिल सकता था।

इतिहास के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी के समक्ष नुसरत ख़ान हिजड़े को पेश किया गया था, बाद में अलाउद्दीन ने उसे अपना सैन्य कमांडर और सलाहकार नियुक्त किया। यह देवगिरि में गवर्नर भी रहा अन्त में सूबेदार हो गया।

गुजरात के सुल्तान मुजफ़्फ़र ने मुमिन उल्मुल्क, जो किन्नर था, उसे कोतवाल नियुक्त किया था। जहाँगीर ने इफ़्फ़ितखार ख़ान, को जागीर का फ़ौजदार बनाया। यह भी किन्नर था। ख़्वाजासरा हिलाल का नाम भी प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जहाँगीर से जुड़ा है।

जहाँगीर की अदालत में भी ख़ान नामक एक किन्नर था। औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को परेशान करने के लिए उस पर एक किन्नर तैनात किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि अंग्रेज़ी शासनकाल से पूर्व किन्नर भारतीय समाज में अन्य लोगों की तरह सामान्य जीवन जी रहे थे।

अंग्रेजी शासन में किन्नरों की स्थिति

विद्वानों के अनुसार, भारत में वैदिक काल से ही नपुंसक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर आज जो हिजड़ों के हालात हैं, उसका क्या कारण है ?

उन्हें समाज से अलग क्यों कर दिया गया? जब भारत के सामाजिक इतिहास पर नज़र डालते हैं तो पता चलता है कि देश में अंग्रेज़ी शासन होने के बाद हिजड़ों के जीवन में समस्याएँ खड़ी हुईं।

रोम में इन्हें अपराधियों के रूप में देखा जाता था, यूरोप में चर्च समलिंगी सम्बन्धों को भी अपराध मानता था। कड़ी सज़ा दी जाती थी। और अंग्रेजों ने भारत में भी वही विचार फैलाए।

अठारहवीं शताब्दी में राजशाही ख़त्म होने के बाद हिजड़ों को काम मिलना भी मुश्किल हो गया। ये लोग नृत्य-गीत आदि कलाओं में लिप्त रहते थे और उसी से अपना पेट भरते थे।

1871 में अंग्रेज़ सरकार क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट या जरायम पेशा अपराध अधिनियम लेकर आयी, जिसमें इन पर कई प्रतिबन्ध लगा दिये गये। 1897 में उसमें संशोधन करके इन्हें अपराधियों की श्रेणी में माना गया ।

अंग्रेज़ सरकार का रुख़ इनके लिए नकारात्मक ही था। अतः हिजड़ों की स्थिति ख़राब होती जा रही थी। अंग्रेज़ी सभ्यता इनको अपराधी, हत्यारे, लुटेरे, ठग जैसी दृष्टि से देखती थी, तो धीरे-धीरे भारतीय जनमानस में भी इनके प्रति एक नकारात्मक भाव बनना शुरू हुआ।

बच्चा पैदा होने पर या विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर अवश्य हिजड़ों को कुछ महत्त्व व धन मिल जाता था, परन्तु ये धन उनका पेट भरने के लिए काफी नहीं था।

धीरे-धीरे जैसे-जैसे इनकी स्थिति में गिरावट आती गयी, इनके व्यवहार में भी बदलाव आने लगे। हिजड़ों की सबसे बड़ी समस्या पेट भरने की होती है। जब यह समस्या सामने आयीं तो इन्होंने भीख माँगना एवं इधर-उधर जाकर नाचना-गाना शुरू किया।

शहर, गलियों, मुहल्लों में बच्चे के जन्मदिन, परिवारों में विवाह जैसे शुभ अवसरों पर नाचने-गाने के बाद कुछ मेहनताना भी माँगने लगे। त्योहारों पर दुकान से कुछ पैसे भी इकट्ठे करते। धीरे-धीरे यह परम्परा बन गयी कि इन मांगलिक अवसरों पर हिजड़े उपस्थित होंगे।

बच्चे को आशीर्वाद देंगे और अपनी दक्षिणा भी लेंगे। साथ ही यदि कोई बच्चा हिजड़ों जैसा पैदा होगा तो उसे अपने साथ ले भी जायेंगे। जब इतने से इनका पेट नहीं भरा तो ये कुछ आक्रामक भी होते गये। जब कोई चारा नहीं दिखा तो असभ्यता भी दिखानी शुरू की।

घरों से यदि सही पैसा वग़ैरह नहीं मिला तो अश्लील शब्दों और हरकतों पर उतर आये। अपने कपड़े उतारने लगे ताकि संकोचवश परिवार के लोग इनको इनकी आशा के अनुसार कुछ दे दें और ये उस घर से चले जायें।

लोग इनसे डरने भी लगे कि हिजड़ा न जाने सबके सामने क्या अश्लील व असभ्य हरकत व्यक्ति के साथ कर दे। यह सारी परम्परा, समस्त व्यवहार हिजड़ा समाज की मजबूरी है।

असभ्य, अभद्र, गाली-गलौज, ताली बजाकर अश्लील गाने गाना, अश्लील बातें करना आदि के कारण आम जनता की दृष्टि में इनके प्रति असम्मान बढ़ने लगा।

2014 में कोर्ट ने तृतीय लिंग को मान्यता दी

2011 में प्रदीप सौरभ ने ‘तीसरी ताली‘ 2014 में महेन्द्र भीष्म ने ‘किन्नर कथा’ लिखा। तब बहुत से लेखकों, साहित्यकारों, कवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि ने हिजड़ों की समस्याओं के विषय में खोजबीन शुरू की।

इनकी सामाजिक स्थिति इनके जीवन के प्रति संवेदनाएँ जागीं और भारतीय हिन्दी साहित्य में इन्हें स्थान मिलने लगा। 2014 में अंग्रेज़ी में आत्मकथा (मी हिजड़ा मी लक्ष्मी) आयी, हिन्दी अनुवाद ‘मैं लक्ष्मी मैं हिजड़ा‘ नाम से प्रकाशित हुआ।

इसके बाद ही अप्रैल 2014 में न्यायालय ने किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी। इससे प्रत्येक किन्नर को जन्म प्रमाण-पत्र, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस के आधार पर लिंग पहचान हासिल करने का अधिकार मिल गया। और फिर किसी भी फॉर्म पर, मेल और फीमेल के साथ ट्रांसजेंडर का कॉलम भी जुड़ गया।

शवनम मॉसी बनी पहली किन्नर विधायक

किन्नरों के लिए राजनीति के दरवाज़े 1998 में शबनम मासी सोहागपुर नामक किन्नर ने खोले। वो पहली भारतीय किन्नर थी जिसने मध्य प्रदेश लेजिस्लेटिव असेम्बली से MLC के लिए चुनाव लड़ा और विधायक बनी।

उसने अपने ब्लॉक में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, ग़रीबी एवं भुखमरी मिटाने के मुद्दों पर चुनाव लड़ा। हिजड़ों के साथ भेदभाव के लिए भी आवाज़ उठायी।

किन्नरों का अंतिम संस्कार कैसे होता है

ऐसा माना जाता है कि जब किन्नरों का अंतिम संस्कार होता है तो उन्हें शव यात्रा में जूते- चपलों से पीटा जाता है परन्तु शीला डागा कहती हैं ये सच नहीं है। किन्नरों का अन्तिम संस्कार भी धर्म व जाति के आधार पर आदर देकर किया जाता है।

जब उसे दफ़नाया जाता है या उसका दाह-संस्कार होता है तो उसके परिवारवालों को, यदि होते हैं तो, समाचार दे दिया जाता है। प्रायः वे, उस समय शामिल होते हैं। अन्यथा परिवारवाले, माता-पिता कभी उसकी खोज-ख़बर नहीं लेते।

किन्नरों के होते हैं 7 खानदान

सामान्यतः इन हिजड़ों के सात ख़ानदानों की परम्परा सामने आयी है। ये हैं

  • भिण्डी बाज़ार
  • बुलावा
  • लालन
  • लखनऊ
  • पूना
  • दिल्ली
  • हादि इब्राहिम

इनमें स्थानों के अनुसार कुछ परिवर्तन हो जाते हैं। मुख्य रूप से ये सात ख़ानदान हैं।

प्रत्येक ख़ानदान का एक मुखिया होता है, जिसे नायक कहा जाता है। उसके नीचे की परम्परा में गुरु की पदवी है। समाज के इन ख़ानदानों में मुख्य रूप से नायक एवं गुरु इन दोनों का ही क़ानून चलता है। गुरु हिजड़ों की माँ होती है।

ऐसे ही दादा गुरु, परदादा गुरु-एक गुरु का परिवार होता है। परिवार का वारिस गुरु ही तय करता है। जिसे वारिस बनाना होता है, उसे परिवार के रीति-रिवाज अच्छी तरह सिखाये जाते हैं।

यदि गुरु ने तय नहीं किया हो तो सभी सात घरानों के नायकों की पंचायत बैठाकर वारिस तय किया जाता है। समाज के सभी फ़ैसले ये पंच ही करते हैं। इन्हें समाज में आदर दिया जाता है। उन्हें जो अधिकार होते हैं, उनको ये नायक अभ्यास से प्राप्त करते हैं।

इन दोनों का ही क़ानून चलता है। यदि इनके क़ानून का, इनके कहने का पालन नहीं किया तो उसके लिए सज़ा मिलती है। प्रत्येक ख़ानदान या समूह के नियम, क़ायदे, क़ानून भिन्न-भिन्न होते हैं। ये ख़ानदान अपनी परम्परा, अपने नियम किसी और को बताते नहीं हैं

निष्कर्ष

जिस देश की संस्कृति के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों में गिने गये चार पुरुषार्थों में धर्म एवं काम का समावेश है। जहाँ जीवन जीने की कला सिखाने के लिए कामसूत्र जैसा अद्भुत ग्रन्थ लिखा गया हो, जिसका अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में किया गया है।

जहाँ खजुराहो जैसे मन्दिर बने हुए हैं, उसी भारतीय समाज में इन्सानों के एक समूह को अंग्रेजी शासन काल में, केवल लिंग के आधार पर इतना तिरस्कृत, बहिष्कृत कर दिया गया जितना प्रकृति की किसी वस्तु को नहीं किया गया होगा।

प्रश्न यही उठता है कि इस समुदाय ने ऐसा क्या कुसूर किया कि इसके भोजन का प्रबन्ध तो नहीं किया बल्कि उसे अत्यन्त उपहासास्पद मान लिया गया।

किन्नरों के अभद्र व्यवहार के पीछे उनकी समस्याएँ हैं, जिनमें सबसे प्रमुख समस्या आजीविका की है। सबका पेट रोटी माँगता है। जब उन्हें पर्याप्त पैसा नहीं मिलता तो वो कुछ और तरीके अपनाते हैं। उनको पर्याप्त भोजन मिले, इसका प्रबन्ध सरकारों को करना चाहिए।