देवनागरी में 1 से 100 कैसे लिखते हैं। देवनागरी और हिंदी अंक गणना में क्या अंतर हैं

देवनागरी, हिंदी और रोमन तीनो में गिनती अलग अलग तरीके से लिखी जाती है। देवनागरी को देवों की भाषा कहा जाता है देवनागरी लिपि की उत्पति ब्राह्मी लिपि से हुई हैं। नागरी लिपि, जो ब्राह्मी लिपि ही एक शाखा है, इसका विकास गुप्त काल के दौरान हुआ और फिर देवनागरी लिपि का विकास नागरी लिपि से हुआ। और रोमन लिपि का विकास रोमन साम्राज्य के समय हुआ। रोमन लिपि को लैटिन लिपि भी कहा जाता है। रोमन लिपि और देवनागरी लिपि में क्या अंतर है पढ़ने के लिए क्लिक करें देवनागरी हिंदी और रोमन में 1 से 10 तक गिनती । Devnagri counting 1 to 10 क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 0 ० शून्य Shunay 1 १ एक Ek 2 २ दो Do 3 ३ तीन Teen 4 ४ चार Char 5 ५ पाँच Panch 6 ६ छः Chheh 7 ७ सात Saat 8 ८ आठ Aath 9 ९ नौ Nau 10 १० दस Das रोमन सभ्यता – उतार चढ़ाव से भरा इतिहास का एक शक्तिशाली अध्याय पढ़ने के लिए क्लिक करें देवनागरी में 11 से 20 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 11 ११ ग्यारह Gyarh 12 १२ बारह Barah 13 १३ तेरह terah 14 १४ चौदह Chaudah 15 १५ पंद्रह pandrah 16 १६ सोलह solah 17 १७ सत्रह satrah 18 १८ अट्ठारह attharaj 19 १९ उन्निस unnis 20 २० बीस bees देवनागरी में 21 से 30 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 21 २१ इक्कीस Ikkis 22 २२ बाईस Baais 23 २३ तेईस Teis 24 २४ चौबीस Chaubis 25 २५ पच्चीस Pachis 26 २६ छब्बीस Chhabis 27 २७ सत्ताईस Satais 28 २८ अट्ठाईस Atthais 29 २९ उनतीस untees 30 ३० तीस Tees देवनागरी में 31 से 40 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 31 ३१ इकतीस Iktees 32 ३२ बत्तीस Batees 33 ३३ तैंतीस Tentees 34 ३४ चौंतीस Chauntees 35 ३५ पैंतीस Paintees 36 ३६ छ्त्तीस Chhatees 37 ३७ सैंतीस Santees 38 ३८ अड़तीस Adtees 39 ३९ उनतालीस Untaalis 40 ४० चालीस Chalees देवनागरी में 41 से 50 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 41 ४१ इकतालीस Iktalees 42 ४२ बयालीस Bayalees 43 ४३ तैंतालीस Taintalees 44 ४४ चौंतालीस Chauntalees 45 ४५ पैंतालीस Paintalees 46 ४६ छियालीस Chhiyalees 47 ४७ सैंतालीस Saintalees 48 ४८ अड़तालीस Adtalees 49 ४९ उनचास Unchaas 50 ५० पचास Pachaas देवनागरी में 51 से 60 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 51 ५१ इक्याबन Ikyaban 52 ५२ बावन Bavan 53 ५३ तिरेपन Tirepan 54 ५४ चौबन Chauban 55 ५५ पचपन Pachpan 56 ५६ छप्पन Chhappn 57 ५७ सत्तावन Sattavan 58 ५८ अट्ठावन Atthavan 59 ५९ उनसठ Unsath 60 ६० साठ Sath देवनागरी में 61 से 70 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 61 ६१ इकसठ Iksath 62 ६२ बासठ Basath 63 ६३ तिरसठ Tirsath 64 ६४ चौंसठ Chaunsath 65 ६५ पैंसठ Painsath 66 ६६ छियासठ Chhiyasath 67 ६७ सड़सठ Sadsath 68 ६८ अड़सठ Adsath 69 ६९ उनहत्तर Unhattar 70 ७० सत्तर Sattar देवनागरी में 71 से 80 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 71 ७१ इकहत्तर Ikhattar 72 ७२ बहत्तर Bahattar 73 ७३ तिहत्तर Tihattar 74 ७४ चौहत्तर Chau 75 ७५ पचहत्तर Pachahattar 76 ७६ छिहत्तर Chhihattar 77 ७७ सतहत्तर Satahatar 78 ७८ अठहत्तर Athahattar 79 ७९ उनासी Unaasi 80 ८० अस्सी Assi देवनागरी में 81 से 90 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 81 ८१ इक्यासी Ikyaasi 82 ८२ बयासी Bayaasi 83 ८३ तिरासी Tiraasi 84 ८४ चौरासी Chau 85 ८५ पचासी Pachaasi 86 ८६ छियासी Chhiyaasi 87 ८७ सतासी Sataasi 88 ८८ अठासी Athhaasi 89 ८९ नवासी Navaasi 90 ९० नब्बे Nabbe देवनागरी में 91 से 100 तक कैसे लिखते हैं क्रमांक देवनागरी हिंदी हिंगलिश 91 ९१ इक्यानबे Ikyaanbe 92 ९२ बानवे Banve 93 ९३ तिरानवे Tiraanve 94 ९४ चौरानवे Chauranve 95 ९५ पचानवे Pachaanve 96 ९६ छियानवे Chhiyaanve 97 ९७ सत्तानवे Sataanve 98 ९८ अट्ठानवे Athhaanve 99 ९९ निन्यानवे Ninyanve 100 ९० सौ Sau देवनागरी counting 1 to 10 images रोमन लिपि और देवनागरी लिपि में क्या अंतर है पढ़ने के लिए क्लिक करें
अमावस्या और पूर्णिमा की पौराणिक कहानी और वैज्ञानिक कारण

प्राचीन समय में प्रकृर्ति के कुछ सामान्य नियमो के लिए उस समय के विद्वानों ने कुछ कहानियाँ बनाई हैं। जिस तरह से पढाई के दौरान अगर कोई चीज़ समझ में नहीं आ रही हो तो विद्यार्थी एक कहानी बना कर उसे याद करते हैं जैसे गणित के BODMAS को बदमास बोल कर याद रखा जाता है। अब ये कहानियाँ उन नियमो को याद रखने के लिए थीं या लोगों को समझाने के लिए थी अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। इसी तरह की एक कहानी है चन्द्रमा और उनकी 27 पत्नियों की कहानी चन्द्रमा और उनकी 27 पत्नियों की पौराणिक कहानी ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से हुआ था। चन्द्रमा अपनी 27 पत्नियों में से रोहिणी को सबसे अधिक प्रेम करते थे और उन्ही के साथ अपना समय व्यतीत करते थे। 27 पत्नियाँ 27 नक्षत्र हैं जिनमे चन्द्रमा भर्मण करता है। तारों की गति देखकर कैसे पंचांग बना और 27 नक्षत्र कौन हैं पढ़ने के लिए क्लिक करें। चन्द्रमा की बाकि 26 पत्नियों के लिए ये असहनीय था इसलिए चन्द्रमा की बाकि पत्नियों ने चन्द्रमा के इस व्यवहार की शिकायत अपने पिता दक्ष प्रजापति से की। दक्ष प्रजापति जो कि पहले से जानते थे कि चन्द्रमा चंचल स्वभाव का है फिर भी उन्होंने चन्द्रमा को समझाने का प्रयत्न किया और अपनी सभी पुत्रियों से एक जैसा व्यवहार करने को कहा। चन्द्रमा ने दक्ष प्रजापति की बात स्वीकार कर ली और उनकी 27 पुत्रियों से समान व्यवहार करने का अश्वासन दिया। परन्तु चन्द्रमा के व्यवहार में उसके बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया और वो रोहिणी से ही अधिक प्रेम करते रहे और रोहिणी के साथ ही समय बिताते रहे। चन्द्रमा की बाकि पत्नियों ने एक बार फिर से दक्ष प्रजापति से चंद्रमा की शिकायत की और इस बार क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने चन्द्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दे दिया। इस प्रकार चन्द्रमा दक्ष प्रजापति के श्राप के प्रभाव से क्षय रोग से पीड़ित हो गए और उनकी चमक सदा के लिए खो गई। चन्द्रमा की इस बिमारी का पता जब बाकि देवताओं को लगा तो वो सब मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए और चन्द्रमा को फिर से स्वस्थ करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने की सलाह दी। चन्द्रमा ने ऐसा ही किया। चन्द्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर जब शिवजी प्रकट हुए तो चन्द्रमा ने क्षय रोग से निदान की प्रार्थना शिवजी से की। इस पर शिवजी कहते हैं कि श्राप के प्रभाव को पूर्णत: ख़तम नहीं किया जा सकता परन्तु उन्होंने चन्द्रमा को महीने में एक दिन पूरी तरह से अपने रूप में आने का बरदान दिया। भगवान शिव के उसी बरदान स्वरूप चन्द्रमा अपनी कलाएं बदलता है। यानि 15 दिन बढ़ता है और अगले 15 दिन घटता है। और पूर्णिमा और अमावस्या आती है। चद्र्मा के घटने बढ़ने का वैज्ञानिक कारण चन्द्रमा के घटने बढ़ने का कारण समझने के लिए हमें कुछ चीज़ों को समझना होगा चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है और ये पृथ्वी का चक्र लगाता है। पृथ्वी चन्द्रमा से लगभग 4 गुणा बड़ी है इस प्रकार चन्द्रमा को धरती का एक चक्र लगाने में 27.3 दिन का समय लगता है। जिससे भारतीय पंचांग का एक महीना तय होता है। पृथ्वी सूर्य का चक्र लगाती है। सूर्य पृथ्वी से लगभग 109 गुणा बड़ा है इसलिए पृथ्वी को पूरे सूर्य का चक्र लगाने में 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट और 46 सेकंड का समय लगता है। जिससे पूरा एक बर्ष बनता है। चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता वो अपना प्रकाश सूर्य से लेता है। हम कभी भी पूरा चन्द्रमा नहीं देख पाते और चन्द्रमा का पीछे वाला भाग हमेशा हमसे छुपा रहता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर भी घूमती है जिससे दिन और रात बनते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्र पूरा करने में 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09053 सेकंड का समय लेती है। हमें कोई चीज़ तब नज़र आती है जब प्रकाश उस बस्तु पर पड़ने के बाद हमारी आँखों पर पड़ता है। इस प्रकार जब सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर पड़ने के बाद धरती पर पड़ता है तो हमें चन्द्रमा दिखाई देता है। अब क्यूंकि चन्द्रमा धरती का चक्र लगाता है इसलिए सूर्य की रोशनी चन्द्रमा के जिस हिस्से पर पड़ती है हमें केवल उतना ही चन्द्रमा दिखाई देता है और चन्द्रमा के बाकि हिस्से पर प्रकाश नहीं पड़ने के कारण वो हमें दिखाई नहीं देता। अमावस्या कैसे होती है। New Moon पृथ्वी की परिक्रमा करते करते चन्द्रमा जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है उस समय चन्द्रमा के सूर्य की तरफ वाले हिस्से पर तो प्रकाश पड़ता है परन्तु जो हिस्सा पृथ्वी की तरफ होता है उस पर प्रकाश नहीं पड़ता इसलिए हमें चन्द्रमा दिखाई नहीं देता और उसे अमावस्या कहते हैं। पूर्णिमा कैसे होती है। Full Moon चन्द्रमा की परिक्रमा के दौरान जब पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के बीच में आ जाती है और चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य होते तो एक लाइन में हैं परन्तु चन्द्रमा हल्का सा ऊपर उठा हुआ होता है। तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के जिस हिस्से पर पड़ता है वो पूरा हिस्सा हमें पृथ्वी से दिखाई देता है और उसी को पूर्णिमा कहते हैं। सूर्य और चंद्र ग्रहण की पौराणिक कथा कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन किया। जब मंथन से अमृत निकला तो उसको प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों में लड़ाई शुरू हो गई क्यंकि राक्षस देवताओं से ज्यादा शक्तिशाली थे तो उन्होंने वो अमृत देवताओं से छीन लिया। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक लड़की का रूप लिया। राक्षस मोहिनी को देखकर उन पर मोहित हो गए और अृमत को बाँटने की जिम्मेबारी मोहिनी को दे दी। इस प्रकार भगवान विष्णु सबको अमृत पिलाने लगे। वो बारी बारी से एक देवता फिर एक राक्षस को अमृत पिलाते थे परन्तु वो देवताओं को तो अमृत ही पिलाते थे लेकिन राक्षसों को अमृत पिलाने के समय अमृत के बर्तन को बदल देते थे। एक राक्षस जिसका नाम राहुकेतु था उसने ये सब देख लिया और चुपचाप
पंजाब में दलित सिख होते हैं भयंकर सामाजिक शोषण का शिकार

पंजाब को लेकर हमारी बहुत सारी धारणाएं बनी हुई हैं। जब हम पंजाब की बात करते हैं तो सबसे पहले ध्यान में आता है सिखों द्वारा शासित एक कृषि प्रधान राज्य और सारी पंजाबी फिल्में , पंजाबी गाने सभी इसी के इर्द गिर्द घूमते हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सारा पंजाब जट्टों के इर्द गिर्द घूमता है। बॉलीवुड की फिल्मो में भी पंजाबियों को बहुत अमीर, समृद्ध और खुशमिजाज दिखाया जाता है। ऐसे लोग जिनके पास बहुत सारी जमीन है। पंजाब के बारे में एक और आम धारणा है कि ऐसे लोग जो कैनेडा, अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जाने के हमेशा उत्सुक रहते हैं वो काम के लिए अपनी मातृ भूमि छोड़कर विदेशों में सेटल हो जाते हैं। परन्तु पंजाब का एक और चेहरा भी है जो हमेशा छुपा रहता है वो हैं दलित सिख। जिनके पास जमीन तो छोड़ो अपने खुद के मकान भी नहीं हैं। पंजाब में दलित सिखों की सँख्या 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में दलित सिखों की आबादी 33% है जो भारत के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक दलित जनसंख्या है। परन्तु केवल 2.3% दलित सिखों के पास ही अपनी जमीन है। इनमे से बहुत दलित सिखों के पास अपने मकान तक नहीं हैं। सिख धर्म की उत्पति और स्थापना सिख धर्म की शुरुआत गुरुनानक जी ने 15बी शताब्दी में की। इनके पिता का नाम कालू राम और माता का नाम तृप्ता देवी था। सिखों के 5बे गुरु, गुरु अर्जुन देव जी ने 1604 ईस्वी में अमृतसर में सिखों के पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया। सिखों के 10बें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी मृत्यु से पहले श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिखों के 11बें गुरु की उपाधि दी और तब से सिख समाज गुरु ग्रन्थ साहिब को ही अपना गुरु मानता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु नानक देव जी के 974 पद हैं। इसके अलावा गुरु ग्रन्थ साहिब में शेख फरीद, भगत रविदास, भगत कबीर, भगत नामदेव, 11 भट्ट और 4 सिख गुरुओं के भजन हैं। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा को लेकर कहा था। “अविल अल्लाह नूर उपाए, कुदरत दे सब बंदेएक नूर ते सब जग ऊपजया कौन भले कौन मंदे” बाबा नानक जी के अनुसार जन्म से किसी की जाति निर्धारित नहीं होती। जाति अच्छे और बुरे कर्मो से निर्धारित होती है। मानस एक जात जो सबकी पहचान। परन्तु गुरु गोबिंद सिंह जी की मृत्यु के बाद सिख समाज अपनी इन बातों से भटकता हुआ नज़र आता है। सिखों में कौन कौन सी जातियां होती हैं दलित सिख समाज में मजहवी सिख (सफाई कर्मचारी) सबसे निचले पायदान पर हैं। रंगरेटा सिख जो मजहवी सिखों से ऊपर आते हैं। इसके ऊपर आते हैं रामदासिया और रविदासिया, ये मुख्यत: चमड़े का काम करते हैं और चमार कहलाते हैं। इसके अलावा स्वर्ण सिखों में खत्री (सहगल, भल्ला, कपूर, चड्ढा, बहल, कोहली, मारवाह, मेहरा, सोनी, सोढ़ी, पुरी आदि ) आते हैं। सभी 10 सिख गुरु खत्री थे और उन्होंने शादियाँ भी खत्री समाज में ही की हैं। इसके साथ OBC में जाट ( रंधावा , ढिल्लों और पन्नू आदि ) आते हैं। सब सिख जातियों के अपने अपने गुरूद्वारे मोहाली के गॉव दाऊँ की बात करें तो यहाँ पर एक ही गॉव में 4 गुरूद्वारे हैं। सभी सिख जातियों के अपने अपने गुरूद्वारे हैं और स्वर्ण सिख दलित सिखों को अपने गुरद्वारों से दूर ही रखते हैं और न ही इनके गुरुद्वारों में जाना पसंद करते हैं। गॉव मानसिंहवाला जिला संगरूर में 21 जनवरी 2018 को एक दलित बृद्ध महिला मोहिंदर कौर की मृत्यु हो जाती है। परन्तु गॉव के एक बड़े गुरूद्वारे में उसके परिवारजनो को अरदास करने और भोग लगाने से मना कर दिया जाता है और साथ में गुरूद्वारे के बर्तन देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उनको अरदास अपने गुरूद्वारे में करने को कहा जाता है। दलित सिख होते हैं भयंकर सामाजिक शोषण का शिकार आबादी की बात करें तो सिख समुदाय में दलित सिखों की आबादी 33% है परन्तु केवल 2.3% दलित सिखों के पास ही अपनी भूमि है। भूमि के अभाव में इन दलित सिखों के स्वर्ण सिखों की भूमि पर मजदूरी करनी पड़ती है। ये स्वर्ण सिखों के मवेशियों को पालते हैं उनका गोवर उठाते हैं और उनके लिए चारा ले कर आते हैं। इन सब के वावजूद भी ये गरीबी रेखा के ऊपर नहीं आ पाते क्यूंकि इनको बहुत कम मेहनताना दिया जाता है। इनके खेतों में काम करते हुए इन दलित सिखों और इनकी औरतों को तरह तरह के शोषण का सामना करना है। शोषण के कुछ ही मामले सामने आ पाते हैं और बहुत से मामलों को दवा दिया जाता है। क्यूंकि दलित समुदाय के अधिकतर लोग अनपढ़ होते हैं इसलिए इनमे जागरूकता की कमी होती है। स्यामलाट भूमि पर भी रहता है जाट सिखों का कब्जा गुरबिंदर सिंह गॉव बुरान कलां जिला पटियाला के एक दलित समुदाय से सबंध रखते हैं वो बताते हैं कि पंचायत में जो स्यामलाट भूमि होती है उसका एक तिहाई दलित सिखों के लिए आरक्षित होती है। और उसके लिए हर साल बोली लगती है और जो सबसे अधिक बोली लगाता है उसे ये भूमि एक साल के लिए दे दी जाती है परन्तु इस भूमि पर बोली लगाने से पहले 10000/- रूपये सिक्योरिटी के रूप में जमा करने पड़ते हैं परन्तु क्यूंकि उनके पास इतना पैसा होता नहीं है इसलिए बड़े सिख हम में से किसी एक के नाम से बोली लगा के असंबैधानिक तरीके से उस भूमि को भी अपने अधिकार में रख लेते हैं। बॉर्डर की जगह पर दलित सिखों को अधिक दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है सामाजिक कार्यकर्ता परविंदर कौर बतातीं हैं कि रविदासिया और मजहबी सिखों की दिक्क्तें बॉर्डर एरिया में और गहरी हो जाती है क्यूंकि इन लोगो के पास अपनी जमीन तो होती नहीं है और साथ में जिस प्रकार की सामाजिक प्रताड़ना से ये लोग गुजरते हैं इनका जीना दूभर हो जाता है। साथ ही अशिक्षा और बेरोजगारी के कारण से शीघ्र ही बॉर्डर एरिया मैं फैले नशे के कारोबार की चपेट में आ जाते हैं दलित सिखों का इतिहास दलित सिखों
कब्र दरगाह मजार और मकबरे में क्या अंतर है?

कब्र ,दरगाह, मजार और मकबरा इन सभी में मृतकों को दफनाया जाता है। परन्तु क्या हम जानते हैं कि इन सबमे क्या अंतर होता है। बास्तव में कब्र ,दरगाह, मजार और मकबरा किसी व्यक्ति के जीवनकाल के बारे में बताते हैं। एक कब्र को एक मकबरे का रूप देने के लिए उसको एक अलग तरह से डिज़ाइन देना पड़ता है। कब्र, दरगाह, मजार और मकबरे में क्या अंतर है आइये समझते हैं। कब्र क्या होती है ? कब्र उस जगह को कहते हैं जहाँ मरने के बाद मृतक को दफनाया जाता है। कब्रें मुख्य तौर पर कब्रिस्तान में पाई जाती हैं। कब्रिस्तान भी कई प्रकार के होते हैं कुछ कब्रिस्तान शहर के अंदर बनाये जाते हैं और कुछ कब्रिस्तान शहर या गॉंव से थोड़ी दूरी पर बनाये जाते हैं। कब्र के ऊपर पत्थर पर मरने वाले का नाम, उसका जन्म स्थान, उसका जन्म और मृत्यु दिन आदि अंकित किया जाता है। भारत का सबसे मशहूर कब्रिस्तान कौन सा है ? उत्तर प्रदेश के आगरा का पचकुइंया शाही कब्रिस्तान भारत ही नहीं बल्कि एशिया का सबसे बड़ा कब्रिस्तान है। जहाँ पर कब्रों की संख्या इतनी हो चुकी हैं कि अब यहाँ और लोगो को दफ़नाने के लिए जमीन कम पड़ने लगी है। दरगाह या मज़ार किसे कहते हैं? इस्लाम धर्म कई मतों में बिभाजित है जिनमे से एक है सूफीवाद जिसे सूफिज्म भी कहते हैं। और इस मत का अनुशरण करने बाले लोगो को सूफी संत कहते हैं। इन्ही की कब्र के ऊपर एक सुंदर इमारत तयैर कर दी जाती है उसे दरगाह या मज़ार कहते है। मस्जिद और दरगाह में क्या अन्तर है पढ़ने के लिए क्लिक करें इसके अलाबा पीर, वली या किसी महापुरुष की कब्र पर भी जो सुंदर इमारत तैयार की जाती है उसे भी दरगाह या मजार के नाम से पुकारा जाता है। ये ईमारत उन लोगो के द्वारा तयैर की जाती है जो उस सूफी संत, पीर, वली आदि का अनुसरण कर रहे होते हैं। दरगाह एक फ़ारसी शब्द है और मज़ार एक अरबी शब्द है। अगर इनकी कब्र पर सुंदर इमारत का निर्माण नहीं हुआ हो तो भी इनकी कब्र मजार ही कहलाएगी क्यूंकि किसी भी इस तरह के असामान्य व्यक्ति की कब्र मजार या दरगाह ही कहलाती है। दरगाह या मज़ार पर इस्लाम, हिन्दू, सिख और जैन सभी धर्मो के लोग जाकर माथा टेकते हैं और प्रार्थना करते हैं । परन्तु कुछ इस्लामिक कट्टर लोग यहाँ जाना पसंद नहीं करते क्यूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा को हराम समझा जाता है और वो लोग मानते हैं कि यहाँ आकर माथा टेकना मूर्ति पूजा का ही एक रूप है भारत की प्रसिद्ध दरगाह कौन सी हैं मकबरा क्या होता है ? किसी भी सुलतान या बादशाह, उसके खानदान के किसी व्यक्ति अथवा किसी राजनैतिक व्यक्ति की कब्र के ऊपर बनाई गई सुंदर इमारत मकबरा कहलाती है। भारत में मकबरे बनाने की शुरुआत इल्तुमिश ने की थी। मकबरे में एक या एक से अधिक लोगों की कब्रें हो सकती हैं। जैसे ताजमहल में मुमताज और शाहजहां दोनों की कब्रें है। हुमायूँ का मकबरा जो दिल्ली के दीनापनाह में मथुरा मार्ग पर स्थित है उसमे हुमायूँ के परिवारजनों की लगभग 150 कब्रें मौजूद हैं। बादशाह अपने लिए मकबरा खुद भी बनवाते थे कुछ बादशाह ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने अपने कब्र के लिए मकबरो का निर्माण खुद करवाया था। जैसे अकबर ने अपने लिए मकबरे का निर्माण अपने जिन्दा रहते ही शुरू करवा दिया था परन्तु इसके पूरा होने से पहले ही उसकी मौत हो गई। अत: अकबर के मकबरे के निर्माण कार्य को उसके बेटे जहाँगीर ने पूरा करवाया। समाधि स्थल और कब्र में क्या अंतर है पढ़ने के लिए क्लिक करें भारत के प्रशिद्ध मकबरे कौन कौन से हैं संक्षेपण इस प्रकार हम देखते हैं कि कब्र ,दरगाह, मजार और मकबरा एक ही जगह के अलग अलग नाम हैं जो अलग अलग व्यक्तियों के जीवनकाल को प्रदर्शित करते हैं। ये पढ़ने के लिए क्लिक करें मुसलमानों में जातिवाद जो कभी नज़र नहीं आता पढ़ने के लिए क्लिक करें हिन्दू समाज में भी मृतकों का अंतिम संस्कार दफना कर किया जाता है पढ़ने के लिए क्लिक करें
दक्षिण भारत के लोग अंग्रेजी भाषा में इतने अच्छे क्यों हैं

उत्तर भारत के लोगों को लगता है कि दक्षिण भारत में मुख्य भाषा के रूप में इंग्लिश बोली जाती है इसलिए वहाँ के लोगो की इंग्लिश बहुत अच्छी होती है परन्तु क्या ये बात पूर्णतया सच है आइये समझते हैं। दक्षिण भारत में कौन कौन से राज्य आते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु शामिल हैं जिनमे कर्नाटक में कन्नड़, आंध्रप्रदेश में तेलगु, केरल में मलयालम, तेलंगाना में तेलगु, और तमिलनाडु में तमिल बोली जाती है। सँख्या राज्य राज्य भाषा राजधानी 1 कर्नाटक कन्नड़ बेंगलुरु 2 आंध्रप्रदेश तेलगु हैदराबाद 3 केरल मलयालम तिरुवनंतपुरम 4 तेलंगाना तेलगु हैदराबाद 5 तमिलनाडु तमिल चेन्नई दक्षिण भारत के राज्य उनकी भाषा और उनकी राजधानी 2 जून 2014 को तेलंगाना को आंध्रप्रदेश से अलग करके अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया। इसलिए चूँकि ये दोनों ही पहले एक राज्य का हिस्सा थे इसलिए दोनों में तेलगु ही बोली जाती है। हैदराबाद को 10 बर्षों के लिए सयुंक्त रूप से तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की राजधानी बनाया गया। दक्षिण भारत के लोगो की इंग्लिश बाकि भारत के लोगो से अच्छी होती है इसके पीछे की मानसिकता को समझने का प्रयास करते हैं। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य दुरी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य दुरी लगभग 3000 किलो मीटर है। अधिकतर उत्तर भारत के लोग अपने पुरे जीवनकाल में दक्षिण भारत की यात्रा नहीं कर पाते और वो दक्षिण भारत के लोगो की मानसिकता और उनके खान पान का अनुमान केवल फिल्मो के नायक-नायिकाओ और कुछ खिलाडियों को टेलीविज़न पर देखकर लगाते हैं। और चूँकि ये अधिकतर लोग अच्छे पढ़े लिखे होते हैं इसलिए इनकी इंग्लिश वास्तव में अच्छी होती है। जबकि गॉंव के लोगों के बारे में दक्षिण भारत्त की फिल्मों में भी दिखाया जाता है कि वो लोग केवल स्थानीय भाषा को ही प्राथमिकता देते हैं। और उनकी इंग्लिश इतनी अच्छी नहीं होती। दक्षिण भारत के लोगो को हिंदी सीखनी पड़ती है जबकि उत्तर भारत के लोगो में ये खून में होती है। उत्तर भारत में जो भाषाएँ बोली जाती हैं वो हिंदी से मिलती जुलती ही होती हैं। उत्तर भारत में अगर कोई बजुर्ग पढ़ा लिखा न भी हो तो भी वो हिंदी बड़ी आसानी से बोल लेता है क्यूंकि उत्तर भारत की राज्य भाषाओं में अधिकतर शब्द हिंदी के ही इस्तेमाल होते हैं। इसके बिपरीत दक्षिण भारत की राज्य भाषाएं हिंदी भाषा से बिलकुल अलग हैं। ये भाषाएं लच्छेदार होती हैं और शायद इसलिए हिंदी आम बोलचाल की भाषा नहीं बन पाती। इसलिए उत्तर भारत के लोग जब दक्षिण भारत के लोगो को हिंदी का इस्तेमाल करते देखते हैं (खासकर होता की जगह होती या आती की जगह आता ) तो उनको लगता है कि दक्षिण भारत के लोगो की हिंदी अच्छी नहीं होती क्यूंकि वो इंग्लिश में निपुण होते हैं। भाषा में विविधता दक्षिण भारत के सभी राज्यों में भाषा में बहुत विविधता पाई जाती है। कन्नड़,मलयालम,तमिल और तेलगु ये सभी भाषाएं एक दूसरे से पूर्णत: भिन्न हैं। इसलिए इन राज्य के लोगों को अपने राज्य से बाहर दूसरे राज्यों के लोगो से संचार (communication) के लिए इंग्लिश पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बिपरीत उत्तर भारत के लोगो के साथ ऐसा नहीं है वहाँ पर सारी भाषाएं एक दूसरे के साथ मिलती जुलती हैं और थोड़े दिन तक कोई भी दूसरे राज्य में रहकर उस राज्य की भाषा को सीख सकता है। पंजाबी, पहाड़ी, राजस्थानी, गढ़वाली, बिहारी और भोजपुरी में कई शब्द आपस में मिलते जुलते होते हैं। इसलिए कोई भी थोड़ी सी मेहनत से पडोसी राज्यों की भाषा सीख सकता है। संक्षेपण वास्तव में देखा जाये तो दक्षिण भारत के लोग आपस में वहां की स्थानीय भाषाओं में ही बात करते हैं और ये राज्य हजारों सालों से अपनी संस्कृति और भाषा को बचाये रखे हुए हैं। अत: दक्षिण भारत के लोग इंग्लिश बढ़िया बोलते हैं ये एक मिथ है। और ये बात पूर्णत: सच नहीं है। नागालैंड में ईसाइयों की अधिकता का क्या कारण है पढ़ने के लिए क्लिक करें