बैसाखी – बैसाख महीने का त्यौहार है। बैसाख, विक्रमी सम्बत के सौर मास का प्रथम दिन होता है। बैसाखी के दिन का भारतबर्ष में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना बैसाखी वाले दिन ही की थी इसलिए इसे पंजाब में इसे खालसा साजना दिवस भी कहा जाता है। पंजाबी में कहते हैं कि इस दिन गुरु जी ने खालसा साजेया सिगा

वैसाखी वैसे तो भारतीय सौर नव वर्ष की तारीख है लेकिन सिखों के लिए यह नया साल नहीं है क्योंकि सिख समुदाय में नया साल, चेत महीने की पहली तारीख को नानकशाही कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है।

नानकशाही कैलेंडर

कई हिंदू समुदायों के लिए, यह त्यौहार गंगा, झेलम, कावेरी और ब्यास जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने, मंदिरों में जाने, दोस्तों से मिलने, अन्य उत्सवों में भाग लेने और विशेष रूप से हाथ के पंखे, पानी के घड़े और मौसमी फलों का अनिवार्य दान करने का अवसर है।

बैसाखी वाले दिन ही 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर ने जलियांवाला बाग में गोली चलने का आदेश दिया था जिससे कई निहथे लोग काल के ग्रास में समा गए थे।

पंजाब में बैसाखी कैसे मनाई जाती है

बैसाखी भारत के अलग अलग स्थानों पर अलग अलग तरीके से मनाई जाती है। पंजाब में बैसाखी का धार्मिक महत्व है, खासकर सिख समुदाय के लिए। इस दिन गुरुद्वारों को सजाया जाता है, और विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं।

लोग गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं और कीर्तन सुनते हैं। पारंपरिक नृत्य और संगीत कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें लोक नृत्य जैसे कि गिद्दा और भांगड़ा शामिल होते हैं।

हिमाचल प्रदेश में बैसाखी कैसे मनाई जाती है

हिमाचल प्रदेश के जिला काँगड़ा में, ब्यास नदी के तट पर , बिल- कालेस्वर महादेव मंदिर के नजदीक, बैसाखी वाले दिन एक बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है।

चूँकि हिमाचल प्रदेश में रोजगार के इतने अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते इसलिए अधिकतर हिमाचली लोग आजीविका के लिए हिमाचल प्रदेश के पड़ोसी राज्यों की तरफ रुख करते हैं।

लेकिन बैसाखी, जिसे मेष संक्रान्ति भी कहा जाता है, के अवसर पर अधिकतर हिमाचली ब्यास नदी में नहाने के लिए जरूर आते हैं। बैसाखी फसल कटाई का त्योहार है

और हिमाचल प्रदेश में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है। पुराने समय में किसान इसी दिन अपनी फसल की कटाई की शुरुआत करते थे।

महीने भर की जाती है शिव पार्वती की पूजा

सात प्रकार की मिट्टी को गंगाजल में मिलाकर एक प्रतिमा तैयार की जाती है जिसे पार्वती स्वरुप माना जाता है हिमाचल प्रदेश में इस प्रतिमा को रली कहा जाता है और इस प्रथा को रलियाँ रखना कहते हैं। मुलत: इस प्रतिमा का पूजन सौर बर्ष की अंतिम सक्रांति मीन संक्रान्ति से शुरू होता है।

गॉव की कुंबारी लड़कियाँ मिट्टी की एक प्रतिमा बनाती हैं और अपने गॉंव के किसी एक घर में इसे स्थापित कर देती हैं, नित बिधि पूर्वक इनका पूजन करती हैं ।

एक महीने तक इसी प्रतिमा के पास लोकगीत गाये जाते हैं , नृत्य किया जाता है यहाँ तक कि उसी कमरे में वो सारी लड़कियाँ रात को सोती भी हैं।

सवेरे 4 बजे उठकर कुएं से, कलश में, पानी भरा जाता है और पार्वती माता का पूजन किया जाता है। इसी बीच चैत्र नवरात्री भी आ जाती है और तब नवरात्रि के पहले दिन, कलश स्थापना के साथ ही जौ और गेहूं के दानों को मिट्टी के बर्तन में बोया जाता है। इन अंकुरों को ‘जवारे‘ कहा जाता है।

वैसाखी के कुछ दिन पूर्व एक लड़के (जिसे शिव स्वरुप समझा जाता है और पहाड़ी भाषा में रला कहा जाता है ) की प्रतिमा बनाई जाती है और फिर वैसाखी के पिछले दिन दोनों रला-रली की शादी करवा दी जाती है।

ये एक लड़का लड़की की शादी की तरह ही होती है जिसमे सारी रस्मे उसी तरह से निभाई जाती हैं। बाकायदा रिश्तेदारों को बुलाया जाता है, हिमाचली धाम खिलाई जाती है और रली को गहने भी पहनाये जाते हैं।

रला – रली के अग्नि के समक्ष फेरे भी करवाए जाते हैं, सब कुछ एक आम हिमाचली शादी की तरह ही होता है। जिसमे रले को दूसरे घर में रखा जाता है फिर बारात लेकर रली वाले घर में आया जाता है।

वैसाखी वाले दिन रला रली और अनाज के जो दाने ( जवारे) बोये हुए होते हैं, उन बीजों का अंकुर फूट चूका होता है उनको बिल-कालेश्वर में, ब्यास नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

सती की प्रतिमा की पूजा और विसर्जन की प्रक्रिया क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है।

रला रली पूजन का वैज्ञानिक कारण

महीने भर रली पूजन होता है। सब खेल कूद, गाना बजाना और नाच गाना रली के इर्द गिर्द ही होता है। फिर मिट्टी के बर्तन में बीज बोये जाते हैं

वैसाखी वाले दिन जब उन बीजों का अंकुर फूट चूका होता है तथा रला-रली की शादी भी हो चुकी होती है उस समय उनको नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

ये प्रथा इंसान के जीवन को दर्शाती है। किस प्रकार छोटे लड़के – लड़कियाँ, खेलते, नाचते- गाते बड़े होते हैं। जीवन के दुःख दर्द से अनजान रहते हुए बड़े होते हैं फिर उनमे समय के साथ नया जीवन पैदा करने की क्षमताएं उतपन्न होती हैं। बीजों में अंकुर फूटना इस बात को दर्शाता है।

और जब वे न्या जीवन पैदा करने को तयैर होते हैं तो उनका विवाह कर दिया जाता है और उन्हें अपनी दुनिया बसाने के लिए स्वतंत्र कर दिया जाता है। नदी में विसर्जन इसी बात को दर्शाता है।

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