15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजो से आजादी मिली। भारत ने आजादी को जश्न मानना अभी शुरू भी नहीं किया था कि उसे बंटवारे का दंश भारत के दो टुकड़े करवा कर झेलना पड़ा। धर्म के नाम पर भारत को दो टुकड़ो में बिभाजित कर दिया गया। दो देश थे भारत और पकिस्तान

बास्तव में बंटवारा मुख्य रूप से दो प्रांतो पंजाब और बंगाल का हुआ था। पंजाब के 2 टुकड़े हुए पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब।

इसी तरह बंगाल के भी दो टुकड़े हुए पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल। पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के हिस्से में आया। पूर्वी बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान (अब का बांग्लादेश ) कहा गया।

बांग्लादेश बनने के पीछे क्या कारण थे आइये समझने की कोशिश करते हैं

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संबिधान लागु होने में देरी होना

पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थापित न होने का सबसे बड़ा कारण वहाँ पर समय पर संबिधान का न बन पाना भी है। भारत में संबिधान आजादी के लगभग 3 बर्ष बाद ही 26 जनवरी 1950 को लागु हो गया था जो की शानदार था।

परन्तु पाकिस्तान के संबिधान को पूरी तरह से लागु करने में लगभग 3 दशक लग गए। पाकिस्तान का संबिधान अगस्त 14, 1973 से प्रभावी हुआ। और तब तक वहां लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ चुकी थी।

पाकिस्तान को शुरू से ही था पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान की दूरियों का अहसास

मुसलमानों को यह चिन्ता भी सता रही थी कि पाकिस्तान के पश्चिमी और पूर्वी खंडों के बीच कोई जमीनी जुड़ाव नहीं होगा। जिन्ना ने पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच 800 मील लम्बा कॉरिडोर बनाए जाने की माँग उठाई थी।

जिसको भारत के बीच से होकर गुजरना था लेकिन न तो ब्रिटिश सरकार ने और न कांग्रेस ने उनकी इस माँग को गम्भीरता से लिया था। जिन्ना ने भी इस पर ज्यादा जोर नहीं दिया था।

जिन्ना का बंगाली की जगह उर्दू को पहली भाषा का दर्जा देना

जिन्ना ने उर्दू को पहली भाषा का दर्जा दे दिया वो समझते थे जितने एक राष्ट्र में एक भाषा का प्रचार होगा देश उतना ही मजबूत बनेगा। परन्तु पूर्वी पाकिस्तान के लोग बंगाली और संस्कृत के अधिक नजदीक थे।

जिन्ना को भी था दोनों जगह की दूरियों का एहसास

दोनों पाकिस्तानों के बीच इन दूरियों का जिन्ना को भी पूरा अहसास था। कई वर्ष बाद उनके नेवल एडीसी कर्नल मजहर अहमद ने उन दिनों के बारे में लिखा था– पश्चिमी पाकिस्तान का उर्दू को पहली भाषा बनाने का आदेश पूर्वी पाकिस्तानियों को जरा भी रास नहीं आया था।

हालाँकि उर्दू अरबी और इस्लाम के ज्यादा नजदीक थी। बंगाली को संस्कृत और हिन्दुत्व के ज्यादा नजदीक माने जाने के बावजूद बंगाली मुसलमान इसी को अपनी भाषा मानते थे। लिहाजा पूर्वी बंगाल के मुसलमान और हिन्दू पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ एक हो गए थे।

पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान की तरक्की और दुःख में सहयोग नहीं किया

दो चीजों ने पूर्वी पाकिस्तानियों की भावनाओं को झकझोर कर रख दिया। इनमें से एक पाकिस्तान के प्लानिंग कमीशन के विशेषज्ञों की रिपोर्ट थी जिसके अनुसार 1959-60 में पश्चिमी पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय पूर्वी पाकिस्तान की तुलना में 32 प्रतिशत ज्यादा थी और पिछले दस वर्षों में अर्थात् 1969-70 तक इस अन्तर में 30 प्रतिशत की और बढ़ोत्तरी हो चुकी थी।

दूसरी चीज थी 12 नवम्बर, 1970 को पूर्वी पाकिस्तान में आए भयंकर तूफान में दस लाख लोग मारे गए थे और पूर्वी पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक स्थिति और भी बदतर हो गई थी। तूफान पीड़ितों की मदद के नाम पर पश्चिमी पाकिस्तान ने कुछ भी नहीं किया था।

भारत ने हेलिकॉप्टरों के जरिए वहाँ खाद्य सामग्री और दवाएँ पहुँचाने का प्रस्ताव रखा तो पाकिस्तान ने झट से इसे ठुकरा दिया। इतना ही नहीं बाद में वह यह आरोप लगाने से भी नहीं चूका कि तूफान से हुई बर्बादी के कारण भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में चोरी-छिपे जो मदद और धनराशि भेजी थी उसी के कारण बांग्लादेश के लोग भारत की तरफ हो गए थे।

बांग्लादेश की मुक्ति बहिनी नामक संस्था भी कर रही थी आजादी के लिए काम

पाकिस्तानी इतिहास में मुक्ति-वाहिनी को भारत-समर्थित उग्रवादी कैंप कहा गया। जैसे भारत के अनुसार पाकिस्तान समर्थित उग्रवादी कैंप पीओके में चल रहे थे।

वे कश्मीर के दमन की तस्वीर बना कर वहाँ प्रशिक्षण दे रहे थे बैसे ही पाकिस्तान के अनुसार भारत पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे दमन के लिए यहाँ काम कर रहा था।

इंदिरा गाँधी ने लड़ाई के लिए दिसंबर का महीना चुना

इंदिरा गाँधी को चीन और पाकिस्तान की वार्ता की जानकारी गुप्त सूत्रों (मुख्यत: ब्रजेश मिश्र) से मिल गयी थी। उन्हें यह भी स्मरण था कि चीन के लिए दिसंबर के बर्फीले महीने में उत्तर-पूर्व से आक्रमण करना लगभग असंभव है।

वह 1962 के युद्ध में फ्रंट पर स्थिति देख आयी थी जब नवंबर में ही चीन ने अपने पाँव खींच लिए थे। इसलिए पाकिस्तान से युद्ध का सबसे बेहतर समय था दिसंबर का महीना।

दिसंबर 1971 में शुरू हुई बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई

भारतीय सेना सीमा पर एकत्रित हो गई थी परन्तु लड़ाई की पहल नहीं करना चाहती थी। पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को पठानकोट हवाई अड्‌डे पर बमबारी करके लड़ाई की शुरुआत कर दी तो भारत ने राहत की साँस ली। पाकिस्तानी सेना आपसी मतभेदों की शिकार थी।

ऐसी अफवाहें थीं कि जब जनरल याहिया खान लड़ाई खत्म करना चाहते थे तो अपने सहयोगियों के आगे उनकी एक नहीं चली।यूँ भारतीय सेना भी इतनी एकजुट नहीं थी

फिर भी लड़ाई से पहले तीनों सेना प्रमुखों–थलसेना प्रमुख जनरल एस.एच.एफ. जे. मानेकशा, वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल पी.सी. लाल और नौसेना प्रमुख एडमिरल एस.एम. नन्दा ने मिलकर जनरल मानेकशा को तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर चुन लिया था।

पाकिस्तान की तरफ से हमले की शुरुआत होते ही भारतीय सेनाएँ हरकत में आ गईं। योजना के अनुसार सबसे पहले चिटगाँव बन्दरगाह और ढाका हवाई अडडे पर बमबारी करके पाकिस्तानी वायुसेना को निष्क्रिय बना दिया गया। इसके साथ ही समुद्र का रास्ता भी बन्द कर दिया गया।

इस तरह पाकिस्तानी सेना को पहुँचने वाली मदद के सभी रास्ते बन्द कर दिए गए। जहाँ तक नौसेना का सम्बन्ध था उसने न सिर्फ भारत के आसपास के समुद्री रास्ते बन्द कर दिए बल्कि कराची बन्दरगाह की भी घेराबन्दी कर ली। पाकिस्तान इतना भ्रमित हो गया कि उसने अपने ही एक जहाज को भारतीय जहाज समझकर डुबो डाला।

पाकिस्तान को अनुमान ही नहीं था भारत क्या करने वाला है

शुरू में पाकिस्तान का खयाल था कि भारत सीमा के पास की पट्‌टी पर कब्जा करना चाहता था ताकि वहाँ शरणार्थियों को बसाया जा सके।

नई दिल्ली का सचमुच ही पहले यही इरादा था। स्वर्ण सिंह विदेश दौरे पर गए थे तो उन्होंने शरणार्थियों को अस्थायी रूप से बसाने के लिए सीमा के पास 50 मील लम्बी पट्‌टी का जिक्र किया था।

कोई स्थायी समाधान होने तक वे संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में इस तरह की कोई व्यवस्था चाहते थे। लेकिन अमरीका और ब्रिटेन ने उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

पाकिस्तान यही भ्रम पाले रहा कि भारत सिर्फ सीमित कार्रवाई की योजना बना रहा था। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टि. जनरल ए.ए.के. नियाजी ने बाद में पूछताछ के दौरान बताया था कि वे भारत की तरफ से किसी बड़े हमले की उम्मीद नहीं कर रहे थे। उनका खयाल था कि बांग्लादेश सरकार की स्थापना के लिए भारत सिर्फ थोड़े-से इलाके पर कब्जा करना चाहेगा।

उन्होंने कहा कि यही कारण था कि शुरू में उन्होंने अपनी सेनाओं को सीमा के करीब रखा था और उसी के आसपास लड़ाई की तैयारी की थी।

लेकिन जब भारतीय सेनाएँ किलेबन्द जेस्सोर शहर को छोड़कर तेजी से ढाका की तरफ बढ़ने लगीं तो पाकिस्तान को यह अहसास हुआ कि भारत सिर्फ थोड़े-से इलाके को मुक्त करवाना नहीं चाहता था।

अगर ऐसी कोई योजना थी भी तो उसे रद्‌द किया जा चुका था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी और पाकिस्तान के लिए अपनी रणनीति में बदलाव करना सम्भव नहीं था।

पाकिस्तान के पास आत्मसमर्पण के अलावा कोई चारा नहीं बचा था

पाकिस्तानी सेनाएँ आत्म-समर्पण के लिए आगे नहीं आ रही थीं। ऐसा लग रहा था कि वे आखिरी घमासान की योजना बनाकर ढाका के आसपास इकट्‌ठी हो रही थीं। रूस भारतीय सेनाओं की धीमी रफ्तार को लेकर चिन्तित था। वह बांग्लादेश को भारत का वियतनाम नहीं बनने देना चाहता था।

रूस की इसी चिन्ता के तहत विदेश उपमंत्री वेसिली कुज्नेत्सोव झट से दिल्ली पहुँचे। लेकिन जल्दी ही उन्हें यह यकीन हो गया कि पाकिस्तानी सेनाओं का मनोबल टूट चुका था। वे बांग्लादेश की स्थानीय जनता से पूरी तरह कट चुकी थीं और उनका आत्म-समर्पण अब कुछ ही दिनों की बात थी।

पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद मांगी

पाकिस्तान ने हथियारों और गोला-बारूद के लिए अमरीका से गुहार लगाई। अमरीका ने न सिर्फ इस पर गम्भीरता से विचार किया बल्कि भारत द्वारा पाकिस्तानी बन्दरगाहों की नाकेबन्दी के बावजूद हथियारों की सप्लाई के तरीके भी सोचने लगा।

वाशिंग्टन ने पाकिस्तान की मदद के इरादे से अमरीका और पाकिस्तान के बीच 1964 की सुरक्षा-सन्धि का इस्तेमाल करने का विचार किया। यह पता चलते ही इन्दिरा गांधी ने एक सार्वजनिक सभा में अमरीका को चेतावनी देते हुए कहा–

मैंने सुना है कि कुछ देश हमें धमकाने की कोशिश कर रहे हैं और पाकिस्तान के साथ किन्हीं सन्धियों और समझौतों की बात कर रहे हैं। मुझे इस बारे में पहले कुछ भी मालूम नहीं था क्योंकि मैंने सिर्फ यह सुना था कि यह सन्धि कम्युनिज्म के खिलाफ थी। यह किसी प्रजातंत्र के खिलाफ लड़ने की सन्धि नहीं थी। यह न्याय की आवाज के खिलाफ नहीं थी। यह गरीबों को कुचलने के खिलाफ नहीं थी। लेकिन अगर ऐसा था तो फिर उन्होंने दुनिया से बहुत बड़ा झूठ बोला था

अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत को चेताबनी

निकसन ने पहले तो भारत को एक चेतावनी भिजवाई और फिर अपने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी की तरफ रवाना कर दिया। इस बेड़े का नेतृत्व ‘एन्टरप्राइज’ नामक एक परमाणु-शक्तिधारी एयरक्राफ्ट कैरियर कर रहा था।

इसकी जानकारी भी सबसे पहले मास्को से मिली जिसने उत्तरी वियतनाम के पास टॉनकिन खाड़ी में सातवें बेड़े को भेजा गया एक सन्देश पकड़ा था।

जल्दी ही वाशिंग्टन में भारतीय दूतावास ने भी इसकी पुष्टि कर दी। अमरीकी नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दूतावास के साथ बातचीत के दौरान अनजाने में यह जानकारी उगल दी थी।

स्वर्ण सिंह ने संयुक्त राष्ट्र से नई दिल्ली फोन करके ‘ऑपरेशन’ को जल्दी से पूरा करने के लिए कहा। सोवियत संघ ने उनसे कहा था कि वह संयुक्त राष्ट्र के युद्ध विराम के प्रस्ताव को ज्यादा देर नहीं लटका सकता।

फिर भी मास्को ने संयुक्त राष्ट्र से ‘राजनीतिक समाधान’ की अपील की थी। अगर पाकिस्तान इसे स्वीकार कर लेता तो उसी समय युद्ध-विराम हो जाता।

भारत ने झट से (8 दिसम्बर, 1971) बांग्लादेश की अन्तरिम सरकार को मान्यता दे दी। ऑपरेशन की बागडोर सँभाल रहे मेजर-जनरल जेकब को आत्म-समर्पण से एक दिन पहले अमरीका के एक राजनयिक ने फोन किया।

उसने उन्हें बताया कि नियाजी और फरमान अली दोनों ही अमरीका के सामने युद्ध-विराम का प्रस्ताव रख चुके थे। लेकिन किंसिअर इस प्रस्ताव को अपने पास ही रखे रहे इस उम्मीद में कि शायद पाकिस्तान पूर्वी पाकिस्तान में भारत के कब्जे में आ चुके कुछ इलाके वापस छुड़ाने में सफल हो जाए।

बांग्लादेशी जनता भी अपनी आजादी की लड़ाई के लिए कमर कस चुकी थी

भारत के योगदान की तुलना में बांग्लादेश की जनता और मुक्तिवाहिनी की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। शेख मुजीबुर्रहमान ने 26 मार्च, 1971 में ही यह घोषणा कर दी थी कि पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश था

और पश्चिमी पाकिस्तान से अपने सभी रिश्ते खत्म कर चुका था। यह घोषणा बंगालियों खासकर हिन्दुओं पर बर्बर हमलों के बाद की गई थी।

इसमें कोई शक नहीं कि भारत की मदद के बिना खुद को आजाद करवाना बांग्लादेश के लिए मुश्किल भी होता और इसमें समय भी ज्यादा लगता। लेकिन बांग्लादेशी आजादी के लिए कमर कस चुके थे और इसे हासिल करने के लिए बड़ी-से-बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार थे।

मुक्ति संघर्ष में लगभग तीस लाख लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी थी और एक करोड़ से भी ज्यादा लोग बेघरबार हो गए थे। पाकिस्तानियों को उनकी सेना द्वारा बांगलादेशियों पर ढाए गए जुल्मों की आज भी पूरी जानकारी नहीं है।

आत्म-समर्पण से पहले बांग्लादेश के हजारों डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों और पत्रकारों को कतार में खड़ा करके बड़ी बेरहमी से गोलियों से भून डाला गया था। बाद में पाकिस्तान द्वारा गठित हमूद-उर-रहमान कमीशन ने भी इसकी पुष्टि की थी।

पाकिस्तान की 93000 सैनिको ने किया आत्मसमर्पण

नियाजी भारत की पूर्वी कमान के कमांडर मेजर-जनरल जेकब को जिम्मेदार ठहरा रहे थे क्योंकि उन्होंने नियाजी को डरा-धमकाकर उनकी 93,000 की फौज को संयुक्त राष्ट्र की बजाय भारत के सामने आत्म-समर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। आत्म-समर्पण की घोषणा 15 दिसम्बर, 1971 को हुई।

पाकिस्तान ने बहुत कोशिश की थी कि यह समर्पण संयुक्त राष्ट्र की उपस्थिति में हो। उसे आत्म-समर्पण शब्द को लेकर भी हिचकिचाहट थी। लेकिन जेकब अड़े रहे और उन्होंने यह समर्पण ढाका की जनता के सामने खुलेआम करवाया।

आत्म-समर्पण लेफ्टि. जनरल जे.एस. अरोड़ा की निगरानी में हुआ जो इस कार्रवाई के लिए खासतौर से कलकत्ता से गए थे।

आख़िर ढाका में वह शाम आ ही गयी जब जनरल नियाज़ी ने अपनी कमर से एक बटन खोल कर रिवॉल्वर निकाली और जगजीत सिंह अरोड़ा के हाथ में दी। 93000 फौजियों के साथ पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया

और ब्रिगेडियर सिद्दीक़ी ने कहा, “हार और जीत खेल का हिस्सा है। हमें अपनी हार मानने में कोई गुरेज़ नहीं। अच्छी बात यह है कि यह मुल्क भी यही चाहता है, यहाँ की अवाम भी यही चाहती है।”

बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान रविंद्र नाथ टैगोर जी ने लिखा था

वह शेख मुजीब को पाकिस्तान जेल से रिहा कर हवाई अड्डे पर छोड़ने गए। भारत में हज़ारों की भीड़ उस कड़ाके की ठंड में उनके स्वागत के लिए खड़ी थी।

इंदिरा गांधी उन्हें हवाई अड्डे से राष्ट्रपति भवन की ओर ले गयी। कुछ ही देर में भीड़ के सामने बांग्लादेश और भारत के झंडे एक साथ फहराए गए।

पहले बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार शोनार बांगला’ और फिर भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ गाया गया। दोनों ही गीत एक ही व्यक्ति रविंद्रनाथ ठाकुर ने लिखे थे एक ही देश को ध्यान में रख कर।

जो अब तीन हो गए थे। इंदिरा, भुट्टो और मुजीब तीनों अपने देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में रहे। तीनों का ख़ानदान पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता की गलियारों में रहा। तीनों की मृत्यु अप्राकृतिक हुई।

बांग्लादेश की आजादी का दिन

इस प्रकार हम देखते हैं कि जब 15 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था उस समय लगभग बांग्लादेश को मान्यता मिल गई थी परन्तु बांग्लादेशी 26 मार्च, 1971 को अपनी आजादी के दिवस के रूप में मनाते हैं क्यूंकि इस दिन शेख मुजीबुर्रहमान ने बांग्लादेश को एक आजाद मुल्ख घोषित किया था।

स्त्रोत 1 :- एक जिंदगी काफी नहीं

लेखक :- कुलदीप नैयर

स्त्रोत 2 :- दस्ताने पाकिस्तान

लेखक :- प्रवीण कुमार झा

बांग्लादेश भारत से कब और कैसे अलग हुआ?

ये प्रश्न ही गलत है। बांग्लादेश भारत से नहीं पाकिस्तान से अलग हुआ था क्यूंकि ये बांग्लादेश का हिस्सा था। इसे 1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। शेख मुजीबुर्रहमान ने 26 मार्च, 1971 बांग्लादेश की आजादी की घोषणा कर दी थी।

बांग्लादेश के साथ कितने भारतीय राज्यों की सीमाएं मिलती हैं ?

बांग्लादेश के साथ भारत के 5 राज्यों की सीमाएं मिलती हैं :-असम, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा