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जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री कब और कैसे बने |पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने की रोचक कहानी।

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भारत और पाकिस्तान का बंटवारा केवल राजनीति की देन थी क्यूंकि आम जनता कोई बंटवारा नहीं चाहती थी और न ही बंटवारे को लेकर आम जनता से कोई विचार विमर्श किया गया। बंटवारे के बहुत सारे कारणों में एक बड़ा कारण ये भी था कि दोनों देशो के बड़े बड़े नेता सत्ता पर काबिज़ होना चाहते थे।

मोहम्मद अली जिन्ना भी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।

भारत का आजाद होना लगभाग तय हो गया था तो उस समय मोहम्मद अली जिन्ना अपनी जिद पर अड़े थे उनकी एक जिद तो ये थी कि अगर भारत आजाद होता है तो उसका पहला प्रधान मंत्री वो बनेंगे और अगर ये संभव न हो तो भारत में रह रहे मुसलमानो के लिए अलग देश दिया जाए। इस कारण बात आगे नहीं बढ़ पा रही थी ।

21 जून 1945 में को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की एक बैठक हुई। पंडित जवाहर लाल नेहरू, ना तो जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थे और ना 2 देश बनाने के पक्ष में। अब यहां से ये साफ हो चुका था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही भारत का पहला प्रधान मंत्री बनेगा।

अध्यक्ष पद पर थे मौलाना आजाद

इसी कड़ी में 20 अप्रैल 1946 को गांधी जी ने मोलाना आजाद को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अस्तिफा देने को कहा। मोलाना ने बिना कोई सवाल जवाब किए अध्यक्ष पद से अस्तिफा दे दिया । 29 अप्रैल की बैठक में नए अध्‍यक्ष का चुनाव होगा ये तय किया गया क्‍योंकि समय की कमी थी इसलिए AICC(अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी) की जगह चुनाव के लिए सीधे प्रदेश कांग्रेस समिति से प्रस्ताव मांगे गए।

15 सदसीय कमेटी में से 12 वोट बल्लभ भाई पटेल को मिले थे | जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री कब और कैसे बने

उस समय की 15 सदसीय कमेटी में से 12 ने सरदार बल्लभ भाई पटेल के नाम को प्रस्तावित किया था 2 ने आचार्य कृपलानी और 1 ने पट्टाभि सीतारमैया का । प्रस्ताव को देखकर गांधी जी ने कृपलानी की तरफ देखा। कृपलानी ने अपना और सीतारमैया का नाम वापस लेते हुए एक नया प्रस्ताव बना दिया। इसमें नेहरू का नाम प्रस्तावित था सभी ने इस पर दस्तखत कर दिए, पर सरदार पटेल अभी भी मैदान में टिके हुए थे।

कृपलानी ने एक कागज पर पटेल के नाम वापस लेने की चिठ्ठी लिखकर पटेल को दे दी। पटेल ने चिठ्ठी देखकर गांधी जी को दे दी। गांधी जी ने नेहरू से पूछा कि जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी ने भी तुम्हारा नाम नहीं सुझाया है इस पर तुम्हारा क्या कहना है। इस पर नेहरू ने चुप्पी साधे रखी।

इसका सीधा मतलब था कि वो प्रधानमंत्री का पद छोड़ने के लिए तयैर नहीं थे। गांधी जी ने वो चिठ्ठी वापस पटेल की तरफ कर दी। और इस बार पटेल ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। इस प्रकार पंडित जवाहर लाल नेहरू निर्विरोध प्रधान मंत्री चुन लिए गए। और सरदार पटेल को स्वतंत्र भारत का पहला गृह मंत्री बनाया गया।

महात्मा गाँधी के दिल में शायद ये ख्याल जरूर रहा होगा कि इस समय देश पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा है और देश को एक ऐसा नेता चाहिए जो देश का लम्बे समय तक नेतृत्व कर सके। क्यूंकि सरदार पटेल उस समय 72 साल के थे जबकि पंडित नेहरू 58 साल के थे। इस प्रकार नेहरू अधिक समय तक देश को अपनी सेवाएं दे सकते थे।

नामजन्म दिनमृत्युमृत्य का स्थान
सरदार वल्लभ भाई पटेल31 अक्टूबर 187515 दिसंबर 1950मुंबई
पंडित जवाहर लाल नेहरू14 नवम्बर 188927 मई 1964नई दिल्ली
महात्मा गाँधी2 अक्टूबर 186930 जनवरी 1948बिरला हाउस, नई दिल्ली
जन्म मृत्यु का व्योरा
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सरदार पटेल भी जानते थे जिस तरह के दौर से इस समय भारत गुजर रहा है। इस समय अगर कांग्रेस में इस तरह के मतभेद होंगे तो देश को आगे नहीं ले जाया जा सकता। जब 1951-52 में देश के प्रथम चुनाव हुए उन चुनावों को भाग लेने के लिए पटेल जीवित नहीं रहे थे और जिसके बाद पंडित नेहरू ने संविधान की शपथ लेकर प्रधानमंत्री पद ग्रहण किया।

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