15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। 16 जून की योजना की सहमति के बाद ये तो तय हो चुका था कि देश के 3 टुकड़े किए जाएंगे। इस काम के लिए सर रेड क्लिफ को चुना गया, पूर्वी बंग प्रदेश जो कि पूर्वी बंगाल के नाम से भी जाना जाता था और भारत के पश्चिमी प्रदेश जिसमें पश्चिमी पंजाब, सिंध, ब्लूचिस्तान और कराची आदि शामिल थे। ये सभी मिल के पाकिस्तान का हिस्सा बनने वाले थे … पश्चिम पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान।

बचे हुए भारत में जिन प्रांतो में ब्रिटिश हकुमत थी वो सीधे भारत का हिस्सा बनती | लेकिन जिन रियासतो से ब्रिटिश सरकार के paramountcy के agreement थे वहां ब्रिटिश सरकार ने उस समझौते को रद्द कर के उन रियासतो को समझौते से पहले की स्थिति में बहाल करना मंजूर किया था। इसका मतलब ये है कि ऐसी रियासतो के पास अब 3 ऑप्शन थे ।

  • या तो वो भारत के साथ जुड़ जाएं।
  • या वो पाकिस्तान के साथ जुड जाए।
  • और या वो अपने आप को आजाद घोषित कर दें।

मिलाने को थी 565 रियासतें

और यही बहुत बड़ी परेशानी थी। क्योंकि ऐसी 1 या 2 नहीं पूरी 565 रियासते थी। इस मुश्किल को आसान करने के लिए और इन रियासतो को संभालने के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया गया जिसे संभालने की जिम्मेदारी सरदार पटेल को दी गई।

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छोटी रियासतों को मिलाना था आसान

सरदार पटेल को पता था कि ज्यादातर छोटी रियासतों के पास इतनी ताकत नहीं है और न ही इतने संसाधन हैं कि वो अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर सकें तो उनको मिलाना इतना मुश्किल नहीं होगा ।

लेकिन जो रियासते बड़ी हैं और संपन्न हैं वहाँ पर बड़ी ही सावधानी से काम करना होगा। रियासतों को भरोसा दिलाना होगा कि उनके अधिकार हमारे साथ सुरक्षित हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना भी रियासतों को अपनी तरफ मिलाने का काम कर रहे थे

रियासतों को अपनी तरफ मिलाने का काम मोहम्मद अली जिन्ना भी कर रहे थे। उन्होने जोधपुर और विकानेर की रियासतों के पास खाली पेपर तक दे दिया था अपने साइन कर के

साथ में एक समस्या ये भी थी कि कुछ रियासतें अपने आप को सवतंत्र कर चुकी थी या करने वाली थी और उनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ था। ऐसी रियासतों में राजा मुसलमान था लेकिन प्रजा हिंदू थी। जूनागढ़ भोपाल और हैदराबाद। त्रिबणकोर और जम्मू कश्मीर का मुद्दा अलग से था।

565 रियासतों का भारत में विलय का दौर

समस्याएं बहुत थी पर सरदार पटेल के फौलादी इरादों के सामने ये कुछ भी नहीं थीं। सरदार पटेल ने एक एक कर के रियासतो से संपर्क किया और उनको विश्वास में लेना शुरू किया।

रियासतों को ये भी समझाया कि अकेले रहने से अच्छा है कि एक राष्ट्र हो कर रहे। ज्यादातर रियासते इस बारे में पटेल से सहमत हो गई और उन्होंने instrument of accession पर हस्ताक्षर कर दिए।

30 जुलाई, 1947 को त्रावणकोर भारत का आधिकारिक हिस्सा बन चूका था । लेकिन जूनागढ़ और भोपाल के नवाब मानने वाले नहीं थे। परन्तु उनकी सरदार पटेल के आगे एक नहीं चली।

जूनागढ़ में फौज भेजी गई और 9 नवंबर 1947 को जूनागढ़ में जनमत संग्रह करवाया गया तो वहां के 99% लोगो ने भारत के साथ रहने की इच्छा जाहिर की। और 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया।

हैदराबाद का निजाम था उस समय दुनिया का सबसे अमीर आदमी

अब विलय की बारी थी हैदराबाद की। उस समय हैदराबाद रियासत में आज का मध्य महाराष्ट्र, कर्नाटक के कुछ राज्य और तेलंगाना भी शामिल था। उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड के क्षेत्रफल से भी अधिक था। हैदराबाद का निजाम मीर उस्मान अली खान उस समय दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति माना जाता था।

हैदराबाद का निजाम ना केवल आर्थिक रूप से मजबूत था पर उनके पास अपनी पुलिस और एक सेना भी थी | उसके सैनिक रजाकार कहलाते थे।

उन्होने पाकिस्तान में अपना एक ट्रेड एजेंट नियुक्त कर दिया था। उनके युद्ध मंत्री चिकोस्लोवाकिया के साथ हथियारों का सौदा करने की तैयारी कर रहे थे

आगे चलकर उनका पुर्तगाल के साथ समझौता कर के गोवा को एक बंदरगाह (पोर्ट) के रूप में विकसित करने की योजना भी थी

और साथ में कासिम राजवी की एक राजनीतिक पार्टी थी जिसका नाम मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन था वो निजाम का खास बना हुआ था उसके अधिकारी मरने मारने को तैयार थे।

इस तरह से कुल मिलाकर हैदराबाद के निजाम का झुकाव पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में था। लेकिन एक चीज अभी भी उसके खिलाफ थी वो थी उसकी खुद की जनता। वहां की 85 % जनता हिंदू थी और वो भारत के साथ रहना चाहती थी।

सरदार की कासिम रज़वी के साथ चर्चा हो चुकी थी और वो जान चुके थे कि कासिम ऐसे मानने वाला नहीं है। सरदार पटेल के पास फौज इस्तेमाल करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

हैदराबाद में फ़ौज भेजने के लिए प्रेरित करने वाली कुछ घटनाएं

  • नवंबर 1947 तक रजाकारों की संख्या 50,000 तक पहुंच गई, कासिम रजवी ने घोषणा की कि उनके स्वयंसेवकों की संख्या 5,00,000 तक बढ़ाई जाएगी।
  • 10 जनवरी, 1948 को रजाकारों ने बीबीनगर के रेलवे स्टेशन में आग लगा दी
  • रजाकारों के कृत्यों की आलोचना करने पर रजाकारों ने 21 अगस्त 1948 को इमरोज़ पत्रिका के संपादक शोअबुल्लाह खान की हत्या कर दी।
  • 27 , अगस्त 1948 को रजाकारों की फ़ौज ने भैरानपल्ली गॉव पर आक्रमण कर दिया।
  • निहत्थे ग्रामीणों को चुन चुन कर गोलियों से मारा गया।

और फिर शुरू हुआ सरदार पटेल का ऑपरेशन पोलो | हैदराबाद का भारत में विलय

इस प्रकार हैदराबाद में ऐसे हालातों को देखते हुए सरदार पटेल ने हैदराबाद में सेना भेजने का फैसला किया गया। सेना की कमान मेजर जनरल जे. एन. चौधरी के हाथ में थी।

सेना 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद में दाखिल हो गई। रजाकारो ने सेना से मुकाबला करने की पूरी कोशिश की। युद्ध 5 दिनों तक चला जिसमें 2000 से ज्यादा रजाकार मारे गए हालांकि उसकी आधिकारिक रिपोर्ट भारत सरकार ने 2014 में सार्वजानिक की उसमे मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है।

इस तरह आखिर में हैदराबाद भारत में शामिल हो गया। निजाम की सारी अकड़ निकल चुकी थी और उसके खास कासिम रज़वी को पकड़कर जेल में डाल दिया गया था।

और इस तरह 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद भारत का हिस्सा बना।

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