भारतीय सिनेमा दुनिया के सबसे सबसे बड़े और पुराने उद्योगों में से एक है। सालाना फिल्म उत्पादन में, भारतीय फिल्म उद्योग इस समय हालीवुड और नाइजीरिया के बाद तीसरे नंबर पर आता है।
भारत में फिल्म देखने वालों की जनसँख्या दुनिया में किसी भी देश से अधिक है। परन्तु क्या हम जानते हैं कि जब धुंडीराज गोबिंद फाल्के जिन्होंने भारत की पहली आधिकारिक फिल्म बनाई गई थी तो उसमे सारे महिला किरदार, पुरषों ने ही निभाए थे।
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Toggleधुंडिराज गोबिंद फाल्के भारतीय सिनेमा के जनक
धुंडीराज गोबिंद फाल्के को हिंदी सिनेमा का जनक कहा जाता है इन्होने भारतीय इतिहास की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र का निर्माण किया था जो एक मूक फिल्म थी अर्थात बिना आवाज से बनी एक फिल्म थी।

धुंडीराज गोबिंद फाल्के जी को बाद में हिंदी सिनेमा में उनके अद्वितीय योगदान के लिए दादासाहेब के नाम से सम्मानित किया गया। इनको भारतीय सिनेमा के पिता (Father of India Cinema) का दर्जा भी दिया गया है।
नाम | धुंडीराज गोविंद फाल्के |
जन्म | 30 अप्रैल, 1870 |
मृत्यु | 16 फ़रवरी 1944 |
पत्नी का नाम | सरस्वती बाई |
व्यवसाय | फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक |
देश में सिनेमा के क्षेत्र का सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार दादा साहेब फाल्के के नाम पर ही भारत सरकार द्वारा दिया जाता है। भारतीय सिनेमा के 100 बर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में ही शताब्दी फिल्म समारोह का आयोजन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा 25-30 अप्रैल, 2013 को नई दिल्ली में किया गया था।
भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली फिल्म
भारत में फिल्मों का इतिहास यद्यपि सौ वर्षों से अधिक का है। तथापि वर्ष 2013 को भारतीय सिनेमा के इतिहास का शताब्दी वर्ष स्वीकार किया जाता है भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन जुलाई 1896 में हुआ था
किन्तु यह फिल्म ब्रिटेन में निर्मित थी। भारत में पहली बार कोई फिल्म 1898 ई में प्रो स्टीवेसन द्वारा एक भारतीय कैमरामैन हीरालाल सेन की मदद से शूट की गई थी जोकि एक स्टेज शो ‘द फ्लॉवर ऑफ पर्शिया’ (The Flower of Persia) का फिल्मांकन था।
एच एस भाटवडेकर ने फिल्म ‘द रैस्लर्स’ (The Wrestlers) का निर्माण किया था जो उस समय भारत में किसी भारतीय द्वारा फिल्माई गई पहली फिल्म थी। ये फिल्म 1899 ई में मुम्बई में हुई एक कुश्ती प्रतियोगिता का फिल्माकन थी यह किसी भारतीय द्वारा निर्मित पहली डॉक्यूमेंटरी फिल्म मानी जाती है।
भारत में निर्मित पहली फीचर फिल्म ‘श्री पुंडलिक’ (Shree Pundalik) थी। दादा साहेब टोर्ने द्वारा निर्मित यह फिल्म एक मराठी प्ले का फिल्मांकन थी।
18 मई, 1912 को मुम्बई में प्रदर्शित इस फिल्म को पहली भारतीय फिल्म का दर्जा आमतौर पर नहीं दिया जाता क्योंकि इसके कैमरामैन जॉनसन, ब्रिटेन के थे तथा इस फिल्म का प्रसंस्करण (प्रॉसेसिंग) भी ब्रिटेन में ही हुआ था।
नोट :- फिल्म और फीचर फिल्म में टाइमिंग का अंतर होता है जहाँ एक फिल्म 60 मिनट से कम अंतराल में बनाई जाती है वहीँ एक फीचर फिल्म का समय 80 मिनट से अधिक का होता है। हालाँकि राजा हरिश्चंद्र फिल्म की अवधि केवल 40 मिनट थी फिर भी उस समय के हिसाब से इसे फीचर फिल्म माना गया क्यूंकि पहली बार किसी कहानी को परदे पर पूरा दिखाया गया था और दूसरा इसमें एक फीचर फिल्म की तरह शुरुआत, मध्य और अंत था ये कोई छोटी मोटी कहानी नहीं थी । इन सबके अलावा उस समय फीचर फिल्म और फिल्म को लेकर इस तरह के मापदंड नहीं बने थे जो इस समय हैं।
इस प्रकार पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र‘ ही मानी जाती है। दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्मित व निर्देशित चालीस मिनट की यह मूक फिल्म 3 मई, 1913 को मुम्बई में कोरोनेशन थिएटर में प्रदर्शित की गई थी तथा यह 23 दिनों तक चली थी।
‘राजा हरिश्चंद्र’ से पूर्व जो भी विदेशी फिल्में देश में प्रदर्शित हुई थी, वह 3 से 6 दिन तक ही चलती रही थी तथा राजा हरिश्चंद्र ने 23 दिन तक चलकर इतिहास रचा था।

पहली फीचर फिल्म के लिए नहीं मिली थी कोई नायिका
इस फिल्म में नायिका की भूमिका के लिए कोई भी युवती दादा साहेब फाल्के को नहीं मिल सकी थी, जिसके चलते पी. जी. सांलुके नाम के एक रसोइए को तारामती (नायिका) की भूमिका के लिए दादा साहेब फाल्के ने तैयार किया था।
उस समय के समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजा हरिश्चंद्र फिल्म में सभी महिला किरदार पुरुषों ने ही निभाए थे।
फिल्म में हरिश्चद (नायक) की भूमिका दत्तात्रेय दामोदर ने निभाई थी तथा भालचंद्र फाल्के, साने, तेलांग, शिंदे व औंधकर आदि अन्य कलाकारों में शामिल थे। ‘राजा हरिश्चंद्र’ का प्रदर्शन 3 मई, 1913 को हुआ था इसी परिप्रेक्ष्य में 3 मई, 2013 को भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे हुए माने गए हैं।
क्या थी राजा हरिश्चंद्र फिल्म की कहानी
कहानी के शुरू में दिखाया जाता है कि राजा हरिश्चंद्र अपने बेटे और पत्नी के साथ समय बिता रहे हैं वो अपने बेटे को धनुष चलाना सीखा रहे हैं। कुछ प्रजा के लोग आते हैं और इशारों में राजा को बताते हैं कि राज्य ने जंगली जानवरों ने आतंक मचा रखा है।
वो फसलों को बर्बाद कर रहे हैं और राजा को उन जानवरों को मारने के लिए चलना होगा। उसके बाद राजा हरिश्चंद्र कुछ सैनिको के साथ जंगली जानवरों को मारने के लिए निकल पड़ते हैं। इस तरह वो जंगल में एक सूअर का शिकार करते हैं।
लोग खुश हो रहे होते हैं तभी राजा हरिश्चंद्र को कुछ स्त्रियों का रोना सुनाई देता है। वो ध्यान से सुनते हैं कि आवाज कहाँ से आ रही है। लोगो को घर भेजकर वो उस आवाज की तरफ निकल पड़ते हैं।

वो देखते हैं कि कोई ऋषि यज्ञ में आहुति डाल रहा है और उसी यज्ञ में 3 स्त्रियां जोर जोर से चिल्ला रही हैं। राजा हरिश्चंद्र अपने धनुष बाण से उनको आजाद करवा देते हैं परन्तु वो ऋषि कोई और नहीं ऋषि विश्वामित्र होते हैं।
क्रोध में आकर वो राजा को श्राप देने लगते हैं। शायद वो स्त्रियाँ कोई असुर थी या किसी श्राप से ग्रसित थीं। परन्तु राजा हरिश्चंद्र उनको आजाद करवा देते हैं इस पर ऋषि क्रोधित हो जाते हैं। राजा हरिश्चंद्र, विस्वामित्र को श्राप देने से रोक लेते हैं।
विश्वामित्र राजा से उनका पूरा साम्राज्य दान में मांग लेते हैं। फिर महल का दृश्य दिखाया जाता है। राजा महल में पहुँचते हैं और रानी को सारी बात बताते हैं।
विश्वामित्र राजमहल में पहुँच जाते हैं और राजा हरिश्चंद्र को परिवार सहित वहां से जाने के लिए कहते हैं। वो राजा, रानी और उनके पुत्र को वैरागियों वाले कपड़े देकर राजमहल से रुकसत करते हैं।
फिर अगले दृश्य में राजा हरिश्चंद्र एक समसान घाट में होते हैं। शायद वहां पर वो मृतकों के लिए लकड़ी काटते थे और उनको जलाने में मदद करते थे। राजा हरिश्चंद्र की पत्नी उनके पास एक शव को लेकर आती है।

वो उनके पुत्र का शव होता है। वो कैसे बिछड़ गए थे इसका अनुमान फिल्म से नहीं लगता, राजा हरिश्चंद्र की कई कहानियों में बताया जाता है कि राजा हरिश्चंद्र राज्य के लिए अपनी पत्नी और बेटे को बेच देते हैं। परन्तु इस फिल्म में ऐसा कोई दृश्य है नहीं।
तो रानी अपने पुत्र को लेकर आती है और उसको जलाने की बिनती करती है। हरिश्चंद्र , रानी को डोम के पास आज्ञा लेने के लिए भेजते हैं ताकि बालक को निशुल्क जलाया जा सके। शायद वो शमशान घाट, डोम के अधिकार क्षेत्र में था।
रास्ते में डोम का बेटा अपने सैनिको के साथ शिकार खेल रहा था तो विस्वामित्र बड़ी चालाकी से एक सैनिक को भेजकर डोम के बेटे की हत्या करवा देते हैं और सारा इल्ज़ाम हरिश्चंद्र की पत्नी के ऊपर लगा देते हैं।

उसके बाद हरिश्चंद्र की पत्नी को सभा में लाया जाता है और उन्हें मृत्यु दंड की सजा सुनाई जाती है। सैनिक उसे पकड़कर शमशान घाट में ले जाता है और हरिश्चंद्र को सारी बात बता कर उसकी हत्या करने को कहता है।
जैसे ही हरिश्चंद्र तलबार से अपनी पत्नी की हत्या करने लगते हैं शिवजी प्रकट होते हैं और हरिश्चंद्र की सच्चाई से खुश होकर उनके बेटे को जीवित कर देते हैं उसके बाद विस्वामित्र भी खुश होकर राजा हरिश्चंद्र को उनका राज-काज वापस कर देते हैं।

और इस तरह से फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो जाती है। इस फिल्म में 1 या 2 दृश्यों के बाद स्क्रीन पर लिखकर भी चीज़ें समझाई गई थी ताकि लोगो को समझ में आ जाये की फिल्म में चल क्या रहा है।
पहली भारतीय बोलने वाली फिल्म कौन सी थी
भारत की पहली आवाज़ वाली (बोलने वाली) फिल्म ‘आलम आरा थी जिसके निर्देशक आर्देशिर ईरानी थे ये फिल्म 14 मार्च 1931 को रिलीज हुई थी
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